एडवांस्ड सर्च

जब मैंने पापा से कहा था- मुझे सिर्फ पास करवा दो...

बिहार बोर्ड के टॉपर्स के किस्से को लोग चने-चबैने और चाय की चुस्कियों के साथ सुन-सुना रहे हैं. ऐसे में पढ़ लीजिए बिहार राज्य के ही एक पूर्व छात्र के दर्द को. कस्सम से कलेेजे पर हाथ धर कर लिखा है...

Advertisement
विष्णु नारायणनई दिल्ली, 17 February 2017
जब मैंने पापा से कहा था- मुझे  सिर्फ पास करवा दो... Failing Trail

बात उस जमाने की है जब हम स्कूल में हुआ करते थे. हम स्कूल की बात तो कुछ ऐसे कर रहे हैं जैसे युग बीत गया हो. हां आज स्कूल से रुखसत हुए एक दशक तो बीत ही गया है. स्कूल और क्लासेस हमें इसलिए भी अधिक याद आते हैं कि वहां रहने का हमें लंबा तजुर्बा रहा है. एक ही क्लास में दो बार तो कभी एक ही क्लास में दो साल से भी अधिक रहना. उन दिनों हम पर अपना बेस मजबूत करने का भूत सवार था.

हम क्लासेस में कम और खेल के मैदान, जिम्नेजियम और दोस्तों की अड़ी पर ज्यादा पाए जाते थे. उन दिनों हम पर कुछ कर गुजरने का भूत सवार था. वैसा जैसा कोई न कर पाया हो. उन दिनों हम पढ़ाई के अलावा सब-कुछ किया करते थे. 12वीं की परीक्षा में तो ऐसे अटके कि लगा कि अब कभी नैया पार नहीं होगी. मां और नानी ने न जाने कौन-कौन से देवी-देवताओं से मन्नतें मांग ली थी. गांव के डीह बाबा से लेकर ब्रह्म बाबा तक सभी जगह दिया जलाने और प्रसाद चढ़ाने की मन्नत, और हम भी थे कि बस अड़ ही गए थे.

उन दिनों हमें मैथ्स पढ़ाने वाले शिक्षक जो संयोगवश हमारे प्रिंसिपल भी थे. उन्होंने एक बार बाबूजी को फोन किया और बाबूजी को एक पुरानी और प्रचलित कहावत सुनाई कि पूत कपूत तो का धन संचय और पूत सपूत तो का धन संचय. अर्थात् थोड़ा ले-दे कर ही अपने बउआ की नैया पार करवा दीजिए. हो सकता है आगे कुछ अच्छा बदा हो. वैसे भी स्कूली पढ़ाई और दुनियावी जिंदगी का एक-दूसरे से कुछ खास लेना-देना नहीं होता. मगर बाबूजी भी भला ऐसे कहां समझने वाले थे. कहा कि पढ़-लिख कर खुद ही पास हो जाएं तो ठीक नहीं तो हम खेती-बारी में उलझे लोगों के पास कहां इतना पैसा है कि सबकी जेबें भरी जाएं.

आज ये सारे किस्से इसलिए याद आ रहे हैं क्योंकि बिहार बोर्ड के टॉपर्स का मामला फंस सा गया है. वे आज सारी मीडिया की नजरों में हैं और उनका पोस्टमार्टम चल रहा है. हालांकि कायदे से तो ये होना चाहिए था कि उन टॉपर्स के बहाने बिहार या फिर कहें कि समस्त भारतीय शिक्षा व्यवस्था (सड़ी-गली व्यवस्था) पर बात होती. कुछ आमूलचूल बदलाव के कार्यक्रम तैयार होते लेकिन हम भारतीय भी तो सेफ खेलने के आदी हैं. हम छोटे शिकार करके ही खुश हो जाते हैं. हम व्यवस्था परिवर्तन की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं लेकिन मौका आने पर बगले झांकने लगते हैं.
बिहार राज्य तो इस मामले में हमेशा से ही अभिशप्त रहा है...

अभी पिछले वर्ष स्कूल की दीवारों पर चढ़ कर परीक्षार्थियों को चिट व पर्चियां पहुंचाने वाली तस्वीर जेहन से उतरी भी नहीं थी कि टॉपर्स का एक और बवंडर खड़ा हो गया. एक तरफ देश-दुनिया के बड़े-बड़े साहित्यकारों की कर्मभूमि तो वहीं दूसरी तरफ अधिकांश जनता निरक्षर ही रह जाती है. एक तरफ वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे धुरंधर गणितज्ञ जो आज गुमनाम से हो चुके हैं तो वहीं दूसरी तरफ गणित और साइंस से दूर भागने वाले स्टूडेंट्स की भारी जमात. आखिर बिहार के बढ़े बिना कैसे बढ़ेगा इंडिया? क्या किसी एक घिसटते राज्य (शिक्षा व्यवस्था) को छोड़ कर कभी बढ़ पाएगा इंडिया? खुद से सवाल पूछिएगा, हो सकेगा इस सवाल से ही कोई रास्ता निकले...

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
  • Aajtak Android App
  • Aajtak Android IOS
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay