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दिल्ली के मासूमों को निगल रहा है डेंगू

दिल्ली में आजकल अस्पतालों में भीड़ उमड़ी पड़ी है. मरीज़ों की भीड़. डेंगू के मरीजों की भीड़. भीड़ इतनी कि एक-एक बेड इस वक्त अनमोल है.

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aajtak. in[Edited By: रोहित उपाध्याय]नई दिल्ली, 17 September 2015
दिल्ली के मासूमों को निगल रहा है डेंगू वारदात

दिल्ली में आजकल अस्पतालों में भीड़ उमड़ी पड़ी है. मरीज़ों की भीड़. डेंगू के मरीजों की भीड़. भीड़ इतनी कि एक-एक बेड इस वक्त अनमोल है. कितना अनमोल इसका अंदाजा इसी से लगा लीजिए कि पिछले एक हफ्ते में ही दिल्ली में दो बच्चे सिर्फ इसलिए मर गए क्योंकि वक्त रहते उन्हें दिल्ली के किसी अस्पताल ने बेड ही नहीं दिया था. अब इसी माहौल के बीच एक रोज अचानक मुनमुन बीमार पड़ जाती है. मुनमुन दिल्ली की एक बकरी का नाम है यानी एक जानवर.

अविनाश, सात साल का वही बच्चा जो भरी-पूरी दिल्ली में एक अदद बेड ना मिल पाने की वजह से मर गया, और उसके सदमे में चौथी मंजिल से छलांग मार कर उसके मां-बाप भी मर गए. अविनाश को डेंगू था. अमन, पांच साल का वो दूसरा बच्चा जिसकी ज़िंदगी भी एक अदद बेड ने छीन ली. अस्पताल दर अस्पताल भटकते-भटकते उसने भी दम तोड़ दिया. अमन को भी डेंगू था.

अब जान तो जान होती है. फिर चाहे जानवर की ही क्यों ना हो. ये है तो बकरी पर नाम मुनमुन है. बस हफ्ता भर पहते तक बिल्कुल ठीक थी. कुछ दिन पहले ही दो तंदुरुस्त बकरी को जन्म भी दिया. मालिक अनीस ने दोनों का नाम रखा बड़की और छुटकी. पर बड़की-छुटकी को पैदा करने के बाद से मुनमुन दूध कम दे रही थी. लिहाजा अनीस मुनमुन को अस्पताल ले गए.

अनीस, इंसानों की तरह अभी शायद दिल्ली में जानवरों के इतने बुरे दिन नहीं आए हैं. इसीलिए अस्पताल में डाक्टरों ने अविनाश या अमन की तरह मुनमुन को बेड ना होने का बहाना बना कर लौटाया नहीं. बल्कि उसका इलाज किया. पता लगाने की कोशिश की कि बड़की-छुटकी को पैदा करने के बाद मुनमुन दूध क्यों कम दे रही है?

इसके बाद अपनी समझ के हिसाब से डाक्टरों ने मुनमुन को इंजेक्शन लगाया और अनीस से कहा अब सब ठीक हो जाएगा इसे घर ले जाओ. मगर इंजेक्शन लगाने के 15 मिनट के अंदर-अंदर अचानक मुनमुन तड़पने लगी और फिर तड़पते-तड़पते उसने दम तोड़ दिया.

अच्छी-खासी मुनुमन को इंजेक्शन लगाने के फौरन बाद यूं मरता देख अनीस को शक हुआ कि जरूर इलाज में गड़बड़ी हुई है. लिहाजा वो मुनमुन को लेकर वापस अस्पताल पहुंच गया. और वहां हंगामा शुरू कर दिया. लोग भी जमा हो गए. फिर सौ नंबर पर फोन गया. पहले पीसीआर आई बाद में लोकल पुलिस.

अनीस की दलील में दम था कि अच्छी-खासी मुनुमन इंजेक्शन लगते ही कैसे मर गई. पुलिस को भी बात जम गई. डाक्टरों से बात हुई. फिर तय हुआ कि क्य़ों ना मुनमुन का पोस्टमार्टम करवा लिया जाए ताकि पता चल जाए कि मौत गलत इंजेक्शन की वजह से हुई है या फिर किसी और वजह से. इसी के बाद तीन डाक्टरों का एक बोर्ड बनाया गया. और उस बोर्ड ने बाकायदा मुनमुन का पोस्टमार्टम किया. जिसकी रिपोर्ट गुरूवार से शुक्रवार तक आने की उम्मीद है.

इस बकरी की जान ऐसे ना जाती तो भी शायद आखिर में इसकी किस्मत में भी किसी देग में पकना या तंदूर में सिकना ही लिखा होगा या बहुत मुमकिन है कि अगले महीने बकरीद पर ही कुर्बान हो जाना. मगर अनीस को लगता है कि उसकी मुनमुन की मौत डाक्टरों की लापरवाही और गलत इलाज की वजह से हुई है. और वो मुनमुन की ऐसी मौत के खिलाफ चुप नहीं बैठेगा.

अब अनीस को कौन समझाए कि कम से कम दिल्ली में एक जानवर को डाक्टरों ने देखा, उसे अस्पताल के अंदर आने दिया. उसका इलाज किया, उसे इंजेक्शन लगाया. वर्ना अविनाश और अमन तो इंसान होते हुए भी बिना बेड के मर गए.

 

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