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स्कॉलरशिप घोटालाः छात्रों को दिए, कॉलेजों ने रख लिए

जिला समाज कल्याण विभाग के क्षेत्रीय पर्यवेक्षक अख्तर इकबाल ने बीते दिनों कॉलेज का निरीक्षण किया तो उन्हें जानकारी दी गई कि 2010-11में अनुसूचित जाति शुल्क की प्रतिपूर्ति संस्थान के खाते में आ गई है. एक सप्ताह में इस राशि का छात्रवार समायोजन कर दिया जाएगा.

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aajtak.in
आशीष मिश्रउत्तर प्रदेश, 16 July 2011
स्कॉलरशिप घोटालाः छात्रों को दिए, कॉलेजों ने रख लिए

गरीब छात्रों के हक पर कॉलेजों ने डाका डाला है. महंगी फीस लेकर हर साल करोड़ों रु. बटोरने वाले इन निजी कॉलेजों की बुरी नजर गरीब छात्रों को पढ़ाई के लिए मिलने वाली सरकारी इमदाद पर गड़ गई. फिर क्या था?

शुरू हो गया गरीब, लाचार छात्रों की फीस हड़पने का खेल. इस पर से परदा उस समय हटा जब लखनऊ में सुल्तानपुर रोड पर बने सरोज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति में हुआ घोटाला पकड़ा गया.

जिला समाज कल्याण विभाग के क्षेत्रीय पर्यवेक्षक अख्तर इकबाल ने बीते दिनों कॉलेज का निरीक्षण किया तो उन्हें जानकारी दी गई कि 2010-11में अनुसूचित जाति शुल्क की प्रतिपूर्ति संस्थान के खाते में आ गई है. एक सप्ताह में इस राशि का छात्रवार समायोजन कर दिया जाएगा. कॉलेज ने फीस प्रतिपूर्ति से जुड़ा जो उपभोग प्रमाण पत्र दिया उसमें 2009-10 के दौरान सभी पात्र 407 छात्रों के लिए सामान्य वर्ग शुल्क प्रतिपूर्ति के मद में दिए गए 1,58,96,300 रु. का शत-प्रतिशत समायोजन दिखाया गया.

निरीक्षण में छात्रों से फीस जमा कराने संबंधी कोई दस्तावेज नहीं मिले. इसके बाद समाज कल्याण अधिकारी के.एस. मिश्र ने इंस्टीट्यूट के पदेन निदेशक के खिलाफ सरकारी धन के गबन की रिपोर्ट गोसाई गंज थाने में दर्ज कराई हालांकि कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि उसने सभी पात्र छात्रों की फीस की प्रतिपूर्ति कर दी है.

मामला सामने आते ही शासन के कान खड़े हो गए. समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव बलविंदर कुमार ने तुरंत दो दर्जन से अधिक जिलाधिकारियों को आदेश दिया कि वे विशेष जांच टीमें गठित कर अपने जिलों के इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट संस्थानों में फीस प्रतिपूर्ति की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट दें.

इनमें गौतमबुद्घनगर, गाजियाबाद, मेरठ, मथुरा, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, फैजाबाद, बाराबंकी, लखनऊ, मुरादाबाद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, आजमगढ़, गाजीपुर, बरेली, उन्नाव, सुल्तानपुर, आंबेडकर नगर, मऊ, बिजनौर, जौनपुर, झंसी और फिरोजबाद जिले हैं. इनमें बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज हैं.

असल में राज्य सरकार एक लाख सालाना आय वाले अभिभावकों के बच्चों की 10वीं कक्षा से ऊपर की पढ़ाई करने पर फीस प्रतिपूर्ति करती है. पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग अल्पसंख्यक छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति करता है. साथ ही समाज कल्याण विभाग पर अनुसूचित जाति, जनजाति और सामान्य वर्ग के छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति का जिम्मा है.

प्रदेश में फीस प्रतिपूर्ति के लिए पात्र 23,82,364 छात्र हैं. इनमें अनुसूचित जाति, जनजाति और सामान्य वर्ग के 12,19,930, पिछड़ा वर्ग के 10,80,806 और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों की संख्या 81,621 है. इन सभी छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति पर सरकार हर साल 10.95 अरब रु. खर्च कर रही है. यही राशि निजी कॉलेज प्रबंधकों की जेबों में जा रही है.

जैसे ही जांच शुरू हुई, हर जिले में गड़बडिय़ों का पिटारा खुलने लगा. मथुरा के दो इंजीनियरिंग कॉलेजों ने फीस प्रतिपूर्ति के लिए दिए गए 2.36 करोड़ रु. छात्रों में बांटे ही नहीं. यहां के मुख्य विकास अधिकारी को मामले की जांच कर फीस वसूलने का आदेश दिया गया है. इस घोटाले में कॉलेज प्रबंधकों का साथ जिला समाज कल्याण अधिकारियों ने भी दिया.

महामायानगर में पढऩे वाले गरीब छात्रों के लिए दी गई फीस प्रतिपूर्ति राशि का आवंटन अलीगढ़ जिले के टिकरी कलां स्थित सिटी इंजीनियरिंग कॉलेज को नियम विरुद्घ किया गया. जांच से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार, ज्यादातर कॉलेजों ने फीस प्रतिपूर्ति के लिए दी गई राशि का लाभ पात्र छात्रों को नहीं दिया. इन कॉलेजों ने छात्रों से फीस भी ली और सरकार से मिली फीस प्रतिपूर्ति की राशि भी हड़प ली.

जांच के लिए चुने जिलों में 100 से ज्यादा कॉलेजों में प्रारंभिक जांच में ही अनियमितता पाई गई. मथुरा, गाजियाबाद, लखनऊ, महामायानगर के दो-दो इंजीनियरिंग कॉलेजों पर फीस प्रतिपूर्ति के लिए दी गई 10 करोड़ रु. से अधिक राशि को हड़पने पर मुकदमा दर्ज कराया गया है.

राजधानी में सबसे अधिक 70 कॉलेज जांच अधिकारियों के रडार पर हैं. इनमें से कई तो ऐसे हैं जिनमें पाठ्यक्रम समाप्त होने के बाद छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति राशि शासन से जारी हुई लेकिन इन कॉलेजों ने पात्र छात्रों को यह राशि नहीं लौटाई. सबसे ज्यादा गड़बड़ी सामान्य और पिछड़ा वर्ग के छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति में हुई है. इस वर्ग के छात्रों से फीस जमा कराने के बाद कॉलेजों को सरकार से मिलने वाली फीस प्रतिपूर्ति राशि को पात्र छात्रों को लौटाने का नियम है.

जांच में सामने आया है कि कॉलेज प्रबंधन ने छात्रों को जमा कराई फीस की पूरी राशि न लौटाकर आधी ही दी. शेष राशि कॉलेज प्रबंधन ने भागदौड़ के नाम पर खुद रख ली, लेकिन रजिस्टर में पूरी राशि देने की बात लिखकर उस पर छात्र के हस्ताक्षर करा लिए. इस रजिस्टर की समय-समय पर जांच होनी चाहिए. छात्रों को मिलने वाली राशि का भौतिक सत्यापन करना चाहिए लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस ओर से आंख मूंदे रहे. समाज कल्याण विभाग के एक उच्च अधिकारी बताते हैं कि जिस तरह से प्रारंभिक जांच में ही गड़बडिय़ां सामने आ रही हैं उससे लगता है कि यह घोटला कई अरब का होगा.

इस अधिकारी के मुताबिक,''ऐसा नहीं है कि इस पूरे घोटाले में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज प्रबंधन ही शामिल हैं. जिला समाज कल्याण अधिकारी और उनके मातहत कार्यरत अन्य कर्मियों ने भी छात्रों के फीस प्रतिपूर्ति धन की बंदरबाट में जमकर अपनी जेबें गरम की हैं.''

सभी जिलाधिकारियों ने मुकम्मल तरीके से जांच को अंजाम भी नहीं दिया है. विभागीय सूत्र बताते हैं कि एक माह की मियाद बीतने के बाद 15 जिलाधिकारियों ने ही अपनी रिपोर्ट शासन को भेजी है. ज्यादातर ने अपनी रिपोर्ट में एक लाइन का जवाब लिखा हैः ''जांच में कोई अनियमितता नहीं मिली'' जबकि शासन ने उनसे कॉलेज का नाम, उनमें पढऩे वाले पात्र छात्रों की संख्या और आवंटित फीस प्रतिपूर्ति की राशि समेत कई बिंदुओं पर जांच आख्या भेजने को कहा था. एक लाइन के इस जवाब को शासन ने गंभीरता से लिया है और उनसे दोबारा जांच आख्या मांगी जा रही है.

समस्या केवल समाज कल्याण विभाग से ही जुड़ी नहीं है. बजट न होने के कारण पिछड़े वर्ग के छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति का मामला पेचीदा होता जा रहा है. यह प्रकरण लखनऊ विवि से जुड़ा है. यहां फीस प्रतिपूर्ति को लेकर विवि एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के बीच इन दिनों जमकर खींचतान चल रही है. इसका नतीजा है कि करीब 3,000 से अधिक ओबीसी छात्रों के भविष्य पर संकट मंडराने लगा है.
घोटाला उजागर होने के बाद समाज कल्याण विभाग अपनी व्यवस्था को चाक चौबंद करने में जुट गया है. बलविंदर कुमार के मुताबिक, अब फीस प्रतिपूर्ति का पूरा पैसा छात्रों के खाते में सीधे भेजा जाएगा. जाति और आय प्रमाणपत्र का ऑनलाइन सत्यापन होने के बाद ही छात्रों को प्रतिपूर्ति की रकम मिल सकेगी.

ऐसा टोल फ्री नंबर जारी किया जाएगा जिस पर फीस प्रतिपूर्ति की रकम नहीं पाने वाले छात्र शिकायत कर सकेंगे. बहरहाल, जब तक सरकार नियमों को लागू नहीं कराती, निजी कॉलेजों की मनमानी जारी रहेगी और सरकारी मदद के अभाव में अपने मेधावी बच्चों को पढ़ाने के लिए गरीब मां-बाप को अपना सब दांव पर लगाना पड़ेगा.

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