एडवांस्ड सर्च

मोदी को रोकेंगी सोनिया-माया?

कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन उत्तर भारत के अलावा देश के कई हिस्सों में अजेय साबित हो सकता है. अकेले उत्तर प्रदेश में यह गठबंधन 60 से ज्यादा सीटें जीतने का माद्दा रखता है.

Advertisement
यूसुफ अंसारीनई दिल्ली, 12 November 2013
मोदी को रोकेंगी सोनिया-माया?

नमो-नमो का जाप देश में बढ़ता जा रहा है. इससे कांग्रेस की चिंता भी बढ़ रही है. बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की हर रैली में पिछली रैली के मुकाबले ज्यादा भीड़ जुट रही है. इससे कांग्रेसी खेमे में खलबली है. कांग्रेस के दिग्गज नेता भले ही कहें कि मोदी उनके लिए चुनौती नहीं हैं.

लेकिन यूपीए सरकार की खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट सरकार में बैठे इन दिग्गजों की नींद उड़ा रही है. केंद्र में सत्तासीन होने की वजह से कांग्रेस के इसे बचाने के साथ ही मोदी के नाम पर बढ़ते जन समर्थन को रोकने की चुनौती भी है. उसके सामने विकल्प कम हैं. कांग्रेस की अगुआई में बना यूपीए का कुनबा बुरी तरह बिखर चुका है.

2009 में कांग्रेस समेत यूपीए के घटक दल 300 से ज्यादा सीटें लेकर सत्ता में लौटे थे लेकिन पिछले करीब सालभर से केंद्र में अल्पमत सरकार चल रही है. जाहिर है, कांग्रेस के सामने पुराने साथियों को फिर से जोडऩे और नए साथी तलाशने की बड़ी चुनौती है.

पिछले कुछ समय से कांग्रेसी हलकों में चर्चा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और बीएसपी के बीच कोई औपचारिक या अनौपचारिक गठबंधन हो सकता है. कांग्रेस से न इसकी पुष्टि हो रही है और न ही खंडन. अगर यह चर्चा खबर बनती है तो आगामी चुनाव से पहले यह सबसे बड़ी खबर होगी.

ठीक उसी तरह जैसे 2004 के चुनाव से पहले सोनिया गांधी का शरद पवार को फोन करके गठबंधन की इच्छा जताना उस साल की सबसे बड़ी खबर बना था और उसके बाद तेजी से बदले राजनैतिक घटनाक्रम ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर कांग्रेस के सत्ता में आने का रास्ता साफ कर दिया था.

आज कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन देश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है. बीएसपी कुल वोट के लिहाज से देश की तीसरी बड़ी पार्टी है. 1996 के चुनाव में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के बाद चुनाव-दर-चुनाव बीएसपी का वोट लगातार बढ़ा है.

2009 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी ने सबसे ज्यादा 500 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे. इनमें से उसे 21 सीटों पर कामयाबी मिली और 50 से ज्यादा सीटों पर अच्छा प्रदर्शन रहा. बीएसपी को 2.57 करोड़ से ज्यादा वोट मिले जो कुल वोटों का 6.17 प्रतिशत था जबकि कांग्रेस ने 440 सीटों पर लड़कर 206 सीटें जीतीं और 11.91 करोड़ यानी 28.55 प्रतिशत वोट हासिल किए.

वहीं बीजेपी ने 433 सीटों पर ही चुनाव लड़ा था. उसे 116 सीटों पर कामयाबी के साथ 18.8 प्रतिशत यानी 7.84 करोड़ से ज्यादा वोट मिले. इस हिसाब से देखें तो कांग्रेस और बीएसपी के वोट मिलकर 34.75 प्रतिशत बैठते हैं. कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन उत्तर भारत के अलावा देश के कई हिस्सों में अजेय साबित हो सकता है.

अकेले उत्तर प्रदेश में यह गठबंधन 60 से ज्यादा सीटें जीतने का माद्दा रखता है. इस गठबंधन के सहारे कांग्रेस लोकसभा में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रख सकती है. इसके अलावा, बीएसपी भी पहली बार 50 का आंकड़ा पार करके राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकती है.

दोनों पार्टियों के नेता इस सचाई और इसकी अहमियत को समझते भी हैं. सवाल यह है कि इस गठबंधन की शुरुआत कैसे हो और पहल कौन करे. राजनैतिक हलकों में चर्चा है कि सोनिया गांधी और मायावती में व्यक्तिगत अहम का टकराव गठबंधन के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है.

1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को गिराने की मुहिम के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मायावती को छोड़ सबसे बात कर ली थी. आखिरी समय में जब कांग्रेसी नेताओं ने मायावती से संपर्क साधा तो उन्होंने यह ताना मारा था कि अगर सोनिया उनसे पहले बात कर लेतीं तो ज्यादा अच्छा रहता.

बाद में 2004 में सोनिया ने मायावती से रिश्ते सुधारने की कोशिश की. पहले वे उन्हें जन्मदिन की बधाई देने उनके घर पहुंचीं. उसके तीन दिन बाद ही रात को चुपचाप गठबंधन पर बात करने पहुंच गईं. अगर मीडिया को इस मुलाकात की भनक न लगती तो शायद 2004 में ही दोनों में गठबंधन हो जाता.

हो सकता है, जो काम 2004 में नहीं हुआ वह 2014 के चुनाव से पहले हो जाए. वैसे उत्तर प्रदेश में 1996 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी और कांग्रेस साथ आकर देख चुकी हैं. तब इस गठबंधन से दोनों को खास फायदा नहीं हुआ था. लेकिन तब से हालात काफी बदल गए हैं.

कांग्रेस लाख कोशिशों के बावजूद प्रदेश में अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकी है. कांग्रेस में सोनिया और राहुल को इस बारे में सोचने की जरूरत है तो वहीं मायावती को भी लचीला रुख अपनाना होगा.

बीएमडब्ल्यू की कांग्रेस और बीएसपी में खास अहमियत है. बीएसपी कार्यकर्ता 'बहन मायावती’ को बीएमडब्ल्यू बुलाने लगे हैं. तो बीएमडब्ल्यू नेहरू काल से ही कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा है यानी ब्राह्मण, मुस्लिम और वीकर सेक्शन (कमजोर वर्ग).

लेकिन कालांतर में कांग्रेस के इस वोट बैंक के बड़े हिस्से पर उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने कब्जा कर लिया है. पिछले कुछ साल से राहुल गांधी दलितों के घरों के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल रहा. नतीजा तभी निकलेगा जब दोनों साथ आएंगे. 'हाथ’ का साथ पाकर 'हाथी’ की ताकत कई गुना बढ़ सकती है. 'हाथी’ पर सवार होकर कांग्रेस तेजी से बढ़ रहे नरेंद्र मोदी के 'कमल’ को रौंद सकती है.

दोनों दलों में यह गठबंधन देश के अल्पसंख्यक समुदाय समेत उन तमाम लोगों को मानसिक राहत दे सकता है जो मोदी के हाथों में केंद्र की सत्ता आने से डरे हुए हैं. सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए यह गठबंधन कारगर साबित हो सकता है. यह गठबंधन दोनों पार्टियों के लिए जरूरत भी बन गया है. लिहाजा दोनों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक हैं)

Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay