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अर्थात्: कालिख छिपाने की रवायत

अमेरिकी लोगों का काला धन छिपाने पर स्विस बैंकों को भारी जुर्माना देना पड़ा है. भारत के लोग यदि अपनी नई सरकार से ऐसी ही अपेक्षा करते हैं तो गलत नहीं है क्योंकि यह सरकार विदेश में जमा काले धन को वापस लाने के वादे पर सत्ता में आई है.

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अंशुमान तिवारीनई दिल्ली, 27 October 2014
अर्थात्: कालिख छिपाने की रवायत Black Money

जायज कामों के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल करने वाले अमेरिकी भी अब एक हलफनामा भरते हैं जिसके आधार पर अमेरिकी टैक्स प्रशासन से सूचनाएं साझा की जाती हैं. दुनिया के धनकुबेरों की रैंकिंग करने वाली एक प्रतिष्ठित पत्रिका के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि अमेरिकी सरकार ने बेहद आक्रामक ढंग से स्विस बैंकों से अमेरिकी लोगों के काले धन की जानकारियां निकाल ली हैं और बैंकों को सख्त शर्तों से बांध दिया है जिसके बाद अमेरिका के लिए स्विस बैंकों की मिथकीय गोपनीयता का खात्मा हो गया है.

काले धन की जन्नतों के परदे नोचने का यही तरीका है. भारत के लोग जब अपनी नई सरकार से इसी तरह के दम-खम की अपेक्षा कर रहे थे तब सरकार सुप्रीम कोर्ट में काले धन के विदेशी खातों का खुलासा करने से मुकरते हुए गोपनीयता के उस खोल में घुस गई, जिससे उसे ग्लोबल स्तर पर जूझना है. सूचनाएं छिपाना काले धन के कारोबार की अंतरराष्ट्रीय ताकत है, जिसे तोड़ने के लिए विकसित देशों के बीच कर सूचनाओं के आदान-प्रदान का नया तंत्र तैयार है. भारत को गोपनीयता के आग्रह छोड़कर इस का हिस्सा बनने की मुहिम शुरू करनी थी, ताकि काले धन के विदेशी खातों तक पहुंचा जा सके.

काली कमाई के विदेशी खातों पर जर्मनी से मिली सूचनाओं की परदादारी का सरकारी हलफनामा कानूनी तो है लेकिन साहसी कतई नहीं. कालेधन वाले कुछ खातेदारों के नाम सामने लाए जा सकते थे क्योंकि मई 2012 में संसद में पेश श्वेत पत्र के मुताबिक जर्मनी से मिली सूचनाओं में 17 मामलों पर अभियोजन शुरू हो गया है और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की मानी जाए तो अभियोजन शुरू होने के बाद कर संधि की गोपनीयता आड़े नहीं आती.

काला धन रखने वालों के नाम छिपाने में जर्मनी के साथ कर संधि की शर्तों की ही ओट ली गई है. वैसे सच यह भी है कि कर संधियों के बंधन सख्त हैं. इस व्यवस्था में सूचनाएं हासिल करने के लिए विकासशील देश, विकसित देशों को भारी कर रियायतें देते हैं. कर संधियों की व्यवस्था भारत जैसे देशों को सूचनाएं छिपाने में मदद भी करती हैं, जैसा कि इस समय हो रहा है. कर संधियां काले धन की आवाजाही रोकने में कारगर साबित नहीं हुईं इसलिए विकसित देशों ने कर सूचनाओं को बांटने का एक ऑटोमेटिक तंत्र बनाया है. भारत को इस तंत्र में शामिल होना है. लेकिन इसके लिए जिस हिम्मत की जरूरत है, वह काले धन के मामले में नजर नहीं आई.

दिल्ली में पिछले माह तब काले धन के विदेशी खातों पर परदेदारी का हलफनामा बन रहा होगा, जब केंज (ऑस्ट्रेलिया) में विकसित देशों के वित्त मंत्री टैक्स सूचनाओं के आदान-प्रदान के ढांचे को अंतिम रूप दे रहे थे, जिसे कानून के जरिए लागू किया जाएगा. 2018 से सक्रिय होने वाले इस सूचना तंत्र की घोषणा अगले माह ब्रिसबेन की जी20 शिखर बैठक में होगी, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी होंगे. विभिन्न देशों के बीच सूचनाओं का निर्बाध आदान-प्रदान उस गोपनीयता को खत्म करता है जिसके बूते काला धन छिपाने वाले टैक्स हैवेन काम करते हैं.

विकसित देशों का यह तंत्र सूचनाओं के स्वचालित विनिमय की प्रणाली है. मौजूदा व्यवस्था के तहत देशों को एक-दूसरे से जानकारियां मांगनी पड़ती हैं, जिसमें भ्रष्ट अधिकारी सूचनाएं छिपा लेते हैं. टैक्स जस्टिस नेटवर्क के मुताबिक, काला धन छिपाने वालों पर नकेल डालने के लिए यह तंत्र सबसे प्रभावी व्यवस्था है. भारत को इन सूचनाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है जो भ्रष्टाचार का बड़ा शिकार है और जिसकी लूट उन टैक्स हैवेन में जमा है, जहां से विकसित मुल्क अपना काला धन निकाल रहे हैं. 

काले धन पर अमेरिका की सख्ती के बाद स्विट्जरलैंड का सबसे  पुराना वेगलिन बैंक पिछले साल बंद हो गया. अमेरिकी लोगों का काला धन छिपाने पर यूबीएस को भारी जुर्माना देना पड़ा है. 2011 में ब्रिटेन ने भी स्विस बैंकों से ब्रितानियों के काले धन पर मोटा टैक्स वसूलना शुरू कर दिया है. भारत के लोग यदि अपनी नई सरकार से ऐसी ही अपेक्षा करते हैं तो गलत नहीं है, क्योंकि यह सरकार विदेश में जमा काले धन को वापस लाने के वादे पर सत्ता में आई है. यह बात अलग है कि विदेशी खातों तक पहुंचने का रास्ता पारदर्शिता से होकर जाता है, जिसे बनाने का दम-खम अभी तक नजर नहीं आया है. 

भारत में सच छिपाना सरकारी नियम का हिस्सा है जो न केवल काली कमाई के लिए मुफीद है बल्कि पारदर्शिता की कोशिशों में शामिल होने में बाधा भी बनता है. जहां खुफिया एजेंसियां ही आपस में सूचनाएं न बांटती हों और बैंकों के बीच डिफॉल्टरों की जानकारियों का साझ ही न होता हो वहां टैक्स हैवेन से सूचनाएं लेना खाम ख्याली ही है.

ओईसीडी सेंटर ऑफ टैक्स पॉलिसी के निदेशक पास्कल सेंट एमेंस ने इस साल मई में कहा था कि विकासशील देशों की कर प्रणाली इतनी आधुनिक नहीं है कि उसे सूचनाओं के ऑटोमेटिक विनिमय का हिस्सा बनाया जा सके. अगर ब्रिसबेन की जी20 बैठक में भारत कर सूचना तंत्र से जुड़ने का दबाव बनाएगा तो उसकी अपनी परदेदारी इन कोशिशों की चुगली करेगी.

काले धन को छिपाने का ग्लोबल तंत्र गोपनीयता के जबरदस्त प्रतिस्पर्धी आग्रहों पर आधारित है जिसे भेदने के लिए अपने नियमों को पारदर्शी बनाना पहली शर्त है, क्योंकि मुकाबला टैक्स हैवेन से है जहां सच छिपाने का कारोबार कानून के तहत होता है. उम्मीद थी कि नई सरकार कानून बदलने और पारदर्शिता का साहस दिखाएगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे ने काले धन को लेकर गोपनीयता की अमावस को और गाढ़ा कर दिया है. काली कमाई के खिलाफ मुहिम की यह बड़ी दब्बू शुरुआत है.

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