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आर्मी क्लब में सैंडविच बेचता था ये एक्टर, आगे चल कर कहलाया बॉलीवुड का ट्रेजडी किंग

दिलीप की पहली मूवी थी फिल्म ज्वार भाटा थी. जो 1944 में आई. 1949 में फिल्म अंदाज की सफलता ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. उन्हें भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

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aajtak.in नई दिल्‍ली, 11 December 2019
आर्मी क्लब में सैंडविच बेचता था ये एक्टर, आगे चल कर कहलाया बॉलीवुड का ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार

बॉलीवुड में 'ट्रेजडी किंग' के नाम से मशहूर दिलीप कुमार को सदी के सबसे बड़े एक्टर के रूप में जाना जाता है. बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान, समेत कई सारे ऐसे सेलेब्स हैं जो दिलीप साहब को किसी यूनिवर्सिटी से कम नहीं समझते. उन्होंने पांच दशकों तक अपने शानदार अभिनय से दर्शकों के दिल पर राया. उन पर फिल्माया गया 'गंगा जमुना' का गाना नैना जब लड़िहें काफी पॉपुलर हुआ था.

दिलीप कुमार को भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. इसके अलावा उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी सम्मानित किया गया है. अभिनय के क्षेत्र में पाकिस्तान से इतना बड़ा सम्मान किसी को नहीं दिया गया.

आर्मी क्लब में सैंडविच बेचा करते थे दिलीप

दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान है. उनका जन्म पेशावर में 11 दिसंबर, 1922 को हुआ था. पेशावर के साथ-साथ दिलीप कुमार के पिता के महाराष्ट्र के देवलाली में भी फलों के बागीचे थे. दिलीप ने नासिक के पास एक स्कूल में पढ़ाई की. वर्ष 1930 में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया. वर्ष 1940 में दिलीप कुमार की पिता से किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया. मतभेद के कारण वह पुणे आ गए. यहां उनकी मुलाकात एक कैंटीन के मालिक ताज मोहम्मद से हुई, जिनकी मदद से उन्होंने आर्मी क्लब में सैंडविच स्टॉल लगाया. इसके बाद वह मुंबई वापस लौट आए और इसके बाद उन्होंने पिता को मदद पहुंचने के लिए काम तलाशना शुरू किया.

वर्ष 1943 में चर्चगेट में इनकी मुलाकात डॉ. मसानी से हुई, जिन्होंने उन्हें बॉम्बे टॉकीज में काम करने की पेशकश की, इसके बाद उनकी मुलाकात बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी से हुई.

दिलीप की पहली मूवी थी फिल्म 'ज्वार भाटा' थी. जो 1944 में आई. 1949 में फिल्म 'अंदाज' की सफलता ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. 'दीदार' (1951) और 'देवदास' (1955) जैसी फिल्मों में दुखद भूमिकाओं के मशहूर होने की वजह से उन्हें ट्रेजडी किंग कहा गया.

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