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छोटी सी जिंदगी, सैकड़ों स्पीच: मौत से कुछ घंटे पहले आई थी आयशा की बुक

aajtak.in
10 September 2019
छोटी सी जिंदगी, सैकड़ों स्पीच: मौत से कुछ घंटे पहले आई थी आयशा की बुक
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छोटी-सी उम्र को बड़ा करके जीने वाली आयशा चौधरी अपने जीवन से लाखों को प्रेरित करके चली गईं. गंभीर बीमारी से जूझ रही आयशा को दुनिया से गए हुए चार साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी लोग उसे याद कर रहे हैं. अब तो जल्द ही प्रियंका चोपड़ा और फरहान अख्तर स्टारर फिल्म द स्काई इज पिंक भी रिलीज होने वाली है. ये फिल्म आयशा के जीवन पर बनी है जिसमें ये दोनों अदाकार उसके पैरेंट्स के रोल में नजर आएंगे. आइए जानें, कौन थीं आयशा जो 18 साल की उम्र में दुनिया से रुखसत हो गईं, लेकिन लाखों को खुशहाल जिन्दगी जीने का फलसफा दे गईं.

फोटो: आयशा, जिस पर बन रही The Sky is Pink फिल्म
छोटी सी जिंदगी, सैकड़ों स्पीच: मौत से कुछ घंटे पहले आई थी आयशा की बुक
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गुरुग्राम की रहने वाली 13 साल की मोटिवेशनल स्‍पीकर आयशा चौधरी को जन्म के समय से ही SCID (Severe Combined Immuno-Deficiency) नाम की बीमारी थी. जब वो सिर्फ 6 महीने की थीं, तब उनका बोन मैरो ट्रांसप्लान्ट हुआ था. फिर 13 साल की उम्र में pulmonary fibrosis नामक बीमारी हो गई थी, जिससे उनके फेफड़े सिर्फ 20 फीसदी काम करते थे. लेकिन इससे उनके उत्साह में कमी नहीं आई. बहुत कम उम्र में ही उन्होंने TEDx, INK जैसे प्लेटफॉर्म पर बोलना शुरू कर दिया था. 2015 में 18 साल की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.

फोटो: आयशा
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इंक टॉक में आयशा की मां अदिति चौधरी ने बताया कि आयशा जब छह महीने की थीं, तभी डॉक्टरों ने बताया कि उसे एससीआईडी (Severe Combined Immuno-Deficiency) की समस्या है. ये वो बीमारी है जिसमें बच्चे बिना रोग प्रतिरोधक क्षमता सिस्टम के पैदा होते हैं, इससे उनकी किसी भी बीमारी यहां तक कि जुकाम से भी मौत हो सकती है. उसके लिए हमने यूनाइटेड किंगडम में जाकर उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराया.

फोटो: The Sky is Pink फिल्म का पोस्टर
छोटी सी जिंदगी, सैकड़ों स्पीच: मौत से कुछ घंटे पहले आई थी आयशा की बुक
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डॉक्टर ने कहा था कि अगर बोन मैरो ट्रांसप्लांट नहीं होता तो वो सिर्फ एक साल ही जिएंगी,  लेकिन ट्रांसप्लांट के बाद ये खतरा पूरी तरह से खत्म नहीं होता. फिर भी आयशा को इस प्रत्यारोपण ने एससीआईडी ​​में काफी मदद की. लेकिन, 13 साल की उम्र में उसे पल्मोनरी फाइब्रोसिस बीमारी हो गईं. ये बीमारी फेफड़ों के ऊतकों के क्षतिग्रस्त होने पर होती है, जिससे आपके फेफड़ों को ठीक से काम करना मुश्किल हो जाता है. ये वो दौर था जब आयशा घुटन भरी जिंदगी को बहुत करीब से महसूस कर रही थीं, सोचकर देखिए, वो जिन्दगी जहां सांस लेना मुश्किल हो. फिर भी वो मुस्कुरा रही थीं.

फोटो: The Sky is Pink फिल्म का नया पोस्टर
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तीन फरवरी 2014 को जब आयशा महज 17 साल की थीं, उसने TedX में बोलते हुए कहा कि मेरी कहानी बहुत सारे लोगों से अलग है. मेरे फेफड़ों की क्षमता सिर्फ 20 परसेंट है. मेरी जिन्दगी बहुत कठिन है, कई स्लीपलेस नाइट मैंने बिताई हैं. लेकिन मैंने ऐसा सोचा कि मैं अकेली नहीं हूं इस घुटन के संसार में. हम सभी को मरना है एक दिन. आज जो मेरे आसपास हैं ज्यादा से ज्यादा आने वाले सौ सालों में मर जाएंगे तो क्यों न हम आज और इस पल को जिएं.

फोटो: The Sky is Pink फिल्म का पोस्टर
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एक वो दौर आया जब उसके साथ के दूसरे बच्चों ने उसे कमजोर समझकर इग्नोर करना शुरू कर दिया था. आयशा उस वक्त जब उसके दोस्त उसे इग्नोर कर रहे थे, वो और मजबूत होती जा रही थीं. यही वो समय था जब वो अपनी बातें फोन पर रिकॉर्ड करने लगीं, वो उसकी खूबसूरत फीलिंग्स थीं, जो सभी को प्रेरित करती थीं. अब उसे मोटिवेशन स्पीच के लिए बुलाया गया तो वो तैयार हो गईं. आयशा की सेहत जब बहुत गिरने लगी तो उसने बेड पर लेटे-लेटे ही लिखना शुरू कर दिया था. वो कम से कम 5000 शब्द रोज लिखती थीं. उनके इन्हीं लेखों ने एक किताब का रूप ले लिया. उसकी किताब ‘My Little Epiphanies‘  उनकी मौत से कुछ घंटे पहले ही छपकर आई थी. उनकी किताब आज भी लोगों को प्रेरित कर रही है, शायद इसी प्रेरणा को फिल्म में ढाला गया है.

फोटो: आयशा की किताब का कवर पेज
Image Credit: Bloomsberry.png
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