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इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015: बाहरी शख्स की बेबाक बातें

रणवीर सिंह 77 मिनट तक बोलते रहे और सब सांस रोककर सुनते रहे. उन्होंने बॉलीवुड में अपने अब तक के सफर पर बात करने के अलावा भारतीय सिनेमा की मुश्किलों पर भी बेबाकी से चर्चा की.

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aajtak.in
सुहानी सिंह 23 March 2015
इंडिया टुडे कॉनक्लेव 2015: बाहरी शख्स की बेबाक बातें

खान और कपूरों से भरी इस फिल्म इंडस्ट्री में अपने दम पर टिके रणवीर सिंह का होना अपने आप में निराली बात है. सिर्फ उनके सरनेम की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए भी कि इस इंडस्ट्री में वे बाहरी शक्चस हैं. ऐसी इंडस्ट्री, जहां से ताल्लुक रखने का अर्थ सफलता का टिकट भी होता है. कारोबारी जगजीत सिंह भावनाणी के परिवार में पैदा हुए रणवीर अपनी 'अफवाहों में चर्चित' गर्लफ्रेंड दीपिका पादुकोण की ही तरह बॉलीवुड में बाहर से आए और एक सितारे की हैसियत हासिल की. हालांकि दीपिका से वे इस मामले में अलग हैं कि उनकी परवरिश मुंबई के उपनगर बांद्रा में हुई, जहां बॉलीवुड के बहुत से जाने-माने सितारे रहते हैं. फिल्मों के प्रति दीवानगी तो उनमें हमेशा से थी. 

''मैं फिल्मी बच्चा हूं और मुझे इस बात पर गर्व है. मुझे कोई शर्म महसूस नहीं होती. मैं तो इसे इज्जतदार तमगे की तरह पहने रहता हूं.'' 
इंडिया टुडे कॉनक्लेव में रणवीर अपने चिर-परिचित अंदाज में थे-उत्साह और उमंग से लबरेज. अपने सबसे पसंदीदा विषय बॉलीवुड के बारे में बात करते हुए. 29 वर्षीय इस ऐञ्चटर का फंडा बिल्कुल साफ था. पूरे आत्मविश्वास और ढिठाई से यह कहना कि मैं तो ऐसा ही हूं. जाहिर है, इससे उन्हें पसंद और नापसंद करने वालों के बीच की लाइन भी साफ हो जाती है. लेकिन यहां उनकी 77 मिनट की बातचीत का नतीजा यह रहा कि सबने उन्हें पसंद ही किया. पूरे समय एक हाथ ऐसे बंधा था, जैसे अभिवादन में टांग रखा हो. हालांकि यह बंधा हुआ हाथ उनकी आने वाली फिल्म बाजीराव मस्तानी की शूटिंग के दौरान लगी चोट का नतीजा था. उनका करिश्मा दिख रहा था. सिनेमा के लिए दीवानगी नजर आ रही थी. और सूचनाओं से वे इस कदर लबरेज थे कि दर्शकों को बांधे रख सकते थे.

''यहां मैं सौगंध खाता हूं कि पूरी जिंदगी अपनी सारी क्षमता और ताकत के साथ आपका मनोरंजन करता रहूंगा.'' 
1940 से लेकर 2010 में आई फिल्म बैंड बाजा बारात तक हिंदी सिनेमा के अब तक के पूरे इतिहास को दिखाने के लिए रणवीर ने एक पावर पॉइंट प्रजेंटेशन भी बनाया था. हिंदी फिल्मों का जश्न मनाने और कई बार उस पर मुस्कराने के बावजूद उन्होंने कहीं भी बॉलीवुड की अजीबो-गरीब चीजों का मजाक नहीं उड़ाया. सिनेमा के उन पलों के बारे में भी बात की, जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा. फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के लोकप्रिय डायलॉग के साथ रणवीर ने अमेरिका में छात्रों से भरे कमरे में अपना परिचय दिया था. संवादों और नृत्य की अदाओं से उन्होंने दर्शकों का मनोरंजन किया.

आने वाले वर्षों में बॉलीवुड के बारे में दो तरीकों से बात होगी- बीबी और एबी. यानी बच्चन से पहले और बच्चन के बाद.
अपना प्रजेंटेशन बनाने के लिए रणवीर ने फिल्म निर्माता आदित्य चोपड़ा, करन जौहर, विक्रमादित्य मोटवाणे, अली अब्बास जफर और अपने को-ऐक्टर अर्जुन कपूर का इंटरव्यू लिया था. इसमें न सिर्फ रणवीर, बल्कि बाकियों की सिनेमाई दिलचस्पी की झलक मिली.

''मुझमें बॉलीवुड का ऐसा कीड़ा था कि मुझे लगता था कि स्कारफेस दरअसल वास्तवः द रिएलिटी फिल्म की कॉपी है.''
एक घंटे तक उत्साह और ऊर्जा से लैस बॉलीवुड की ऊंचाई के बारे में बात करने के बाद आखिर में रणवीर ने बातचीत को सुखद मोड़ पर खत्म नहीं किया. उन्होंने माना कि ''इंडस्ट्री संकट के दौर'' से गुजर रही है. उन्होंने दिक्कतों की फेहरिस्त गिनाई. रीमेक और सीञ्चवल बनाने के बुखार से लेकर, फिल्मों के लहीम-शहीम बजट और अभिनेताओं का अनाप-शनाप पैसों की मांग करना. कल्पना में फलने-फूलने वाली इंडस्ट्री की बातों को रणवीर ने यथार्थवाद के मोड़ पर लाकर खत्म किया.    

''लोग फिल्म देखने नहीं आ रहे हैं, जब तक उन्हें पता न हो कि यह कुछ कमाल की फिल्म है. 2012 से लेकर  2015 तक साल-दर-साल दर्शकों की संख्या कम हो रही है. हमें अपनी कहानियों को और बेहतर बनाने की जरूरत है.''

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