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एक महीने बाद भी हरा है उस 'काली रात' का जख्म

पूरे 13 दिन वो अस्पताल में अपनी सांसों से लड़ती रही और हम सब अपने अंदर लड़ते रहे. फिर उसकी रूह ने उस जिस्म को आखिर छोड़ ही दिया जो उसका सबसे बड़ा दुश्मन था. जिसकी चाहत किसी को दरिंदा बना सकती थी, पर वो हार गई तो क्या हम जीत गये? कहते हैं कि दुनिया के हर गम पर वक्त अपना मरहम जरूर लगाता है. इस गम को भी एक महीना हो गया, लेकिन अभी तक इसका जख्म ताजा ही है.

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aajtak.in
आजतक वेब ब्यूरोनई दिल्ली, 16 January 2013
एक महीने बाद भी हरा है उस 'काली रात' का जख्म

पूरे 13 दिन वो अस्पताल में अपनी सांसों से लड़ती रही और हम सब अपने अंदर लड़ते रहे. फिर उसकी रूह ने उस जिस्म को आखिर छोड़ ही दिया जो उसका सबसे बड़ा दुश्मन था. जिसकी चाहत किसी को दरिंदा बना सकती थी, पर वो हार गई तो क्या हम जीत गये? कहते हैं कि दुनिया के हर गम पर वक्त अपना मरहम जरूर लगाता है. इस गम को भी एक महीना हो गया, लेकिन अभी तक इसका जख्म ताजा ही है.

16 दिसंबर की रात से देश की राजधानी ही नहीं बल्कि पूरा देश शर्मसार हुआ था. चलती बस में दरिंदगी का जो मंजर उस रात घटा उसने दिल्ली पुलिस की चौकसी की कलई खोलकर रख दी.

काली रात से पहले का घटनाक्रम

रविवार के दिन एक पैरा मेडिकल छात्रा ने अपने दोस्त को कहा कि उसका फिल्म देखने का मन है. दोपहर को तैयार होकर वो अपने दोस्त के साथ फिल्म देखने गई, ये बात उस लड़की ने अपने मां और भाई को नहीं बताई थी और किसी और बहाने से घर से करीब चार बजे निकल गई. अपने दोस्त के साथ वो साकेत सेलेक्ट सिटी मॉल पहुंची. दोनों ने फिल्म लाइफ ऑफ पाई देखने का फैसला किया. शो साढ़े आठ बजे खत्म हुआ तो दोनों बाहर आए. उन्हें साकेत से पालम मोड़ तक जाना था, पर कोई ऑटो वाला चलने को तैयार ही नहीं था. बड़ी मुश्किल से बिना मीटर के एक ऑटो वाला चलने को राजी हुआ. वहां से वो दोनों ऑटो में मुनीरका बस स्टैंड पहुंचे.

दोनों बस स्टॉप पर खड़े बस का इंतजार कर रहे थे. मगर काफी देर तक कोई बस नहीं आई, फिर इसी बीच बस स्टॉप पर सफेद रंग की एक चार्टड बस आकर रुकी. उस बस में सवार एक लड़के ने ही उन्हें आवाज दी थी. पूछने पर उसने बताया कि बस पालम गांव की तरफ ही जा रही है. लिहाजा दोनों बस में सवार हो गए. जब वो बस में चढ़े तो अंदर सवारी की सीट पर तीन लोग बैठ थे. उन्हें बाद में पता चला कि वो तीनों सवारी नहीं बल्कि उसी बस के जानने वाले हैं. बस में चढ़ते ही लड़की के दोस्त ने उनसे दो बार टिकट के लिए कहा. इसके बाद उन्होंने उनसे बीस रुपए लिए.

क्या हुआ बस में बैठने के बाद

बस चलने के कुछ ही देर बाद अचानक सवारी के तौर पर बैठे तीनों लड़कों ने उनकी तरफ देख कर उलटा-सीधा बोलना शुरू कर दिया. फिर जब वो काफी बदतमीजी करने लगे तो लड़की के दोस्त को गुस्सा आ गया और वो उन तीनों से उलझ पड़ा. झगड़ा होते ही अचानक दो और लोग जो पहले से ही बस में सवार थे अचानक सामने आ गए और लोहे की रॉड से लड़की के दोस्त पर हमला कर दिया.

रॉड सिर पर लगा था इसलिए उसका दोस्त बेहोश होने लगा था. इसके बाद वो दरिंदे उस लड़की को बस की पिछली सीट की तरफ ले गए. इस दौरान वो मदद के लिए चिल्लाती रही, उनसे लड़ती रही, लेकिन कोई मदद को नहीं आया. फिर उस लड़की ने अपने मोबाइल से 100 नंबर पर पुलिस को कॉल करने की कोशिश की, लेकिन दरिंदों ने उसका मोबाइल छीन लिया.

वो अब पूरी तरह फंस चुकी थी, उन लोगों ने बस की लाइट भी बंद कर दी थी. इस बीच उस लड़की ने जितनी बार खुद को बचाने की कोशिश की, उतनी ही बार दरिंदों ने उसे बुरी तरह पीटा. इसके आगे जो कुछ भी हुआ वो ना बताने लायक है और ना ही सुनने लायक. वो दरिंदे जानवरों से भी बदतर तरीके से उस लड़की के जिस्म के साथ खेले और उसे इस हालत में पहुंचा दिया कि उन्हें खुद लगा कि वो लड़की मर चुकी है. और .ही सोचकर उसे बस से नीचे फेंक दिया.

सड़क से कैसे पहुंचे अस्पताल तक

अब दोनों पूरी तरह लहुलुहान सड़क किनारे पड़े थे. खून अब भी बह रहा था. जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था. ठंड भी बहुत थी. लड़की का दोस्त हाथ उठा-उठा कर लोगों से मदद की भीख मांग रहा था कि कोई दोनों के अस्पताल पहुंचा दे, कोई उन्हें कपड़े दे दे. पर किसी ने उनकी मदद नहीं की, इस दौरान वहां से बहुत से ऑटो वाले कार वाले गुजरे, कइयों ने स्पीड भी कम करके उनकी तरफ देखा, पर रुका कोई नहीं. बाद में कई पैदल गुजरने वालों ने भी उनकी हालत देखी. वो उनके पास भी गए. खड़े भी हुए, पर सिर्फ तमाशबीन की तरह. बिना किसी मदद के करीब 20-25 मिनट तक दोनों उसी तरह पड़े रहे. काफी देर बाद कहीं जाकर एक शख्स ने उन्हें देखा और उसी ने पुलिस को फोन किया. थोड़ी देर बाद ही एक साथ तीन-तीन पीसीआर वैन पहुंच गई थी, लेकिन हमारी मदद करने की बजाए वो आपस में पहले ये तय कर रहे थे कि मामला किस थाने में आएगा? लड़की का दोस्त तब भी लगातार चीख रहा था, चिल्ला रहा था. गिड़गिड़ा रहा था कि उन्हें कपड़े दे दो, एंबुलेंस बुला दो. अस्पताल पहुंचा दो. पर थाने की सीमा के चक्कर में करीब आधे घंटे उन्होंने यूंही जाया कर दिया. आधे घंटे बाद कहीं जाकर वो लोग एक चादर लाए जिससे उसे ढका गया. उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी. दोनों पीसीआर वैन में बैठ कर अस्पताल गए.

ये रहा पूरा घटनाक्रम, इस घटना के बाद उस लड़की ने 13 दिनों तक मौत से लड़ाई की और आखिरकार 29 दिसंबर को इस दर्द से हमेशा के लिए निजात पा गई. उस लड़की के बारे में कोई भी नहीं जानता लेकिन पूरा देश उसके लिए खड़ा हो गया. उसके लिए न्याय मांगने के लिए पूरे देश ने विरोध प्रदर्शन किए. उन छह दरिंदों को तो पुलिस ने पकड़ लिया गया लेकिन अभी भी उन्हें फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचाया गया है. उनके खिलाफ केस चल रहा है लेकिन सबसे दुर्भाग्य की बात तो ये है कि वो लड़की अब इस दुनिया में नहीं है जबकि वो सारे दरिंदे अभी भी जिंदा हैं.

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