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बिहार में बदलाव की सवारी

बिहार में सरकारी योजनाएं बन रहीं कन्याओं के जीवन में तब्दीली का बड़ा सबब.

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अमिताभ श्रीवास्तव/जितेंद्र पुष्पनई दिल्ली, 02 September 2010
बिहार में बदलाव की सवारी

गुड़िया की लाल रंग की साइकिल पर लिखा है ‘वॉल्केनो (ज्वालामुखी)’ -जो शायद इस 15 वर्षीया बालिका के सीने में शिक्षा के लिए धधकती ज्वाला की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी है. गुड़िया को अपनी इस साइकिल से बहुत लगाव है. पहले कभी-कभार स्कूल जाने वाली बिहार के गया जिले के खरखुरा के अशोका हाइ स्कूल की दसवीं कक्षा की यह छात्रा अब रोजाना इस पर सवार होकर; स्कूल जाती है. राजमिस्त्री का काम करके 140 रु. दिहाड़ी कमाने वाले चंद्रदेव प्रसाद की यह बेटी स्कूली शिक्षा खत्म करके उच्च शिक्षा पाने का इरादा रखती है.

कुछ समय पहले तक गुड़िया की सभी इच्छाएं पिटारे में बंद थीं. वह बमुश्किल ही अपने लक्ष्यों के बारे में सोच पाती थी. माता-पिता भी गुड़िया की जल्द शादी करने या फिर उसे आगे और पढ़ने देने सरीखे विचारों के बीच झूल रहे थे. आखिरकार, बिहार के सुदूरवर्ती इलाकों में रहने वाले अन्य लोगों की ही तरह वे भी जानते थे कि लड़की को शिक्षा दिलाने का अर्थ अपना पैसा व्यर्थ करना है. लेकिन ऐसा लंबे समय तक नहीं रहा.

ये सारी परिस्थितियां उस समय बदल गईं जब राज्य सरकार ने छात्राओं को साइकिलें भेट करनी शुरू कीं. गुड़िया को भी एक साइकिल मिली. चलानी आती नहीं थी, इसलिए वह उस पर से कई बार गिरती, लेकिन हौसला करके फिर उस पर बैठती और चलाती. लेकिन हर चोट के साथ आगे बढ़ने का हौसला और उम्मीद बंधती थी-ऐसी भावनाओं से गांव की अन्य लड़कियां अनजान थीं.

गुड़िया ने जल्द ही साइकिल चलानी सीख लिया और इसने उसे एक नया आत्मविश्वास दिया, साथ ही अपनी शिक्षा को लेकर एक नया उद्देश्य भी उसे मिल गया और उसके माता-पिता को भी अपनी बच्ची की शिक्षा जारी रखने का एक कारण मिल गया.

स्कूलों तक पहुंचने की दूरी को पाटने और लड़कियों में उद्देश्य तथा आजादी की समझ का संचार करते हुए ये साइकिलें उनके दिमागी खाके में भी बड़ा बदलाव कर रही हैं. ये लड़कियां बिहार के पितृसत्तात्मक समाज में अपनी अलग पहचान कायम करने के ख्वाब को पूरा करने में जुटी हैं.स्कूल की प्रधानाचार्य डॉ. ऊषा कुमारी कहती हैं, 'अब वे कॅरियर की बातें करनी लगी हैं.'

लेकिन बिहार में बदलाव की इस बयार का हिस्सा बनी गुड़िया ही एकमात्र लड़की नहीं है. साइकिल योजना, जो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की देन है, ने राज्य भर के स्कूलों में कक्षाओं में लड़कियों की उपस्थिति में इजाफा किया है. गुड़िया के स्कूल में भी लड़कियों की संख्या 131 पहुंच गई है. बेशक यह एक बड़ी छलांग है क्योंकि 2006-07 के शैक्षणिक वर्ष में गुड़िया के स्कूल में छात्राओं की संख्या मात्र 52 ही थी. जाहिर तौर पर साइकिल ने शिक्षा की भूख पैदा कर दी है.

सफलता की यह दास्तान राज्य भर में लिखी जा रही है. 2007-08 में, सरकार ने 1.63 लाख कन्याओं की साइकिल खरीदने में मदद के लिए 32.60 करोड़ रु. खर्च किए थे, जबकि इस संदर्भ में 2008-09 में 2.72 लाख छात्राओं को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से 54.43 करोड़ रु. खर्च किए गए. वर्ष 2009-10 में लाभान्वित होने वाली कन्याओं का आंकड़ा 4.36 लाख पर पहुंच चुका है और उन्हें 87.33 करोड़ रु. मू्‌ल्य की साइकिलें उपलब्ध कराई गई हैं.पिछले तीन साल में राज्य सरकार 8.71 लाख छात्राओं को साइकिलें उपलब्ध कराने के लिए 174.36 करोड़ रु. खर्च कर चुकी है.

इस योजना का बिहार में कई तरह से असर हो रहा है, इसमें प्रमुख मकसद इसका लड़कियों की शिक्षा पर कई मायनों में असर डालना भी शामिल है. उदाहरण के लिए, 2006 में जहां स्कूल छोड़ने वाली छात्राओं की संख्या 25 लाख हुआ करती थी, अब वह 10 लाख पर आ गई है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानना है कि योजना ने ‘इस सकारात्मक बदलाव को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.’ बिहार में स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या काफी अधिक थी. विशेषकर ग्रामीण इलाके की लड़कियों को प्राथमिक या माध्यमिक स्तर के बाद पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता रहा है. इनमें से अधिकतर की कम उम्र में शादी हो जाती है और जिसके चलते उनके समक्ष बहुत ही मामूली विकल्प ही बचते हैं.

एक ऐसे राज्य, जहां महिलाओं की साक्षरता दर 33.57 फीसदी है जोकि राष्ट्रीय औसत 54.16 फीसदी से काफी कम है, के लिए यह योजना एक बेहतरीन मिसाल है. इससे पता चलता है कि लोकप्रियवादी मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना कितना बड़ा बदलाव ला सकती है.

योजना के तहत सरकारी स्कूलों में शिक्षा ले रहीं आठवीं, नवीं और दसवीं शिक्षा की छात्राओं को 2,000 रु. का नकद अनुदान दिया जाता है. मुख्यमंत्री कहते हैं, ‘वर्ष 2006 में मैंने फैसला लिया था कि सरकारी स्कूलों को कक्षा आठ, नौ और दस की छात्राओं को साइकिलें दी जाएंगी.’ इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि नीतीश इस योजना को अपने दिल के काफी करीब पाते हैं.

उल्लेखनीय है कि इस योजना में जाति, संप्रदाय या आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर किसी को भी इससे अछूता नहीं रखा गया है. साइकिल योजना का लाभ पाने की एकमात्र पात्रता किसी भी सरकारी स्कूल की कक्षा आठ या उससे ऊपर की कक्षा की छात्रा होना जरूरी है. अब सरकार की तैयारी इस योजना से लड़कों को भी लाभान्वित करने की है.

हालांकि नीतीश कुमार के आलोचक इसे राजनैतिक चालबाजी बताते हैं ताकि अपने इस कदम से वे महिलाओं के बीच अपने समर्थन को पुख्ता कर सकें. जब उनकी पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव महिला आरक्षण विधेयक का विरोध कर रहे थे थे ऐसे में नीतीश ने विधेयक का समर्थन किया था, इससे जाहिर होता है कि वे पारंपरिक नेता की रूढ़ छवि से उबरना चाहते हैं. तभी वे अक्सर अपनी नई योजनाओं से समाज के अलग तबके या वर्ग को अपनी ओर खींचते नजर आते हैं.

बात जब बिहार में लड़कियों की शिक्षा की आती है तो ऐसा लगता है कि उनके पास विचारों की कोई कमी नहीं है. सिर्फ साइकिल योजना ही एकमात्र योजना नहीं है जो लड़कियों की मदद कर रही है. मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना के तहत छठी से आठवी में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा को स्कूल की वर्दी और अध्ययन सामग्री के लिए 700 रु. दिए जाते हैं. 2006 में शुरू हुई इस योजना से 36 लाख छात्राएं लाभान्वित हो चुकी हैं. 2009 में, इस योजना का विस्तार करते हुए, कक्षा तीन, चार और पांच की छात्राओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया था.

इस योजना ने बिहार के ग्रामीण इलाकों में सफलता की कई इबारतें लिखी हैं. ऐसी ही एक दास्तान खुशबू की है. कटिहार जिले के भोगांव की रहने वाली इस लड़की ने दसवीं कक्षा की परीक्षा में 90 फीसदी अंक अर्जित किए हैं, जोकि बिहार बोर्ड में बहुत ही मुश्किल से देखने को मिलते हैं. यही नहीं, वह राज्य में दूसरे स्थान पर भी रही है. शिक्षा के क्षेत्र में खुशबू की यह उपलब्धि वाकई उल्लेखनीय है, लेकिन जिस तरह से उसने इसे अर्जित किया वह जानने वाली बात है. गांव में कोई हाइ स्कूल न होने के चलते खुशबू रोजाना दस किमी का सफर अपनी साइकिल पर ही तय किया करती है.

खुशबू ने इस साल हुई परीक्षा में 500 में से 463 अंक अर्जित किए. बिहार की स्कूल परीक्षा में यह पहला मौका है जब एक छात्रा ने दसवीं की परीक्षा में 90 फीसदी अंक हासिल किए हैं.

यह खुशबू की योग्यता ही थी जो मुख्यमंत्री को उसके घर तक बधाई देने के लिए खींच ले गई. खुशबू का घर पटना से 300 किमी की दूरी पर स्थित है. नीतीश खुशबू के घर गए और उसे और उसके माता-पिता को बधाई दी. संयोग से, खुशबू के पैतृक जिले में महिला साक्षरता दर सिर्फ 24 फीसदी ही है.

मौजूदा वर्ष की बिहार स्कूल परीक्षा बोर्ड (बीएसईबी) की माध्यमिक शिक्षा परीक्षा में लड़कियों ने बहुत ही बढ़िया प्रदर्शन किया है. इस परीक्षा में 9.74 लाख छात्रों ने हिस्सा लिया जिसमें चार लाख छात्राएं थीं. इनमें से 75,136 लड़कियों ने प्रथम श्रेणी अर्जित की, जोकि पिछले साल के 37,708 के आंकड़े से दोगुना थी. राज्य सरकार की एक अन्य पहल के मुताबिक इनमें से प्रत्येक कन्या को 10,000 रु. की आर्थिक सहायता दी जाएगी.

बिहार में, साइकिल बदलाव का एक कारक बन चुकी है, जिसे राज्य के हर हिस्से में बखूबी देखा जा सकता है. रोज सुबह के वक्त बखूबी यह खूबसूरत नजारा देखा जा सकता है कि किशोरियों के समूह स्कूल की वर्दी में चमचमाती साइकिलों पर स्कूल की ओर बढ़ रहे होते हैं. वे साइकिल के पैडल मारतीं आत्मविश्वास से परिपूर्ण नजर आती हैं.

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