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पुस्तक समीक्षाः लोहिया- विचारों के आईने में

धी, नेहरू, आंबेडकर, जेपी की तरह लोहिया का भी जनमानस पर गाढ़ा असर था. उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में जितनी लड़ाई लड़ी, उससे कहीं ज्यादा आजाद भारत में लड़ी और कई बार जेल भी गए.

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विमल कुमार 08 January 2018
पुस्तक समीक्षाः लोहिया- विचारों के आईने में गांधी, नेहरू, आंबेडकर, जेपी की तरह लोहिया का भी जनमानस पर गाढ़ा असर था. उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन मे

डॉक्टर राममनोहर लोहिया देश के उन गिने-चुने राजनीतिज्ञों में थे जिनकी बौद्धिकता और बेबाकी तथा सादगीपूर्ण जीवन ने जनता को बहुत गहराई से प्रभावित किया था. गांधी, नेहरू, आंबेडकर, जेपी की तरह लोहिया का भी जनमानस पर गाढ़ा असर था. उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में जितनी लड़ाई लड़ी, उससे कहीं ज्यादा आजाद भारत में लड़ी और कई बार जेल भी गए. नेहरू के वे सबसे बड़े आलोचक थे और समाज की सभी समस्याओं पर क्रांतिकारी ढंग से विचार किया था. हिंदी के लेखकों से उनका जितना संवाद था, उतना किसी का नहीं. उन्होंने उच्च कोटि के निबंध भी लिखे और यादगार तथा प्रभावशाली भाषण भी दिए. दिवंगत मस्तराम कपूर ने कुछ वर्ष पूर्व उनकी रचनावली संपादित कर हिंदी के पाठकों के लिए नेक काम किया था पर आम पाठकों के लिए ऐसी कोई किताब न थी, जिसे पढ़कर लोहिया के सभी प्रमुख विचारों को एक जगह जाना जा सके.

प्रसिद्ध पत्रकार के. विक्रम राव और युवा अध्येता प्रदीप कुमार सिंह ने लोहिया संचयिता निकालकर सामान्य पाठकों और लोहिया प्रेमियों के लिए उपकार किया है. 573 पन्नों की इस किताब में गागर में सागर भरने का काम किया गया है. युवा पीढ़ी के लिए यह अधिक लाभकारी है क्योंकि इस एकमात्र पुस्तक से उन्हें लोहिया के वैचारिक व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का पता चल जाएगा. आठ अध्यायों वाली इस किताब में मार्क्सवाद, गांधीवाद, समाजवाद, धर्म, दर्शन, भाषा, जाति और स्त्री के प्रश्न से लेकर विदेश नीति, कश्मीर का सवाल और संसदीय राजनीति, पर्यावरण और शिक्षा सभी विषयों पर लोहिया के लेख शामिल किए गए हैं. राम, कृष्ण, शिव, द्रौपदी और सावित्री जैसे उनके चर्चित निबंधों के अलावा अंग्रेजी हटाओ और रामायण मेला पर उनके लेखों, पत्रों, पुस्तक समीक्षाओं और भाषणों को भी इसमें शामिल किया गया है. उनकी चर्चित पुस्तक भारत विभाजन के अपराधी के एक अंश को भी शामिल किया गया है, जो उन्होंने मौलाना आजाद की पुस्तक इंडिया विन्स फ्रीडम की समीक्षा करते हुए लिखी थी. लोहिया ने संसद में ''नेहरू जी दुनिया के सबसे महंगे प्रधानमंत्री हैं" की बहस भी चलाई थी. उसे भी शामिल किया गया है. इस तरह पुस्तक से लोहिया की एक पूरी तस्वीर और उनकी प्रतिभा की एक झलक मिलती है.

—विमल कुमार

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