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आखिर रुपया इतना दुबला हुआ क्यों?

रुपए की दुर्दशा घरेलू आर्थिक कुप्रबंधन की वजह से हुई जबकि यूरो और डॉलर को मुश्किल में देख चीन कर रहा युआन का वैश्वीकरण. दो साल पहले रुपए के वैश्वीकरण की दिशा में सरकार ने उसका प्रतीक चिक्क अपनाया. तब से रुपया 20 फीसदी गिर चुका है.

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aajtak.in
धीरज नय्यरनई दिल्‍ली, 12 June 2012
आखिर रुपया इतना दुबला हुआ क्यों?

अभी 1 जून की सुबह चीन ने अपने बढ़ते वैश्विक आर्थिक प्रभाव को और बढ़ाने के लिहाज से एक बड़ा कदम उठाया. उसने अपनी मुद्रा युआन के जापानी मुद्रा येन के साथ सीधे व्यापार की घोषणा की. इसी दिन मुंबई में भारतीय रिजर्व बैंक ने डूबते रुपए को थामने का अपना आशाहीन प्रयास जारी रखा, लेकिन उसे मामूली कामयाबी ही मिली.

रुपया 31 मई के 56.10 रुपए प्रति डॉलर के भाव से गिरकर 1 जून को 55.60 रुपए प्रति डॉलर पर पहुंच गया. यहां तक कि चीन अब युआन को भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने के अपने लक्ष्य के करीब पहुंच गया है, लेकिन एक आर्थिक महाशक्ति बनने का भारत का ख्वाब अभी दूर की कौड़ी ही है.

चीन-जापान व्यापार सिर्फ युआन और येन में निपटाया जाएगा और इसके लिए अमेरिकी डॉलर की जरूरत नहीं होगी. इस कदम से दोनों देशों की मुद्रा को डॉलर में बदलने की लेन-देन की लागत बच जाएगी. पहले सालाना 300 अरब डॉलर का 60 फीसदी चीन-जापान व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता था.  इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा. चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक ''युआन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ाने के लिए एक कदम और उठाया गया है.''

अमेरिकी एजेंसी ब्लूमबर्ग ने इसे ''चीन के अपनी मुद्रा के वैश्विक इस्तेमाल को बढ़ाने के प्रयास और डॉलर पर निर्भरता को कम करने की दिशा में एक और कदम'' बताया.

चीन ने यह कदम सही समय पर उठाया है. यूरो जोन गहरे संकट में है और जापान पिछले दो दशकों से ठहरा हुआ है, ऐसे में अमेरिकी डॉलर दुनिया भर में वास्तविक रूप में एकमात्र स्वीकार्य मुद्रा है. यहीं पर एक विकल्प के लिए जगह बनती है. भारत के मुकाबले चीन काफ ी बेहतरीन स्थिति में है. किसी देश की मुद्रा की ताकत आखिरकार उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती से तय होती है.

चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसका जीडीपी 7.2 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर है, भारत के 1.7 लाख करोड़ डॉलर के मुकाबले लगभग चार गुना. यह करीब 8 फीसदी की वृद्धि दर के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था भी है, भारत की 6 फीसदी से भी कम वृद्धि दर के मुकाबले काफी तेज. चीन का चालू खाता सरप्लस में है क्योंकि वह आयात से ज्‍यादा निर्यात करता है. इससे युआन को ताकत मिलती है. दूसरी तरफ , भारत चालू खाते के मोर्चे पर भारी घाटे का सामना कर रहा है. इससे रुपए की हालत और नाजुक हो जाती है.

अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय बताते हैं, ''डॉलर सिर्फ व्यापार में अपने इस्तेमाल की वजह से ही दुनिया की भंडार मुद्रा नहीं बना हुआ है, इसकी वजह यह भी है कि लोग डॉलर में प्रचलित वित्तीय परिसंपत्तियों जैसे बांड एवं ट्रेजरी बिल्स जैसी प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं. चीन ने अभी अपने वित्तीय बाजारों को नहीं खोला है, इस तरह से उसने युआन को सिर्फ व्यापारिक जरूरतों के लिए सीमित रखा है.'' देबरॉय को लगता है कि अब से कम से कम 20 साल के बाद ही युआन वैश्विक मुद्रा बन पाएगा. फिलहाल चीन शायद उसे क्षेत्रीय स्तर पर स्वीकार्य मुद्रा बनाने की सीमित महत्वाकांक्षा ही रखता है.

दूसरी तरफ , रुपया तो क्षेत्रीय मुद्रा का दर्जा हासिल करने की भी नहीं सोच सकता. ऐक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सौगत भट्टाचार्य कहते हैं, ''मैं यह कल्पना ही नहीं कर सकता कि रुपए को मदद के रूप में भारत वापस भेजने के अलावा जापान उसका कोई और भी इस्तेमाल कर सकता है.''

पिछले साल से रुपए के मूल्य में 20 फीसदी की गिरावट आ चुकी है. इसके इस रिकॉर्ड को देखते हुए कोई भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार में रुपया नहीं रखना चाहेगा. देबरॉय कहते हैं, ''रुपए को वैश्विक मुद्रा का दर्जा हासिल करने में कम से कम 40 साल लग सकते हैं. यदि यूपीए सरकार लंबे समय तक सत्ता में रही तो इसमें और समय लग सकता है.''

पिछले एक साल में रुपए में आई गिरावट सरकार के खराब आर्थिक प्रबंधन को ही प्रदर्शित करती है. विदेशी निवेशकों ने यह संकेत दिया है कि उन्हें फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसा नहीं है. रुपए ने उनका गुस्सा और बढ़ा दिया है. जुलाई 2010 में सरकार ने रुपए के लिए एक प्रतीक चिन्ह स्वीकार किया था. तब इसे रुपए के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में पहले कदम के रूप में देखा जा रहा था. इसके बाद से रुपया 20 फीसदी गिरकर 46.50 रु. से करीब 55.60 रु. प्रति डॉलर पर पहुंच गया है. साल 2010 में सरकार के पास सज-संवर कर तैयार खड़ा रुपया था, लेकिन अब यह कहीं जाता नहीं दिख रहा.

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