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आनंद मोहन के खूनी खेल का अंत

उम्रकैद की सजा बरकरार रहने से आनंद की राजनैतिक प्रासंगिकता पर उठने लगे सवाल.

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aajtak.in
अमिताभ श्रीवास्तवपटना, 17 July 2012
आनंद मोहन के खूनी खेल का अंत आनंद मोहन

एक जमाने में उत्तरी बिहार के कोसी क्षेत्र के बेताज बादशाह रहे पूर्व सांसद आनंद मोहन का सबसे ताजा शौक है सलाखों के पीछे कविताएं लिखना. कैद में आजाद कलम शीर्षक से एक काव्य संग्रह लिख चुके आनंद मोहन को इस बात का एहसास हो गया है कि कलम हमेशा बंदूक से ज्‍यादा ताकतवर होती है. गोपालगंज के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट जी. कृष्णैया की हत्या के लिए लोगों को भड़काने और बढ़ावा देने के लिए पटना हाइकोर्ट ने बिहार के इस पूर्व सांसद को उम्रकैद की सजा सुनाई थी और 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा है.

इस तरह 52 वर्षीय आनंद मोहन को अब जेल की सलाखों के पीछे से कविताएं लिखने के लिए कई और साल मिल गए हैं. इस फैसले का निश्चित अर्थ इस राजपूत नेता और उसकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए सारे रास्ते बंद होना हो सकता है. यह फैसला दलित आइएएस अधिकारी कृष्णैया की आनंद मोहन की उकसाई एक भीड़ द्वारा 5 दिसंबर ,1994 को मुजफ्फरपुर में पिटाई और गोली मारकर हत्या करने के लगभग 18 वर्ष बाद आया है. कृष्णैया तब मात्र 35 वर्ष के थे.

2009 में छत्तीसगढ़ के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि आजीवन कारावास की स्थिति में किसी सजायाफ्ता को न्यूनतम 14 साल की कैद काटनी होगी और उसे 14 साल बाद खुद-ब-खुद रिहा किए जाने का कोई अधिकार नहीं होगा. जाहिर है, आनंद मोहन का कई साल के लिए सार्वजनिक जीवन से दूर रहना तय है. इससे पहले अक्तूबर, 2007 में निचली अदालत ने आनंद मोहन को मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन पटना हाइकोर्ट ने बाद में उसकी सजा को घटाकर उम्रकैद में तब्दील कर दिया था, इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सहमति दे दी है.

क्या मोहन बिहार की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं? क्या उस नेता के लिए सारे रास्ते खत्म हो चुके हैं, जिसके लिए उनके समुदाय में अब भी सहानुभूति है?  इसका जवाब हां में भी है और न में भी. मोहन का राजनैतिक करियर अब खत्म हो चुका है. उसे सुनाई गई सजा उसे पहले ही चुनाव लड़ने के अयोग्य बना चुकी है. अब, अंतिम फैसले से यह पक्का हो गया है कि वे आने वाले कई साल के लिए चुनाव प्रचार करने लायक भी नहीं रह गए हैं. राजनीति जैसे क्रूर पेशे में सहानुभूति अल्पजीवी होती है और वफादारी-अगर आपकी बहुत अच्छी हैसियत नहीं है-भी समय के साथ घटती चली जाती है.

लेकिन बाहुबली नेताओं की बिहार में अब भी एक ब्रांड वैल्यू है. 2010 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोहन के पैतृक घर जाकर सब को हैरत में डाल दिया था. वहां उन्होंने खुले तौर पर मोहन की मां से आशीर्वाद मांगा था. मोहन की मां के साथ नीतीश की मुलाकात ने लालू प्रसाद की आरजेडी को इतना परेशान कर दिया कि उन्होंने अपनी पार्टी के प्रमुख महासचिव और राज्‍यसभा सांसद रामकृपाल यादव को दो बार सहरसा जेल भेजा था, ताकि जेल में बंद पूर्व सांसद के साथ 'राजनीति पर चर्चा' की जा सके. इनका मोहन पर कोई असर नहीं पड़ा. दोषी साबित होने के बाद सहानुभूति की लहर से भारी आस लगाए मोहन ने अपनी पत्नी लवली आनंद को आलमनगर निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतारा था, जहां से उनकी जमानत जब्त हो गई थी.

बिहार के विषम और गुटों में बंटे समाज में, जहां जाति ही अकसर राजनीति का सबसे बड़ा निर्णायक पहलू होती है, मोहन अब भी अपनी पत्नी और राजनैतिक आकाओं के लिए कुछ वोट इकट्ठा करने के लिए अपनी लाचारी की दुहाई दे सकते हैं. अगर उन्हें बिहार के राजनैतिक परिदृश्य में खुद के लिए कोई भी उम्मीद नजर आती है तो वह यह अच्छी तरह जानते होंगे कि उनकी भूमिका एक मोहरे भर की रहेगी. वे सिर्फ भावनाओं को उकसाएंगें, और उम्मीद करेंगें कि आंसू वोट में बदल जाएं. तभी तो कहते हैं कि न्याय की चक्की धीमे पीसती है पर अक्सर बेहद महीन पीसती है.

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