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वोटरों ने कहा, विकास करो या दफा हो जाओ | अखिलेश की अनदेखी तस्‍वीरें

पिछले पांच साल के दौरान सरकारी योजनाओं के कुप्रबंधन और व्यापक भ्रष्टाचार से खार खाई जनता ने मायावती की किस्मत छोटी कर दी.
वोटरों ने कहा, विकास करो या दफा हो जाओ | <a style='COLOR: #d71920' href='http://bit.ly/yioPbT' target='_blank'>अखिलेश की अनदेखी तस्‍वीरें</a>
मनु कौशिक और आशीष मिश्रलखनऊ, 17 March 2012

मायावती हारीं क्यों, यह जानने के लिए उत्तर प्रदेश में हरदोई के भरावां गांव चलते हैं जो संडीला विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है. यहां के प्राथमिक चिकित्सा केंद्र के तहत 300 गांव आते हैं. यहां चार विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए थे-मेडिसिन, सर्जरी, बाल विशेषज्ञ और महिला विशेषज्ञ. इसके अलावा 30 बिस्तर, एक ऑपरेशन थिएटर, एक प्रसव कक्ष, एक एक्स-रे मशीन, एक पैथोलॉजी लैब और एक एम्बुलेंस भी होने थे. फिलहाल यहां दो डॉक्टर हैं, छह बिस्तर और बाकी कोई सुविधा नहीं. हर माह यहां करीब 200 प्रसव होते हैं.यूपी की हालत

केंद्र के प्रमुख डॉ. सुशील कुमार कहते हैं, ‘जब प्रसूताओं की संख्या बिस्तरों से ज्‍यादा हो जाती है तो हम उन्हें कह देते हैं कि या तो अपनी व्यवस्था खुद करें या लौट जाएं. यदि इनमें से कोई इमरजेंसी केस होता है तो उसे हम 20 किमी दूर एक सामुदायिक केंद्र में भेज देते हैं. हमारे पास एंबुलेंस नहीं है, इसलिए परिवारों को निजी वाहन से ही जाना होता है.’ इस चुनाव में

उपेक्षा का आलमः मध्य उत्तर प्रदेश के भरावां गांव स्थित स्वास्थ्य केंद्र के बाहर बैठी इस महिला ने महज दो घंटे पहले एक बच्चे को जन्म दिया. एनआरएचएम घोटाले की मार इन पर ही पड़ी है

संडीला क्षेत्र से मायावती की पार्टी बसपा के उम्मीदवार अब्दुल मन्नान लगभग 20,000 वोट से चुनाव हार गए. मन्नान ने यहां से पिछला चुनाव जीता था और राज्‍य के विज्ञान और तकनीक मंत्री पद पर भी रहे. समाजवादी पार्टी के कुंवर महावीर सिंह 84, 644 वोट पाकर विजयी रहे. बाकी उम्मीदवारों की कोई हैसियत नहीं रही. कांग्रेस प्रत्याशी को 6,886 तो भाजपा प्रत्याशी को 1,525 वोट मिले.

उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली उन तमाम कारणों में से एक है, जिसकी वजह से मतदाताओं ने बसपा को सबक सिखाया. यह आने वाली सरकार के लिए भी सबक है. मायावती के पांच साल के शासन के दौरान पूर्वांचल में जापानी एन्सेफलाइटिस से 5,000 से अधिक बच्चों की मौत हो गई लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया. जब बात बढ़ी तो स्वास्थ्य मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने 400 करोड़ रु. का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजकर पल्ला झाड़ लिया.माया ने गंवाया मौका

जब पूर्वी उत्तर प्रदेश में बच्चे एन्सेफलाइटिस से मर रहे थे, तो सरकार क्या कर रही थी. इन वर्षों में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की चर्चा स्वास्थ्य संबंधी किसी उपलब्धि के कारण नहीं बल्कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम घोटाले के कारण होती रही है. इस घोटाले के कारण बसपा के सबसे कद्दावर मंत्रियों में से एक बाबू सिंह कुशवाहा को पद और प्रतिष्ठा दोनों गंवानी पड़ी. मायावती ने उन्हें पद और पार्टी दोनों से बाहर करके नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

मायावती की हार का एक बड़ा कारण राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाला है जिसमें केंद्र से मिले पैसे का दुरुपयोग हुआ. पिछले साल कैग की रिपोर्ट में इसे 5,000 करोड़ रु. का घोटाला बताया गया था और सीबीआइ अब तक इसकी जांच कर रही है. मामले की जांच के दौरान पांच लोगों की संदिग्ध हालात में मौत हो गई है जिसमें दो राज्‍य के मुख्य चिकित्सा अधिकारी रह चुके हैं.

यही नहीं लखनऊ के जिला जेल में जिस तरह से डिप्टी सीएमओ की संदिग्ध हालात में मौत हुई उसने भी माया सरकार के दुरुस्त कानून-व्यवस्था के दावे पर एक बदनुमा दाग लगा दिया था. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पिछले साल जुलाई में एक स्वतंत्र जांच में पाया था कि राज्‍य के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 779 एंबुलेंस की खरीद 54.56 करोड़ रु. में की थी, लेकिन इनमें से 620 निर्माता के पास ही खड़ी रहीं.

उत्तर प्रदेश में सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल नहीं है. मनरेगा जैसी केंद्रीय योजनाएं भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहीं. लखनऊ से 65 किमी दूर उन्नाव जिले के सखन राजपूतन गांव के निवासी राजू कहते हैं, ‘मनरेगा में हमें 15 दिन के भीतर भुगतान होना चाहिए, लेकिन अकसर हमें तीन से चार महीने में पैसे मिलते हैं और वे भी कम.’

पिछले तीन साल से मनरेगा में काम कर रहे राजू को पिछले ही साल पता चला कि उसके नाम पर दो जॉब कार्ड जारी किए गए हैं. वे कहते हैं, ‘हाजिरी लगाने के लिए काम की साइट पर मस्टर रोल नहीं लाया जाता. अफसर मजदूरों की संख्या को बढ़ाकर दिखाते हैं और पैसे चुराते हैं. मैंने बीडीओ ऑफिस में कई बार शिकायत की लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया.’

असल में 2007 में पूरी ठसक के साथ सत्ता संभालने वाली मायावती ने भले ही 'सर्वजन हिताय' का नारा दिया हो लेकिन पांच साल के दौरान उनकी सरकार की योजनाएं आम लोगों तक नहीं पहुंच पाईं. बंद कमरे में बैठकर पांच साल तक सरकार चलाने का अनोखा प्रयोग करने वाली मायावती के राज में उनके पसंदीदा अधिकारियों को इतनी छूट मिली कि वे सरकार के मंत्रियों से भी ऊपर उठ गए.

नतीजा यह हुआ कि उन योजनाओं में भी जमकर घालमेल हुआ जो मायावती की प्राथमिकता वाली थीं. चुनाव के नतीजे आने के बाद यह साफ हो गया कि मायावती की योजनाओं के सलीके के साथ धरातल पर न उतरने की वजह से जनता में उपजे रोष ने बसपा को सत्ता से बेदखल कर दिया.

चुनाव करीब आने के बाद मायावती ने अपने 21 मंत्रियों को हटा दिया जिनमें पांच ऐसे थे जिन पर आपराधिक आरोप थे. मतदान की तारीखें आने के बाद 16 मंत्रियों को बर्खास्त किया गया. लेकिन मायावती का यह दांव भी काम नहीं आया.

बुंदेलखंड में गरीबी और भुखमरी के चलते किसान आत्महत्या करते रहे लेकिन मायावती सरकार इससे निबटने के लिए केंद्र का ही मुंह ताकती रही. प्रदेश में एक किसान परिवार की औसतन वार्षिक आय को 55,000 रु. आंकते हुए वर्ष 2009 में मायावती सरकार ने इसे अगले तीन साल में दोगुना करने की योजना तैयार की.

2,000 नई मंडियों को खोलने का प्रस्ताव भी तैयार किया गया जिससे किसानों को बिचौलियों से बचाकर उनकी उपज का सही मूल्य दिलाया जा सके. इसके लिए पंचायती राज विभाग और ग्राम्य विकास विभाग की खाली पड़ी जमीन पर मंडी बनाने का प्रस्ताव दिया गया. लेकिन विभागों से तालमेल के अभाव में दो साल बीतने के बाद भी योजना अमल में नहीं आ सकी.

नतीजा किसान की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. किसान नेता सुनील सिंह बताते हैं कि माया सरकार ने किसानों की वार्षिक औसत आय 55,000 रु. उसी प्रकार तय की जिस प्रकार योजना आयोग ने बीते वर्ष गरीब की परिभाषा तय की थी. आलम यह है कि प्रदेश के कुछ हिस्सों को छोड़ दें तो ज्यादातर इलाकों में किसानों की औसतन वार्षिक आय 20,000 से भी कम बैठती है. इन वजहों से किसानों का धीरे-धीरे बसपा सरकार से मोह भंग होता गया और विधानसभा चुनाव में उसने मायावती से नाराजगी जाहिर कर दी.

योजना आयोग के मुताबिक, 2004-05 से 2010-11 के बीच तीन साल के मुलायम राज समेत छह साल के दौरान उत्तर प्रदेश के जीडीपी की औसत वृद्धि दर 7.01 फीसदी रही. इसी अवधि के दौरान बिहार जैसे समान रूप से 'पिछड़े' राज्‍य की औसत वृद्धि दर 10.9 फीसदी, ओडीसा की 9.47 फीसदी और झारखंड की विकास दर 9.45 फीसदी थी. इस अवधि के दौरान लगातार तीन साल के लिए समूची भारतीय अर्थव्यवस्था 9 फीसदी से ज्‍यादा की दर से बढ़ी.

इलाहाबाद के जी.बी. पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट में सामाजिक इतिहासकार और नृशास्त्री बद्री नारायण कहते हैं, ‘नोएडा से आगरा तक बनने वाले यमुना एक्सप्रेस-वे, गंगा एक्सप्रेस-वे और कुछ ऊर्जा परियोजनाओं को छोड़ दें तो मायावती का राज नीतिगत मोर्चे पर पूरी तरह नाकाम रहा.’

हालांकि जनता के लिए जरूरी आधारभूत ढांचे के निर्माण में मायावती सरकार ने कोई सकारात्मक पहल नहीं की. अब बाढ़ से जुड़े इंतजामात को ही ले लें. वर्ष 2008 में माया सरकार के दौरान प्रदेश ने भीषण बाढ़ की मार झेली. उस साल बाढ़ के चलते 1,158 लोगों की मौत हुई और 731 करोड़ रु. की संपत्ति का नुकसान हुआ.

इसके बाद भी प्रदेश सरकार ने अपनी तरफ से कोई प्रबंध नहीं किए और जब चुनाव नजदीक आने लगा तो मायावती ने मई, 2011 में बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं के लिए केंद्र से 15,000 करोड़ रु. के विशेष पैकेज की मांग कर दी. मायावती उत्तर प्रदेश के हित में लगातार केंद्र से जूझ्ती रहीं, लेकिन मतदाताओं को यह बात हजम नहीं हुई. मतदाता विकास कार्यों में सरकार की नाकामी से नाराज थे. 

लखनऊ से 60 किमी दूर लाला मऊ मवाई गांव के लोगों को जब पिछले साल जनवरी में पता चला कि मुुख्यमंत्री मायावती उधर आने वाली हैं, तो वे अचानक कुछ व्यस्त हो गए. यह गांव राज्‍य के उन 19,000 'आंबेडकर गांव' में  एक है जिन्हें तीव्र समेकित विकास के लिए राज्‍य सरकार की डॉ. आंबेडकर ग्राम विकास योजना के तहत चुना गया है. इसके बावजूद लाला मऊ मवाई में कोई खास बदलाव नहीं आया है. गांव के 700 लोगों को आशंका थी कि मायावती के साथ आए अफसर उन्हें शिकायत करने से रोकेंगे, इसलिए इन्होंने अपनी शिकायत गांव की दीवारों पर लिख दीं ताकि मायावती की नजर न चूक जाए.

स्थानीय अफसरों को इसकी भनक लगी तो उन्होंने चुपचाप मायावती के दौरे में से उस गांव को निकाल दिया. मुख्यमंत्री तो कभी नहीं आईं, लेकिन पुलिस ने उन लोगों को सताना शुरू कर दिया जिन्होंने यह विरोध का तरीका अपनाया था. इनमें से एक खेतिहर मजदूर रामप्रकाश था जिसे पुलिस से अपनी जान बचाने के लिए घर से कई दिनों तक दूर रहना पड़ा. उसने बताया, ‘उन्होंने मेरे परिवार को खराब नतीजों की धमकी दी. एक तो वैसे ही हम इतना खराब जीवन जीते हैं, उस पर से इन्होंने सोचिए कितना तबाह किया होगा? सिंचाई के लिए पानी नहीं, स्वास्थ्य केंद्र 10 किमी दूर है. वादे के बावजूद गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं खुला. अधिकारी हमारी सुनते नहीं. वे रिश्वत मांगते हैं.’ 

ऐसी ही कहानी दूसरे आंबेडकर गांवों की भी है-पानी की कमी, बिजली कटौती, खराब सड़कें. मायावती ने 2009 में खुद माना था कि उम्मीद के मुताबिक योजना काम नहीं कर रही है और उन्होंने सरकारी अधिकारियों को कहा था कि वे उस वर्ष और गांवों को योजना में शामिल न करें, बल्कि पैसे का इस्तेमाल पहले से चुने गए गांवों को बेहतर बनाने में करें.

मायावती हालांकि दलित वोट बैंक को विकास अनुदान जारी करने में निश्चित तौर पर उदार रही हैं, जो राज्‍य की आबादी का पांचवां हिस्सा है. राज्‍य में सिर्फ  अनुसूचित जाति के लिए अलग से आवंटित किए गए अनुदान में 2007-08 के 5329.19 करोड़ रु. से 2011-12 के 9,722 करोड़ रु. तक इजाफा हुआ है, जो राज्‍य के योजना व्यय का 20 फीसदी है. चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रदेश बसपा दफ्तर में अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती ने कहा कि चुनाव में उनका भरोसेमंद दलित वोट बसपा से उसी तरह जुड़ा रहा जैसे पहले था.

इस विधानसभा चुनाव में मायावती ने युवाओं की नब्ज को टटोलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. शिक्षा और खासकर उच्च शिक्षा की हालत काफी खराब रही. इसका अंदाजा इन आंकड़ों से ही लगाया जा सकता है कि प्रदेश के 75 जिलों में 47 ऐसे हैं जहां उच्च शिक्षा में प्रवेश दर 6 फीसदी से भी कम थी.

राज्य के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 30 फीसदी पद खाली तो राजकीय महाविद्यालयों में यह आंकड़ा 35 फीसदी का था. शैक्षिक रूप से पिछड़े जिलों के लिए केंद्र की योजना के तहत राज्य विश्वविद्यालयों को अपने अधिकार क्षेत्र में कॉलेज खोलने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को प्रस्ताव भेजे जाने थे लेकिन सैकड़ों एकड़ जमीन पर पार्कों का निर्माण करने वाली माया सरकार के जिलाधिकारी नए कॉलेज के लिए जमीन नहीं खोज पाए.

मायावती का कहना है कि उनकी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में पलटवार करेगी, लेकिन अगले कुछ महीनों तक लोग उनके मायावी विकास की पोल खुलते देखेंगे और घोटालों में फंसे कुछ पूर्व मंत्री और अधिकारी जांच की तपिश महसूस करेंगे. उम्मीद है कि सपा के नेता इस बात को समझ रहे होंगे.

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