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करतारपुर कॉरिडोर से भारत नहीं PAK को करोड़ों का फायदा!

aajtak.in
08 November 2019
करतारपुर कॉरिडोर से भारत नहीं PAK को करोड़ों का फायदा!
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करतारपुर कॉरिडोर सिखों का पवित्र तीर्थ स्थल है. यह सिखों के प्रथम गुरु, गुरुनानक देव जी का निवास स्थान था. अपने जीवन के अंतिम दिन उन्होंने यही बिताए और यहीं उनका निधन हुआ था. उनके निधन के पश्चात उनकी याद में यहां पर गुरुद्वारा बनाया गया था. जिसका नाम रखा गया 'गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर'. आपको बता दें, करतारपुर साहिब पाकिस्तान के नारोवाल में जिले में स्थित है. आइए जानते हैं इसके इतिहास के बारे में.
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इसे दुनिया का सबसे बड़ा गुरुद्वारा माना जाता है. ये जगह भारतीय सीमा से 3 से 4 किलोमीटर और लाहौर से करीब 120 किलोमीटर की दूरी पर है. ऐसा माना जाता है जिस स्थान पर ये गुरुद्वारा बना है वहीं पर 22 सितंबर 1539 को गुरुनानक देवजी ने आखिरी सांस ली थी.



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मान्यताओं के मुताबिक  सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक 1522 में करतारपुर आए थे. माना जाता है गुरु नानक ने अपनी जिंदगी के आखिरी 17 साल 5 महीने 9 दिन यहीं गुजारे थे. उनका सारा परिवार यहीं आकर बस गया था. उनके माता-पिता और उनका देहांत भी यहीं पर हुआ था. इस लिहाज से यह पवित्र स्थल सिखों के मन से जुड़ा धार्मिक स्थान है.
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जानें- क्यों खास है करतारपुर साहिब कॉरिडोर


करतारपुर साहिब को दुनिया का सबसे पहला और सबसे बड़ा गुरुद्वारा माना गया है. जिसकी नींव गुरुनानक देव जी ने रखी थी और इसी स्थान पर उन्होंने अपने जीवन के आखिरी क्षण बिताए थे. हालांकि ये गुरुद्वारा रावी नदी में आई बाढ़ के कारण बह गया था. इसके बाद गुरुद्वारे का पुन: निर्माण महाराजा रंजीत ने किया था.
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करतारपुर साहिब कॉरिडोर बनने से पहले कैसे दर्शन करते थे श्रद्धालु?


सबसे पहले आपको बता दें, भारत- पाकिस्तान बंटवारे के समय ये गुरुद्वारा पाकिस्तान में चला गया था. जिसकी वजह से भारत के नागरिकों को करतारपुर साहिब के दर्शन करने के लिए वीजा की जरूरत पड़ती थी. जो लोग पाकिस्तान करतारपुर साहिब के दर्शन करने नहीं जा पाते थे, वह भारतीय सीमा में डेरा बाबा नानक स्थित गुरुद्वारा शहीद बाबा सिद्ध सैन रंधावा में दूरबीन की मदद से दर्शन करते हैं. हालांकि अब करतारपुर साहिब कॉरिडोर खुलने के बाद भारत के श्रद्धालु सीधे जाकर दर्शन कर सकते हैं. क्योंकि अब वीजा की जरूरत नहीं है.
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क्यों करतारपुर साहिब कॉरिडोर को खोला जा रहा है?


करतारपुर साहिब कॉरिडोर के खुलने से सिख समुदाय के नागरिक आसानी से दर्शन कर पाएंगे. उनका सालों का इंतजार अब खत्म हो जाएगा. गुरु नानक देव का  550वां प्रकाश पर्व मनाने के लिए भारत- पाकिस्तान की दोनों सरकारों ने मंजूरी दे दी है.
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 होगी पासपोर्ट की जरूरत


करतारपुर कॉरिडोर पर पाकिस्तानी सेना ने भारतीय श्रद्धालुओं के लिए पासपोर्ट को अनिवार्य कर दिया है. इससे पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक नवंबर को अपने ट्वीट में कहा था कि करतारपुर आने वाले भारतीयों को पासपोर्ट की जरूरत नहीं है. लेकिन इमरान की पासपोर्ट छूट को उनकी सेना ने ही मानने से इनकार कर दिया है.
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ये कॉरिडोर कहां बनाया गया है?

इस कॉरिडोर को डेरा बाबा नानक जो गुरुदासपुर में है. वहां से लेकर इंटरनेशन बॉर्डर तक बनाया गया है. ये बिल्कुल एक बड़े धार्मिक स्थल के जैसे ही है. ये कॉरिडोर लगभग 3 से 4 किलोमीटर का है. बता दें, इस बनवाने के लिए दोनों देशों की सरकारों ने फंड दिया है.
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करतारपुर साहिब के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को स्लिप दी जाएगी. जिसके बाद शाम तक उन्हें भारत वापस लौटना होगा.
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कॉरिडोर बनने से पाकिस्तान को क्या फायदा होगा?


करतारपुर कॉरिडोर का शिलान्यास करोड़ों सिख तीर्थयात्रियों के लिए धार्मिक महत्व रखता है. इस सपने के सच होने के लिए उन्होंने 70 साल से अधिक समय तक इंतजार किया है, लेकिन पाकिस्तान के लिए इसका मतलब सिर्फ बिजनेस है. अंतरराष्ट्रीय ऋण के नीचे दबे पाकिस्तान के पास ये अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का एक मौका है.

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भारत ने कहा था कि सभी अवसरों पर तीर्थयात्रियों से कोई एंट्री फीस न ली जाए. लेकिन पाकिस्तान ने ये नहीं सुनी. वहीं उन्होंने करतारपुर कॉरिडोर के लिए एंट्री फीस की मांग रखी थी. जिसके बाद प्रत्येक भारतीय तीर्थयात्री से 20 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 1,400 रुपये एंट्री फीस पाकिस्तान सरकार को देनी होगी.

आपको बता दें, पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर से रोजाना 5,000 श्रद्धालुओं को दरबार साहिब जाने की इजाजत दी है. ऐसे में सिर्फ एंट्री फीस से हर रोज पाकिस्तान 71.40 लाख रुपये श्रद्धालुओं से वसूलेगा. एक महीने में यह धनराशि 21 करोड़ 42 लाख रुपये होगी और अगर सालभर की कमाई पर देखें तो पाकिस्तान करतारपुर कॉरिडोर से 257.04‬ करोड़ रुपये तक कमा सकता है.


आपको बता दें, इसके बनने से पाकिस्तान और पंजाब में टूरिज्म को काफी फायदा मिलेगा. कहा जा रहा है यात्रियों के आने जाने से वहां के आस- पास की प्रॉपर्टी की कीमतों में भी इजाफा होगा.
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करतारपुर साहिब के रोचक फैक्ट्स

आपको बता दें, 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब लाहौर बस यात्रा की थी तब पहली बार करतारपुर साहिब कॉरिडोर को बनाने का प्रस्ताव दिया था.

इतिहास के अनुसार गुरु नानक देवजी ने ही करतारपुर में ही सिख धर्म की स्थापना की थी और यही पर उनका पूरा परिवार बस गया था. रावी नदी पर उन्होंने एक नगर बसाया था और पहली बार यही पर खेती कर 'नाम जपो किरत करो, वंड छको' यानी कि (नाम जपो, मेहनत करो और बांटकर खाओ) का उपदेश दिया था.
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यही पर गुरुनानक देव 22 सितंबर 1539 समाधि ली थी. इसी गुरुद्वारे में सबसे पहले लंगर की शुरुआत हुई थी. यहां जो भी आता था खाली पेट नहीं जाता था. करतारपुर गुरुद्वारे में गुरुनानक की समाधि और कब्र अब भी मौजूद है. समाधि गुरुद्वारे के अंदर है और कब्र बाहर.
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आपको बता दें, ये करतारपुर कॉरिडोर से गुरुद्वारे तक जाने की यात्रा बिल्कुल मुफ्त होगी. लेकिन पाकिस्तान की ओर से 20 डॉलर की फीस हर श्रद्धालु से ली जाएगी. जो भारतीय रुपयों के अनुसार करीब 1400 रुपये है.
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