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कॉमेडी कुछ कम, मगर एक्शन जबरदस्त, लौट आया है सिंघम

सिंघम का अपने सहयोगियों के मान सम्मान के लिए लड़ना, लोगों की आस्था में अपनी आस्था रखना, मां-बाप के प्रति अगाध श्रद्धा रखना, प्रेम के ऊपर फर्ज को रखना, प्रेम में कुछ अटपटाहट बनाए रखना. मगर जब उसी प्रेम की आन पर आ जाए तो रौद्र रूप धारण कर लेना. ये सब हम भारतीयों को एक किस्म का दिमागी विस्थापन मुहैया कराता है. कह सकते हैं कि पूरा सिनेमा ही एक फंतासी में संतुष्टि पाने का जतन है.

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aajtak.in
सौरभ द्विवेदीनई दिल्ली, 15 August 2014
कॉमेडी कुछ कम, मगर एक्शन जबरदस्त, लौट आया है सिंघम सिंघम रिटर्न्स: फंतासी में संतुष्टि पाने का जतन

फिल्म रिव्यूः सिंघम रिटर्न्स
एक्टरः अजय देवगन, करीना कपूर, अमोल गुप्ते, जाकिर हुसैन, अनुपम खेर, महेश मांजरेकर
डायरेक्टरः रोहित शेट्टी
ड्यूरेशनः 2 घंटे 22 मिनट
रेटिंगः 5 में 3 स्टार

सिंघम और उसके साथी पुलिस वाले भ्रष्ट नेता और महाभ्रष्ट बाबा के पीछे हैं. नेता और बाबा भागकर एक घर के अंदर बंद हो जाते हैं. सिंघम गुस्से में दरवाजे तक पहुंचता है. फिर किनारे हो जाता है और पलटकर बोलता है, 'दया दरवाजा तोड़ दो'. पुलिस फोर्स दो कतारों में काई सी फट जाती है. और फिर आता है दया. हमारा दया. सीआईडी वाला दया. दुनिया में सबसे ज्यादा दरवाजे तोड़ने का रेकॉर्डधारी दया. और दरवाजा टूट जाता है. पब्लिक हंसी से लोट पोट हो जाती है. मगर ये मौके बार बार नहीं आते. और यहीं पर सिंघम रिटर्न्स अपनी पहली फिल्म के मुकाबले कुछ हल्की पड़ जाती है. सिंघम का मतलब है जबरदस्त एक्शन और कॉमेडी. सिंघम रिटर्न्स में एक्शन कमाल का है. पर कॉमेडी के नाम पर नाटकीय हरकतें करते बाबा हैं. 'जब वी मेट' की गीत की परछाईं बनने की कोशिश करती जबरन क्यूट दिखती करीना हैं.

कॉमेडी का एंगल छोड़ दें तो फिल्म में एक और कमी स्पष्ट नजर आती है. वह कमी है समस्या के समाधान में दिखाए गए विजन की. उस पर बात बाद में, फिलहाल जनता को सलाह. 'सिंघम रिटर्न्स' रफ्तार भरा एक्शन ड्रामा है. इस बार विलेन ज्यादा हैं, ताकतवर हैं और समस्या भी विकराल है. काले धन की समस्या. फिल्म में अन्ना हजारे और आम आदमी पार्टी मूवमेंट की याद दिलाते प्रसंग भी हैं. अगर आप एक्शन के दीवाने हैं तो ये फिल्म आपके लिए है. फैमिली क्लास भी इसे देख सकती है क्योंकि रोहित शेट्टी अपनी फिल्मों में साफ सुथरा पारिवारिक रोमांस दिखाते हैं.

फिल्म की कहानी रफ्तार से आगे बढ़ती है. गाने कुल तीन हैं. एक रोमैंटिक नंबर, एक आध्यात्मिक नंबर और आखिर में आइटम सॉन्ग आता है 'माझी सटकली'. ये तीनों ही फिल्म के ट्रैक को ज्यादा स्लो नहीं करते हैं. अजय देवगन की एक्टिंग दमदार है. मगर उम्र झलकने लगी है. करीना कपूर की अजय के साथ पेयरिंग फ्रेश लगती है. मगर अब डंब क्यूट रोल करने का उनका वक्त बीत गया. आलिया आ गई है न. इसके अलावा बाबा के रोल में अमोल गुप्ते हैं. वह बिलाशक बेहद काबिल एक्टर हैं. मगर यहां पर रोहित उनके किरदार को कई सतहें मुहैया कराने के बजाय बहुत प्रकट कर देते हैं. इस चक्कर में बाबा भौंडा बहरूपिया बनकर रह जाता है. उसकी कमीनगी कुछ कम उभर पाती है. करप्ट नेता के रोल में जाकिर हुसैन भी औसत ही नजर आते हैं. फिल्म के बाकी किरदार भी अपनी जगह ठीक हैं.अनुपम खेर अपने रोल में सरकार के नेता की याद दिलाते हैं और संयत रहते हैं. मुख्यमंत्री के रोल में महेश मांजरेकर नजर आते हैं. उन्होंने अपना रोल अच्छे से निभाया है और आखिर तक रहस्य की एक बारीक परत ओढ़े रखी है.

'सिंघम रिटर्न्स' एक बार फिर बाजीराव सिंघम की पुलिसगीरी पर फोकस करती है. शिवगढ़ का यह जमीनी लड़का मुंबई पुलिस का डीसीपी है. वह अपराध के खात्मे और इसकी राह पर शुरुआती कदम रखने वालों में सुधार पर यकीन करता है. उसकी बचपन की दोस्त है अवनी, जिसका भाई प्रकाश एक नए आंदोलन से उभरी पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ रहा है. इस पार्टी को आदर्शवादी गुरु जी का साया मिला हुआ है. फिर एक दिन सिंघम के दल का एक सिपाही करोडों रुपये के काले धन के साथ मरा मिलता है. यहां से जब जांच शुरू होती है, तो गुरु जी के विरोधी दल के नेता और बाबा लपेटे में आते हैं. जांच से बचने के लिए वह पलटवार करते हैं और इस तरह घात प्रतिघात का खेल शुरू होता है.

'सिंघम रिटर्न्स' जो एक्शन ऑन स्पॉट वाला साल्यूशन देती है, वह प्रकट रूप में तो बहुत लुभाता है. मगर संविधान की तय लाइन छोड़कर कभी वर्दी उतारकर तो कभी सड़कों पर पुलिस मार्च कर अपराधियों को सजा देना एक गलत किस्म का संदेश देता है.

इस फिल्म के जरिए हमें रोहित शेट्टी स्टाइल ऑफ सिनेमा की भी कुछ बारीकियां समझ आती हैं. सुभाष घई की शुरुआती फिल्मों 'कालीचरण' और 'विश्वनाथ' की तर्ज पर वह अपने लीड हीरो के साथ सिग्नेचर ट्यून का इस्तेमाल करते हैं. शेर की दहाड़ और सिंघम के गान वाली एंट्री फिल्म और दर्शकों, दोनों में जोश भर देती है. इसके अलावा सिंघम फ्रेंचाइजी हमारी खारी ग्रंथि को भी बखूबी सहलाती है. इस देश का नागरिक पुलिसवालों से डरता है. उनसे बचता है. प्यार तो कतई नहीं करता है. छुटपन से कहावत सुनाई सिखाई जाती है. पुलिस वालों की न दोस्ती भली, न दुश्मनी. ऐसे में सिंघम हमें सहलाता है. एक छद्म भरोसा भरता है. या सकारात्मक रहें तो कहें कि जरूरी हौसला देता है. सब पुलिस वाले एक से नहीं होते. उनके बीच कुछ माटी के लाल भी होते हैं .जो गलत को आंखों में आंखें डालकर गलत कहते हैं और उसे सही करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं.

सिंघम का अपने सहयोगियों के मान सम्मान के लिए लड़ना, लोगों की आस्था में अपनी आस्था रखना, मां-बाप के प्रति अगाध श्रद्धा रखना, प्रेम के ऊपर फर्ज को रखना, प्रेम में कुछ अटपटाहट बनाए रखना. मगर जब उसी प्रेम की आन पर आ जाए तो रौद्र रूप धारण कर लेना. ये सब हम भारतीयों को एक किस्म का दिमागी विस्थापन मुहैया कराता है. कह सकते हैं कि पूरा सिनेमा ही एक फंतासी में संतुष्टि पाने का जतन है. तो हम कह सकते हैं कि 'सिंघम रिटर्न्स' एक बार फिर यह सब जतन से करता है. बुरे नेता और अपराधी अपनी गति को प्राप्त होते हैं. प्यार को प्यार मिलता है. खोया हुआ सम्मान मिलता है और कुल जमा न्याय होता है.

'सिंघम रिटर्न्स' रोहित शेट्टी की फिल्म है. इसके एक्शन में उनकी कल्पनाशीलता और नवाचार साफ नजर आता है. ये बिलाशक हॉलीवुड के टक्कर का है. फिल्म के दो गाने ठीकठाक हैं. लास्ट में आने वाला योयो हनी सिंह का आइटम नंबर मजेदार है और अगर आप फिल्म देखने जाएं तो अंत में इसे ठहरकर पूरा जरूर देखें. उस छोटे चीखते बच्चे की खातिर. एंटरटेनमेंट के डायरेक्टर साजिद फरहाद ने अपने मूल कर्म को उम्दा अंजाम दिया. उन्होंने कई कैची डायलॉग लिखे हैं. फिल्म में मराठी भाषा का जमकर इस्तेमाल है, पर ये कहीं से भी गैरमराठी दर्शकों को अखरेगा नहीं, ऐसा मेरा यकीन है. कुल मिलाकर फिल्म ठीक ठाक एंटरटेनमेंट पैकेज पेश कर लेती है.

आपको कैसी लगी ये फिल्म. कमेंट बॉक्स में बताएं. आज तक के मूवी क्रिटिक सौरभ द्विवेदी को आप ट्विटर पर फॉलो कर सकते हैं. उनका हैंडल है @saurabhaajtak

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