एडवांस्ड सर्च

Advertisement

सेल्फी का क्रेज, ऑटोग्राफ आउट ऑफ फेज़

ऑटोग्राफ को पीछे छोड़ते हुए वर्ष 2014 के दौरान भारत में सेल्फी शहरी संस्कृति के एक हिस्सा के रूप में उभर कर सामने आई. चाहे नई केश सज्जा दिखानी हो, सेलिब्रिटी से मुलाकात की खबर देनी हो, दोस्तों के साथ पार्टी या किसी सुंदर जगह की सैर की जानकारी देनी हो, सेल्फी लाखों लोगों की पसंद बन गयी.
सेल्फी का क्रेज, ऑटोग्राफ आउट ऑफ फेज़ पीएम मोदी के साथ सोनू निगम की सेल्फी
aajtak.in [Edited By: दिगपाल सिंह]कोलकाता, 23 December 2014

ऑटोग्राफ को पीछे छोड़ते हुए वर्ष 2014 के दौरान भारत में सेल्फी शहरी संस्कृति के एक हिस्सा के रूप में उभर कर सामने आई. चाहे नई केश सज्जा दिखानी हो, सेलिब्रिटी से मुलाकात की खबर देनी हो, दोस्तों के साथ पार्टी या किसी सुंदर जगह की सैर की जानकारी देनी हो, सेल्फी लाखों लोगों की पसंद बन गयी. सेल्फी का मतलब खुद की तस्वीर लेना है और फिलहाल यह खुद को अभिव्यक्ति करने का बेहतर माध्यम माना जा रहा है.

फिल्म अभिनेता शाहरुख खान जब कोलकाता में अपनी फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के प्रचार के लिए सेंट जेवियर्स कॉलेज पहुंचे थे तब किसी ने कागज-कलम निकाल कर उनसे ऑटोग्राफ की दरख्वास्त नहीं की. इसके बजाय हर कोई मोबाइल फोन उनके चेहरे के पास ले जाकर क्लिक कर रहा था ताकि उसे तुरंत-फुरंत फेसबुक पर डाला जा सके.

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के दिग्ग्ज खिलाड़ी रहे शेन वार्न ऑटोग्राफ युग की समाप्ति की घोषणा करने वाले पहले व्यक्तियों में शामिल थे. मई में, उन्होंने ट्वीट किया, ‘आठ बजे सुबह से पहले, सुबह की सैर के दौरान अब तक लोगों के साथ पांच सेल्फी ली गयी है और इसके साथ मुझे लगता है कि ऑटोग्राफ का युग समाप्त हो गया है.’

ऐसा नहीं है कि सेल्फी का जादू सिर्फ युवाओं और छात्रों पर छाया है, राजनेताओं, फिल्मी हस्तियों, खिलाड़ियों, आम लोगों और यहां तक की पोप भी सेल्फी का इस्तेमाल कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई बार सेल्फी लिए. वह जब अपनी मां से मिलने गए तो उस वक्त भी सेल्फी लिए. उनकी यह सेल्फी बेहद लोकप्रिय हुईं और बड़ी संख्या में रि-ट्वीट की गई थी.

- इनपुट भाषा से

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay