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आनंद बख्शी: खुदा का बख्शा फनकार

दिल को छूने वाले और जिंदगी की स्याह-सफेद सचाइयों को शब्द देते गीत लिखकर हिन्दी फिल्म जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ गए गीतकार आनंद बख्शी एक ऐसे फनकार थे जिन्होंने अपनी ‘असल मंजिल’ पर पहुंचकर फिल्मी गीतों को नई दिशा दी.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्‍ली, 20 July 2010
आनंद बख्शी: खुदा का बख्शा फनकार

जन्मदिन 21 जुलाई पर विशेष
दिल को छूने वाले और जिंदगी की स्याह-सफेद सचाइयों को शब्द देते गीत लिखकर हिन्दी फिल्म जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ गए गीतकार आनंद बख्शी एक ऐसे फनकार थे जिन्होंने अपनी ‘असल मंजिल’ पर पहुंचकर फिल्मी गीतों को नई दिशा दी.

गायक बनने का ख्वाब लेकर मुम्बई आए बख्शी की किस्मत में कुछ और ही लिखा था. खुदा के बख्शे फन के धनी इस कलाकार ने गीतों को आवाज देने के बजाय उन्हें शब्द दिये.

प्रख्यात शायर बेकल उत्साही की नजर में बख्शी ने जिंदगी की बेहद आम समझी जाने वाली विडम्बनाओं को आसान शब्दों में बयान करने जैसा मुश्किल काम बेहद सरलता से किया. चूंकि उनके गीत हर खास-ओ-आम के करीब होते थे लिहाजा उन्हें लोकप्रिय होना ही था.

उन्होंने बताया कि वक्त के साथ शैली में बदलाव करने की खूबी बख्शी को अन्य गीतकारों से अलग करती है. बख्शी ने अपनी पीढ़ी के संगीत निर्देशकों के साथ काम करने के बाद अगली पीढ़ी के संगीत निर्देशकों के साथ भी बखूबी काम किया और समय नियोजित बदलावों का पूरा ख्याल रखते हुए श्रोताओं की पसंद के अनुरूप गीत लिखे.

बख्शी ने एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, चित्रगुप्त, आनंद मिलिंद और कल्याणजी आनंदजी जैसे समकालीन संगीत निर्देशकों के साथ-साथ आधुनिक संगीत को भारतीय फिल्मों में जगह दिलाने में योगदान करने वाले ए. आर. रहमान के लिये भी गीत लिखे.

फिल्म जगत में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पहला मौका वर्ष 1956 में मिला जब भगवान दादा ने फिल्म ‘भला आदमी’ के चार गीतों के लिए उनसे करार किया. इसके बाद गीतकार के तौर पर उनका सफर शुरू हो गया और उन्होंने अपने जीवनकाल में 300 से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखे.

बख्शी को सफल गीतकार के तौर पर पहचान 1967 में मिली जब उन्होंने सुनील दत्त अभिनीत ‘मिलन’ के लिए गीत लिखे. इसके बाद उन्हें हिंदी फिल्म सिनेमा के जानेमाने संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिलने लगा.

बख्शी के गीत खासे विविधतापूर्ण और नयेपन से भरे थे. वर्ष 1972 में फिल्म ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का ‘दम मारो दम’ हो या फिर ‘शोले’, ‘बॉबी’ और जीवन की विडम्बनाओं को दर्शाती फिल्म ‘अमर प्रेम’ के गीत हों, उन्होंने सभी को शब्द दिये.

उन्हें 40 बार फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नामित किया गया और चार बार वह इस पुरस्कार से नवाजे भी गए. अंतिम बार वर्ष 1999 में सुभाष घई की ‘ताल’ के गीत ‘इश्क बिना क्या जीना’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवार्ड प्रदान किया गया था.

आनंद बख्शी ने सबसे ज्यादा गीत संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत.प्यारेलाल के लिए लिखे थे.

उनके गीतों से सजी कुछ फिल्मों में ‘चांदनी’, ‘हम’, ‘मोहरा’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘दिल तो पागल है’, ‘ताल’, ‘मोहब्बतें’, ‘गदर एक प्रेम कथा’, ‘यादें’, ‘महबूबा’ आदि रहीं, जिनके गीत लोगों की जुबान पर आज भी हैं.

जीवन के अंतिम दिनों में हृदय और गुर्दे संबंधी बीमारियों से ग्रस्त आनंद बख्शी ने 30 मार्च 2002 को 72 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कह दिया.

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