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गरीब, कचरा बीनने वाले बच्चों के लिए पुलिसवाले ने खोला स्कूल

विजय चौहान
01 November 2019
गरीब, कचरा बीनने वाले बच्चों के लिए पुलिसवाले ने खोला स्कूल
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चूरु पुलिस में कांस्टेबल धर्मवीर ने 5 बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया था. देखते ही देखते आज बच्चों की संख्या 470 हो गई है. जिसमें लगभग 250 बच्चे 5वीं कक्षा से आगे की पढाई के लिए अन्य स्कूल मे चले गए हैं. धर्मवीर गरीब, कूड़ा कचरा बीनने वाले और भीख मांगने वाले बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं. इन बच्चों के लिए उन्होंने एक स्कूल की स्थापना भी की है. आइए जानते हैं कौन हैं ये पुुलिसवाला. कैसे शुरू किया बच्चों को पढ़ाना.
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धर्मवीर कांस्टेबल राजस्थान पुलिस ने बच्चों को शिक्षित करने के लिए एक स्कूल बनाया है. ये ऐसे बच्चे हैं जो  सड़कों पर भीख मांगते हैं और कूड़ा कचरा बीनते हैं. आज उनके कारण ही बच्चे भीक्षावृति, बाल मजदुरी और कचरा बीनने के कामों से मुक्त होकर जीवन की मुख्य धारा से जुड चुके हैं.
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कैसे शुरू हुआ स्कूल

1 जनवरी 2016 मे महिला थाना परिसर के पास खाली पडी जमीन में खुले आसमान के नीचे संचालित इस अनौपचारिक स्कूल को 'आपणी पाठशाला' नाम दिया गया. अब ये स्कूल एक चार बड़े बड़े कमरों वाले सुसज्जित भवन का रूप ले चुका है.



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इस समय आया स्कूल खोलने का ख्याल


दरअसल राजस्थान के चुरू पुलिस में कार्यरत सिपाही धर्मवीर के पास पुलिस लाइन में 2 बच्चे भीख मांगने पहुंचे. जो स्वयं को बिना मां-बाप का बता रहे थे. हकीकत जाने के लिए वे उनकी झुग्गी में गए. गरीब बच्चों के लिए कुछ करने की सोचा.  जिसके बाद उन्होंने भीख मांगने वाले इन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. 1 जनवरी 2016 को महिला थाने मे आसमान के निचे अस्थाई स्कूल शुरू कर दी गई तथा झुग्गी-झौंपडियों में रहने वाले घुमंतू और होटल ढाबों पर काम करने वाले बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया.


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लेकिन अभिभावक अपनी आर्थिक परेशानियों के चलते इन बच्चों को स्कूल भेजने को तैयार नहीं थे. वहीं पुलिस की ड्यूटी के अलावा इस काम में जुटे सिपाही धर्मवीर बच्चों को नियमित योगाभ्यास भी करवाते हैं. इन प्रयासों की बदौलत सप्ताह में एक-दो बार नहाने वाले बच्चे आज नियमित रूप से न केवल नहाते हैं. बल्कि पढ़-लिखकर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो रहे हैं.
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सुबह 10 से दोपहर तीन बजे तक संचालित इस पाठशाला में आखर ज्ञान करवाने की जिम्मेदारी कांस्टेबल धर्मवीर तीन महिला कांस्टेबल और तीन अन्य समाजिक कार्यकर्ता निभा रहे हैं. बिना किसी संसाधनों के शुरू की गई इस पाठशाला में बच्चों के रुझान को देखते दानदाताओं और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा धीरे धीरे सारी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाने लगी है. अब वह बच्चों को  साबुन, तेल, मिर्च-मसाला, चप्पल, कपड़े आदि सामान देे रहे हैं.

धर्मवीर का कहना है कि उनका उद्देश्य है कि इन बच्चों को पढ़ा लिखाकर इतना काबिल बना देंगे कि ये बच्चे बडे मुख्यधारा से जुडकर सही रास्ता अपने आप चुन लें.
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आगे इन्हें अगर करियर बनाने के लिए किन्हीं संसाधनों की आवश्यकता होगी तो वह भी इन्हे मुहैय्या कराई जाएगी. आज बच्चों को स्कूल लाने ले जाने के लिए एक वैन की व्यवस्था की गई है जो उन्हें झुग्गियों से लाने ओर लौटाने के लिए काम मे ली जा रही है.


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इसके अलावा, पोशाक, भोजन, जूते और अन्य सभी अध्ययन सामग्री भी मुफ्त प्रदान की जाती हैं. धरमवीर कहते हैं कि शुरुआत में बच्चों और परिजनो को पढने लिखने के लिए सहमत करना बडा मुश्किल था. लेकिन जब उन्हें कारण पता चला कि उन्हें भीख मांगने के लिए प्रेरित किया गया था, तो यह स्पष्ट था कि अगर बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाती हैं तो वे अध्ययन के लिए आते रहेंगे.
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आज आपणी पाठशाला 4 बडे कमरों में संचालित हो रही है जिसमें सभी व्यवस्था की गई है बच्चों के बैठने के लिए कुर्सियां, मीठे पानी की व्यवस्था, मनोरंजन के लिए एलईडी, खेलकूद के साधन, सुबह और दोपहर मे खाने की व्यवस्था, पुस्तके, ड्रेस, बैग जुते, लाने छोडने की वैन उपलब्ध है.  उन्होंने बताया जब इस बारे में छात्र छात्राओं को पुछा गया तो उसने बताया मुझे हिंदी- इंग्लिश आती है ओर तोतली आवाज में बोला मैं पढ लिखकर बहुत बड़ा आदमी बनना चहता हूं.

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