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हटिया उपचुनाव: पस्त हुई भाजपा, कांग्रेस

हटिया विधानसभा उपचुनाव में आजसू पार्टी की जीत. मुकाबला आजसू के जायसवाल और झाविमो के अजय नाथ साहदेव के बीच रहा. भाजपा तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर रहीं.

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aajtak.in
विजय देव झारांची, 24 June 2012
हटिया उपचुनाव: पस्त हुई भाजपा, कांग्रेस

हटिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने कांग्रेस और भाजपा की नींद उड़ा दी है. ऑल झारखंड स्टुडेंट यूनियन (आजसू) पार्टी के नवीन जायसवाल ने झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के अजय नाथ साहदेव को 11,000 वोटों से शिकस्त देकर जीत का परचम लहराया. जबकि जीत का दम भरने वाले रांची से सांसद और पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय अपने छोटे भाई सुनील सहाय को हारने से नहीं बचा सके. वह भी उस समय जब उन्होंने टिकट के लिए रांची से लेकर दिल्ली तक जमकर राजनैतिक तिकड़मबाजी की थी. सुनील 21,578 वोटों में ही सिमट गए.

हटिया के उन इलाकों से भी उन्हें खास वोट नहीं मिल सके, जिन्हें उनके बड़े भैया का गढ़ माना जाता रहा है. पिछले एक साल से हटिया उपचुनाव की जोर-शोर से तैयारी कर रही भाजपा तीसरे नंबर पर खिसक गई. उसके प्रत्याशी रामजीलाल सारडा को 26,151 वोट मिले. फिलहाल भाजपा इस बात से खुश है कि इससे सहाय का कद न केवल छोटा हुआ बल्कि कांग्रेस चौथे पायदान पर लुढ़क गई.

दोनों पार्टियों के अंदरखाने में हार को लेकर कोहराम जरूर मच गया है. 1977 में हटिया के विधानसभा क्षेत्र बनने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी क्षेत्रीय दल ने इस सीट पर अपनी जीत दर्ज की. वरना यहां से कांग्रेस या फिर भाजपा ही जीतती आ रही थीं.

लंबे अरसे तक सुबोध कांत हटिया का प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे और बाद में सारडा ने इस सीट पर तीन बार जीत दर्ज की 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों में हटिया में कांग्रेस के हाथों हार चुकी भाजपा ने इस बार इस सीट को जीतने के लिए मोर्चाबंदी की थी. मगर राज्‍य भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व को इस बात का अंदाजा नहीं था कि आजसू इस तरीके से उनके गढ़ में सेंधमारी करेगी.

पिछले चुनाव में 22,847 वोट हासिल कर तीसरे नंबर पर रहे जायसवाल ने कांग्रेस के परंपरागत मुस्लिम वोट सहित भाजपा के वैश्य मतों और इन दोनों पार्टियों के शहरी वोट बैंक में खतरनाक सेंधमारी की. वोट में हुई सेंधमारी और हार को लेकर कांग्रेस और भाजपा में अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं लेकिन जायसवाल ने अपने जीत के कारणों को बहुत ही स्पष्ट और सीधा बताया.

वे कहते हैं, ''मैं पिछली बार हारने के बाद से ही लगातार काम कर रहा था. वह किसी उर्जावान को जिताना चाहते थे जो बदलाव ला सके. युवा हमारे साथ थे, यही हमारा मुद्दा भी था.''

आजसू पार्टी के मुखिया और राज्‍य के उप-मुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो ने हटिया के माध्यम से यह संकेत तो दे ही दिया है कि 2014 में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी अपनी  संख्या को बढ़ाने की दिशा में अग्रसर है. वे कहते हैं, ''यह हमारे लिए एक प्रयोग था जो काफी फायदेमंद रहा.''

भाजपा ने जहां कमजोर उम्मीदवार खड़ा किया वहीं कांग्रेस ने एक नौसिखिये को टिकट दिया जिनकी एकमात्र जमापूंजी उनके भाई का केंद्रीय मंत्री होना थी. इससे सुबोध कांत की प्रतिष्ठा को तो बट्टा लगा ही, पार्टी में उनके आलोचक खुल कर जुबानी जंग पर उतर आए हैं. कांग्रेस की नाराज नेता प्रतिभा पांडेय ने तो पार्टी ही छोड़ दी. सुनील की उम्मीदवारी पर पार्टी में कलह इस स्तर तक रही कि उनकी हार को सुबोध कांत की निजी हार के तौर पर पेश किया गया.

एकता दिखाने की पुरजोर कोशिशों के बावजूद भाजपा में भी अंदरूनी कलह और खींचतान साफ नजर आई. पार्टी के दो नेताओं ने हार के दो अलग-अलग कारण बताए. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी सफाई देते हैं, ''शहरी वोटरों का नहीं निकलना हमारी हार का कारण बना. हमारे स्टार प्रचारक अर्जुन मुंडा का स्वास्थ्य कारणों से प्रचार से अलग रहना भी घातक सिद्ध हुआ.

सबसे बड़ी बात यह कि चुनाव के दौरान हम आजसू पर बेहतर तरीके से हमला नहीं कर पाए.'' सारडा हार की एक और वजह बताते हैं, ''मुझे केंद्रीय नेतृत्व से पूरा सहयोग मिला, लेकिन राज्‍य स्तर पर मैंने समन्वय की कमी महसूस की.''

अगर हटिया का जनादेश अर्जुन मुंडा सरकार के खिलाफ नहीं था तो यह कम से कम इन दो राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ लोगों के गुस्से का इजहार जरूर था. बिडंबना यह कि भाजपा के लिए हार का सिलसिला थम नहीं रहा जो जमशेदपुर लोकसभा उपचुनाव से शुरू हुआ था. लगता है कि आजसू और झाविमो झारखंड की आगामी राजनीति की दिशा तय करेंगे. शायद भाजपा और कांग्रेस इस बात को न मानें लेकिन इस सचाई को समझती हैं.

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