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मोबाइल बैंकिंगः इधर इशारा और उधर लेन-देन पूरा

लेन-देन का नकदरहित तरीका यूपीआइ यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस मोबाइल बैंकिंग की दुनिया को हमेशा के लिए बदल देगा. इसके लिए न आपको अपना बैंक खाता विवरण देना होगा और न ही प्राप्तकर्ता के बैंक का आइएफएससी कोड. कुछ आसान कदमों में आप लाखों का लेन-देन कर सकते हैं.

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aajtak.in
एम.जी. अरुण नई दिल्ली, 25 May 2016
मोबाइल बैंकिंगः इधर इशारा और उधर लेन-देन पूरा

अब युनाइटेड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआइ) का शुक्रिया अदा कीजिए कि मोबाइल से होने वाले भुगतान की प्रक्रिया नए चरण में पहुंच चुकी है. यह अपने किस्म की दुनिया में इकलौती एप्लिकेशन है. भारत के लोगों को कार्ड आदि से पेमेंट करने की अब लत पड़ चुकी है. यूपीआइ ने इसमें एक कदम और आगे बढ़ाया है जिसके तहत आपको अपने स्मार्टफोन पर पैसे प्राप्त करने वाले की वर्चुअल आइडी को डालना होता है और उसके बाद ऐप एक पिन मांगता है जिसे फिर से डालना होता है. इसके बाद पैसा अपने आप आपके खाते से प्राप्तकर्ता के खाते में चला जाता है और इसमें कुछ ही मिनट लगते हैं.

 इसके लिए न आपको अपना बैंक खाता विवरण देना होगा और न ही प्राप्तकर्ता के बैंक का आइएफएससी कोड. कुछ आसान कदमों में आप लाखों का लेन-देन कर सकते हैं. जरूरी नहीं कि आपके फोन में ऐप उसी बैंक का हो जिसमें आपका खाता है, बल्कि किसी भी अन्य बैंक का हो सकता है जो आपको बेहतर अनुभव देता हो. यही बात प्राप्तकर्ता के साथ भी लागू होती है. पैसों का लेन-देन हालांकि आपके और प्राप्तकर्ता के बैंकों के बीच ही होता है और आपको इसका पता तक नहीं लगता. अब नकद लेकर चलने की या क्रेडिट कार्ड का विवरण चोरी हो जाने की चिंता से आजादी मिलने वाली है.

इस काम को नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआइ) अंजाम दे रहा है, जो भारत में सभी खुदरा भुगतानों के मामले को देखने वाला संगठन है जो भारतीय रिजर्व बैंक के मातहत काम करता है. इसके दस प्रवर्तक बैंक हैं: भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, केनरा बैंक, बैंक ऑफ  बड़ौदा, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, आइसीआइसीआइ बैंक, एचडीएफसी बैंक, सिटी बैंक और एचएसबीसी. इस ऐप को विकसित करने में 15 लोगों की एक टीम काम कर रही है और विभिन्न बैंकों की तकनीकी टीमों के साथ समन्वय में है ताकि इसे साकार किया जा सके.

क्या यह नई ऐप है?
यूपीआइ का कोई अपना एक ऐप नहीं होगा बल्कि यह बैंकों को उनके मौजूदा ऐप में यूपीआइ के फंक्शन डालने की सुविधा देगा या फिर बैंक चाहें तो अपनी अलग से यूपीआइ ऐप बनवा सकेंगे. एनपीसीआइ के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर दिलीप आस्बे कहते हैं, ''कोई एक कॉमन ऐप नहीं है क्योंकि इससे नई तरह की सोच और खोज को नुक्सान पहुंचता है. हम चाहते हैं कि उद्योग की वृद्धि के साथ ही नए प्रयोग भी लगातार होते रहें.'' आरबीआइ के गवर्नर रघुराम राजन ने यूपीआइ का लोकार्पण करते हुए कहा था, ''भारत में सार्वजनिक भुगतान का अत्याधुनिक ढांचा मौजूद है. सिर्फ भुगतान के तरीके ही इस क्रांति का हिस्सा नहीं हैं बल्कि नए तरह के बैंकों की पूरी एक जमात है जो आगे आ रही है.''

आंकड़ों में कहानी
केंद्रीय बैंक ने 2015 में 11 भुगतान बैंकों और 10 छोटे बैंकों को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी. पीडब्ल्यूसी, इंडिया के मुताबिक, भारत में अब भी 23.3 करोड़ लोग बैंकों से नहीं जुड़े हैं.

देश के ज्यादातर लोग अब भी नकद में कारोबार करते हैं, जिसकी लागत बहुत ज्यादा आती है. आस्बे बताते हैं कि आरबीआइ हर साल मुद्रा छापने में 4,000 करोड़ रु. खर्च करता है. यह आंकड़ा ई-कॉमर्स और डेबिट/क्रेडिट कार्ड के व्यापक इस्तेमाल के बावजूद नकद भुगतान की व्यापकता को दर्शाता है. फिलहाल देश में 15 करोड़ स्मार्टफोन प्रयोक्ता हैं और अगले पांच साल में माना जा रहा है कि इनकी संख्या बढ़कर 50 करोड़ तक पहुंच जाएगी.

हाल के महीनों में भारत में मोबाइल बैंकिंग में काफी उछाल आया है क्योंकि बैंकों ने खुदरा और कॉर्पोरेट ग्राहकों को ऐसे प्लेटफॉर्म मुहैया कराए हैं जिनसे वे मोबाइल फोन पर लेन-देन कर सकते हैं. आरबीआइ का आंकड़ा दिखाता है कि मोबाइल फोन के माध्यम से लेन-देन दिसंबर 2015 में साल भर पहले के मुकाबले चार गुना से ज्यादा बढ़कर 49,029 करोड़ रु. तक पहुंच गया था. यूपीआइ इस रफ्तार को और बढ़ा सकता है. केपीएमजी इंडिया में पार्टनर कुणाल पांडे कहते हैं, ''यूपीआइ में मोबाइल भुगतान का कायाकल्प करने की क्षमता है.'' ग्राहकों के लिए इसका मतलब होगा कई लोगों के साथ लेन-देन करने से आजादी. उनके मुताबिक, बैंकों के लिए इससे लेन-देन की दर में इजाफा होगा क्योंकि यह काम काफी आसान हो जाएगा.

अलग होगा यूपीआइ से पेटीएम?
पेटीएम जैसे ऐप और यूपीआइ के बीच एक अहम फर्क यह होगा कि पेटीएम एक आधा-अधूरा मोबाइल वॉलेट है. इसका मतलब यह हुआ कि जो कोई पेटीएम में पंजीकृत है, वही उससे लेन-देन कर सकता है. इसके उलट यूपीआइ का परिचालन बैंकों के बीच होता है.

तो क्या यूपीआइ पेटीएम जैसे कारोबारों को खा जाएगा? पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा कहते हैं कि इससे उलट पेटीएम को लाभ ही होगा क्योंकि यूपीआइ ज्यादातर बैंकों के मोबाइल पेमेंट गेटवे को खोल देगा. फिलहाल एसबीआइ जैसे बैंक अपने गेटवे में पेटीएम को प्रवेश की इजाजत नहीं देते हैं ताकि वे खुद अपनी वॉलेट सेवा मोबिकैश इजी का प्रसार कर सकें. शर्मा कहते हैं, ''यूपीआइ अनिवार्यतः एक प्रोटोकॉल है, यानी बैंकों के लिए भुगतान का एक तंत्र. यह मोबाइल बैंकिंग के डिजिटलीकरण में मदद देगा.'' बाजार में आने के बाद से मोबाइल वॉलेट सेवाओं ने काफी जल्दी क्रेडिट कार्ड प्रयोक्ताओं की संख्या को भी पीछे छोड़ दिया है.

आरबीआइ का आंकड़ा दिखाता है कि देश में दिसंबर 2015 तक 2.27 करोड़ क्रेडिट कार्ड प्रयोक्ता थे जो 21,468 करोड़ रु. के लेन-देन कर रहे थे. इसके उलट पेटीएम के फिलहाल 12.6 करोड़ प्रयोक्ता हो चुके हैं और 2018 तक इसका लक्ष्य 50 करोड़ लोगों को अपना प्रयोक्ता बना लेना है. शर्मा के मुताबिक, रोजाना इस ऐप से पचास से सत्तर करोड़ रु. का लेन-देन होता है यानी सालाना 18,250 करोड़ रु. का कुल लेन-देन. यह हाल सिर्फ पेटीएम का है जबकि मोबिक्विक, ऑक्सीजन, सिट्रस पे, एमरुपी और टाटा टेलीसर्विसेज की अपनी अलग हिस्सेदारी है.  

आस्बे कहते हैं कि भारत में डेढ़ करोड़ खुदरा व्यापारी हैं लेकिन सिर्फ दस लाख कार्ड मशीनें मौजूद हैं. यही वजह है कि क्रेडिट कार्ड कारोबार की अपनी सीमाएं हैं जबकि यूपीआइ के सामने मौकों का पूरा मैदान खाली है.

यह कैसे काम करता है?
मान लें कि किशोर दिल्ली का एक व्यापारी है और गौतम एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव है जो उसका माल खरीदता है. दोनों ने अपने-अपने स्मार्टफोन पर पहली बार पंजीकरण कराने और अपने लिए वर्चुअल आइडी हासिल करने के बाद यूपीआइ डाउनलोड कर लिया है. किशोर को अपने माल की बिक्री के बदले अब गौतम से पैसा चाहिए. किशोर के पास बैंक 'ए' का खाता है जबकि उसके पास ऐप बैंक ''बी' का है. गौतम का बैंक 'सी' में खाता है जबकि वह बैंक 'डी' का ऐप इस्तेमाल कर रहा है. किशोर अपने बैंक 'बी' वाले ऐप का इस्तेमाल गौतम की वर्चुअल आइडी से भुगतान लेने के लिए करता है. यह वर्चुअल आइडी gautam@BankD.com जैसी कुछ हो सकती है.

इसके बाद यूपीआइ के पास एक अनुरोध का संदेश जाता है कि बैंक 'बी' के अनुरोध पर बैंक 'ए' का एक खाता है जहां पैसे जमा किए जाने हैं. कुल मिलाकर भुगतान करने वाले का वर्चुअल पता मालूम है. इसे वह बैंक 'डी' को भेज देता है, जिसे पहले से पता है कि इस खाते का इस्तेमाल बैंक 'सी' के ऐप पर हो रहा है. अब यूपीआइ को पता हो जाएगा कि किस खाते से पैसे निकालकर किसमें जमा कराना है. यह विनिमय उसी हिसाब से पूरा होता है और दोनों पक्षों को एक ई-मेल चला जाता है कि काम हो गया. आपको भुगतान करना है तो आप 'पुश' का विकल्प चुन सकते हैं. जिस पक्ष को पैसे लेने हैं, वह 'पुल' का विकल्प चुन सकता है. इस तंत्र में पंजीकृत सभी बैंकों में यह लेन-देन संभव होगा.

क्या यह सुरक्षित है?
इस ऐप को बनाने में एनपीसीआइ के समक्ष सुरक्षा का समला सबसे अहम था. इसके लिए दोनों सिरों पर सख्त डेटा संरक्षण और सुरक्षा मुहैया कराई जानी है. प्रमाणन उपकरण के तौर पर मोबाइल फोन का इस्तेमाल, एक वर्चुअल आइडी और आधार जैसी तीसरे पक्ष की प्रमाणन योजना आदि बैंकों को अपनी लागत बचाने में मदद कर सकती है, जिससे वे अपने मूल कारोबार पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकेंगे.

भुगतान की सहजता एक और अहम मसला है. पैसे देने और लेने का काम उतना ही आसान होगा जितना एक फोनबुक एंट्री को स्वाइप करना या फोन से कॉल लगाना. जिसके पास भी खाता है, वह केवल एक पहचान के माध्यम से पैसे दे-ले सकेगा जिसमें कोई और बैंक विवरण काम नहीं आएगा. यह समाधान ऐसा होना चाहिए कि इसे एक अरब प्रयोक्ताओं तक विस्तारित किया जा सके. इसमें आधार संख्या, वर्चुअल पता और मोबाइल नंबर जैसी कोटियों के बीच सहज परस्परता का भी ख्याल रखा जाना होगा.
इसमें कई चुनौतियां भी हैं. पांडे कहते हैं, ''इसकी कामयाबी इस पर निर्भर करेगी कि लोग इसे कितना स्वीकारते हैं.'' ऐसी भुगतान प्रणालियों के बारे में लोगों में जागरूकता होनी चाहिए. भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब भी नकद केंद्रित है और रातोरात चीजें नहीं बदल सकतीं. सबसे बड़ी बात यह है कि यूपीआइ में कोई केंद्रीय व्यक्ति नहीं है, जिससे कुछ लोगों को यह नुक्सानदेह जान पड़ सकता है.

इसके बावजूद एक बार बैंकों के पास यह तकनीक आ जाने के बाद मोबाइल भुगतान के क्षेत्र में यूपीआइ कायाकल्प करने वाली तकनीक साबित होगी. आस्बे कहते हैं, ''विनिमय की तमाम खामियों के मद्देनजर अब भी एक नई प्रणाली के जगह बनाने की गुंजाइश कायम है, जो नकद लेन-देन को विस्थापित करेगी.'' उनका आशावाद सराहनीय है.

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