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कविता: रुढ़ियों से कहीं दूर

समकालीन हिंदी कविता की आंदोलन और संघर्षविहीन दुनिया में एक अपेक्षाकृत नए कवि तजेंदर सिंह लूथरा का पहला काव्य संग्रह है अस्सी घाट का बांसुरी वाला.

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aajtak.in
ओम नारायणनई दिल्‍ली, 24 March 2012
कविता: रुढ़ियों से कहीं दूर

अस्सी घाट का बांसुरी वाला
तजेंदर सिंह लूथरा
राजकमल प्रकाशन,
दरियागंज, नई दिल्ली-2
कीमतः 150 रु.

समकालीन हिंदी कविता की आंदोलन और संघर्षविहीन दुनिया में एक अपेक्षाकृत नए कवि तजेंदर सिंह लूथरा का पहला काव्य संग्रह है अस्सी घाट का बांसुरी वाला. यह आशाओं, अपेक्षाओं और सायास बुनी गईं काव्य रूढ़ियों से भरसक बचने को प्रयासरत रचनाकार के जीवन से साक्षात्कार कराता है, जिसमें दृश्यमान संसार की अनेक छवियां हैं.

प्रीतिकर यह है कि कवि ने उन्हें उसी रूप में पेश किया है. दिल्ली के एक वरिष्ठ आइपीएस अफसर तजेंदर आशाओं से लबरेज कवि हैं. तभी तो वे पूरे विश्वास के साथ कह पाते हैं: ढूंढ़ोगे तो संदर्भ भी मिल जाएंगे मेरी कविताओं के/निकालोगे अर्थ/तो निकल आएंगे मेरे प्रतीकों के/कोशिश करोगे तो पहचान ही लोगे मेरे बिंबों को/पर क्या फायदा/मुझे कहने दो ये बातें/लुके-छुपे ढंग से.

कहने की जरूरत नहीं कि इस पृष्ठभूमि में अगर हम गहरे उतरें तो मालूम होता है कि कवि अपने निजी संसार से लेकर महानगर तक की किसी भी विफलता से अनजान नहीं है. यह सारी कवायद उसके निरीक्षण में है.

हाशिए पर जीने वाले आम आदमी की पीड़ा, सुख और उम्मीदों को उनकी नजर कुछ यूं बयां करती हैः आज भी दो-चार बांसुरियां ही बिकी थीं/तो आज भी आधा खुश/आधा उदास था/उसे किसी इंकलाब की खबर न थी/बस मैं मन मसोसे चुपचाप खड़ा था/कि आज फिर क्रांति हो नहीं पाई.

न हो क्रांति. यह सजगता, बेचैनी, पर्यवेक्षण ही तजेंदर को एक समर्थ कवि बनाता है. हालांकि वे प्रेम में पगी कोई अछूती रचना अभी तक सृजित नहीं कर पाए हैं. उन्हें और गहरे उतरकर आसपास के संसार, मानस, विचार, षड्यंत्रों, झूठी आशाओं और नए बीजों के स्फुरण पर एक चौकस निगाह रखनी होगी, तभी उनका आयुष्य काल दीर्घ हो सकेगा.

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