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वैक्सीन के बाद बंदरों में बेअसर कोरोना, दो प्रयोगों ने जगाई उम्मीद

aajtak.in
27 May 2020
वैक्सीन के बाद बंदरों में बेअसर कोरोना, दो प्रयोगों ने जगाई उम्मीद
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कोरोना वायरस की वैक्सीन की खोज के बीच बंदरों पर की गईं दो स्टडीज उम्मीदें बढ़ाने वाली हैं. स्टडी जर्नल साइंस में प्रकाशित ये स्टडी प्रोटोटाइप वैक्सीन पर की गई है. स्टडी में ये जानने की कोशिश की गई कि SARS-CoV-2 के दोबारा संपर्क में आने पर इम्यूनिटी काम करती है या नहीं. बंदरों पर की गई स्टडी के जरिए ये समझने की कोशिश की गई कि इनमें प्राकृतिक संक्रमण या वैक्सीन से सुरक्षात्मक वायरस इम्यूनिटी विकसित होती है या नहीं.
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बोस्टन में सेंटर फॉर वायरोलॉजी एंड वैक्सीन रिसर्च के डायरेक्टर डैन बैरोच ने कहा, 'वैश्विक Covid-19 महामारी के लिए वैक्सीन को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन वर्तमान में SARS-CoV-2 वायरस के लिए सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है.'

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डैन बैरोच ने कहा, इन दो स्टडीज में पता चला कि बंदरों पर प्रोटोटाइप वैक्सीन कोरोना वायरस इंफेक्शन से बचाव करती है और संक्रमण को दोबारा फैलने से रोकती है. शोधकर्ताओं ने पहली स्टडी के लिए नौ बंदरों को संक्रमित किया.

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इन बंदरों में Covid-19 के लक्षण तो आए लेकिन साथ ही इनमें प्रोटेक्टिव एंटीबॉडी विकसित हो गई जिसकी वजह से ये बंदर कुछ दिनों में ही ठीक हो गए. इनकी इम्यूनिटी की जांच करने के लिए इन्हें SARS-CoV-2 के संपर्क में दोबारा लाया गया लेकिन इस बार उनमें वायरस के कोई लक्षण नहीं दिखे.

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स्टडी के लेखकों ने आगाह किया कि बंदरों और मनुष्यों में होने वाले SARS-CoV-2 के संक्रमण के अंतर के कारण आगे भी इस तरह के शोध की आवश्यकता होगी. उन्होंने कहा, 'SARS-CoV-2 संक्रमण मनुष्यों को दोबारा वायरस के संपर्क में आने के खतरे को प्रभावी रूप कम करता है या नहीं, इसके लिए कई क्लीनिकल स्टडीज करने की जरूरत होगी.
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दूसरी स्टडी के जिंगयू यू के नेतृत्व में की गई जिसमें  प्रोटेक्टिव एंटीबॉडी विकसित करने के लिए 35 बंदरों को प्रोटोटाइप वैक्सीन दी गई. स्टडी के अनुसार, छह सप्ताह बाद इन्हें कोरोना वायरस के संपर्क में लाया गया. तब तक इनके खून में पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडी विकसित हो चुके थे जिससे इन पर वायरस का प्रभाव बेअसर रहा.

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शोधकर्ताओं ने कहा कि बंदरों का एंटीबॉडी स्तर, कोरोना वायरस से ठीक हो चुके मरीजों के समान ही पाया गया. उन्होंने कहा कि इससे इंसानों के लिए एक प्रभावी वैक्सीन बनने की उम्मीद लगाई जा सकती है.

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स्टडी के लेखकों ने कहा, 'आगे के रिसर्च में यह जानने की कोशिश की जाएगी कि यह प्रोटेक्टिव इम्यूनिटी शरीर में कितनी देर तक रहती है.

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