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आत्‍महत्‍या: अंकों के आगे बेबस है जिंदगी

सत्रह साल के सनी कुमार रौशन ने पिछले साल पहले ही प्रयास में पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की प्रवेश परीक्षा में सफलता पा ली थी. इस साल 25 जनवरी को उसने फांसी लगाकर जान दे दी.

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aajtak.in
साबिर शेख 17 March 2011
आत्‍महत्‍या: अंकों के आगे बेबस है जिंदगी आत्‍महत्‍या

सत्रह साल के सनी कुमार रौशन ने पिछले साल पहले ही प्रयास में पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की प्रवेश परीक्षा में सफलता पा ली थी. इस साल 25 जनवरी को उसने फांसी लगाकर जान दे दी. रौशन ने हाल ही में सेमिस्टर परीक्षा दी थी और यह बात उसेखाए जा रही थी कि शायद उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है.

पटना में छात्रों के आत्महत्या के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, शहर में हुई कुल आत्महत्या में से इहलीला समाप्त करने वाले 23.8 फीसदी छात्र थे.

चंड़ीगढ़ में आत्महत्या के 2009 के आंकड़ों में से 24 फीसदी मामले छात्रों से जुड़े थे तो इलाहाबाद और कानपुर में यह आंकड़ा 23 फीसदी था. मेरठ में 2008 में सामने आए आत्महत्या के कुल मामलों में से 19.8 फीसदी छात्रों के ही बताए जाते हैं और लखनऊ में 2007 में यह आंकड़ा 22.6 फीसदी था.

भारत में छात्रों द्वारा अपने जीवन को समाप्त करने की घटनाओं का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है. 2008 में जहां देश में 4.8 फीसदी छात्रों ने मौत को गले लगाया था, वहीं 2009 में इस कठोर कदम को उठाने वाले छात्रों का आंकड़ा 5.3 फीसदी था यानी 2008 में जहां 6,060 छात्रों ने आत्महत्या की थी, 2009-10 में यह आंकड़ा बढ़कर 6,716 हो गया. इसे इस तरह देखें: देश में प्रतिदिन 19 छात्र आत्महत्या करते हैं, जिनमें से छह यह कदम परीक्षा में असफलता के डर से उठाते हैं.

यही डर एक तिहाई छात्रों की आत्महत्या का भी कारण है. एनसीआरबी की रिपोर्ट पुष्टि करती है कि परीक्षा में असफलता के डर से 2008 में 2,189 छात्रों ने आत्महत्या की थी. इनमें 958 लड़कियां थीं तो 1,231 लड़के. जमशेदपुर वीमेन कॉलेज की बीए तृतीय वर्ष की छात्रा श्वेता ने 21 फरवरी को मौत का वरण कर लिया क्योंकि उसे लगता था कि अप्रैल में होने वाली परीक्षा के लिए अच्छी तैयारी नहीं है.

परीक्षा के खौफ को अब स्मरणशक्ति बढ़ाने वाली गोलियां भी कम नहीं कर पा रहीं, इसका एकमात्र उपाय जीवन समाप्त करना ही बन गया है. परीक्षा में असफल होने पर 2009 में 2,010 छात्रों ने आत्महत्या की थी. परीक्षा के डर सहित कॅरियर संबंधी समस्याओं के चलते आत्महत्या का कदम उठाने छात्रों की संख्या 2008 में 1,176 थी, जो 2009 में बढ़कर 1,354 हो गई. क्या परीक्षा या असफलता का डर दिलो दिमाग पर इस कदर छा सकता है कि उसके आगे जान दे देना ज्‍यादा आसान लगे?

रांची इंस्टीट्‌यूट ऑफ न्यूरो साइक्याट्री ऐंड अलाइड सांइसेस के निदेशक डॉ. अमूल रंजन कहते हैं, ''ज्‍यादातर लड़के लड़कियां अवसाद से जूझ्ते रहते हैं, पर अभिभावकों या शिक्षकों के पास उनकी समस्या पर चर्चा करने का वक्त नहीं होता. भावात्मक तनाव शिक्षा परिसरों में कहर ढा रहा है. इससे निबटने और अवसादग्रस्त छात्रों को उबारने के लिए हेल्पलाइन चुनिंदा कॉलेजों में ही है.''

कई मामले तो ऐसे हैं जिनमें शिक्षक ही छात्र की आत्महत्या का कारण बन गए. स्कूल में पिटाई के बाद आत्महत्या करने वाले ला मार्टिनी फॉर ब्वॉयज स्कूल के 13 वर्षीय छात्र रोवनजीत राव्ला के मामले में स्कूल के प्राचार्य और तीन शिक्षकों के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने के निर्णय को कोलकाता हाइकोर्ट ने बरकरार रखा.

हालांकि बच्चों और अभिभावकों के बीच संवाद की कमी आत्महत्या का इकलौता कारण तो नहीं, लेकिन आत्महत्या के लिए उकसाने की वजह जरूर हो सकता है. पटना स्कूल की 10वीं की छात्रा प्रिया ने 28 जनवरी को इसलिए आत्महत्या कर ली थी क्योंकि उसे लगता था कि माता पिता उसके भाई को ज्‍यादा चाहते हैं.

8 फरवरी को पटना में 15 साल की पिंकी ने 14वें माले से छलांग लगा दी. सुसाइड नोट में उसने मातापिता के झ्गड़े को जिम्मेदार बताया. नवंबर 2010 में आइआइटी कानपुर की बीटेक अंतिम वर्ष की छात्रा माधुरी साले ने आत्महत्या कर ली, जो गत दो साल में संस्थान में ऐसा चौथा मामला था. बकौल डॉ. रंजन, ''अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों को अब समझना होगा कि अंकों से परे भी जीवन है.''

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