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चुनावी सर्वेक्षणों को ठेंगा दिखातीं मायावती

चुनावी पंडितों को मायावती ने लगातार गलत साबित किया है. हर विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन भी अनुमान से बेहतर ही रहा है.

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संतोष कुमारलखनऊ, 25 February 2012
चुनावी सर्वेक्षणों को ठेंगा दिखातीं मायावती मायावती

मायावती को समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है. माया के संदर्भ में चुनावी पंडितों पर यह टिप्पणी सच दिखती है. उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों से बसपा सुप्रीमो मायावती ने चुनावी पंडितों को हमेशा बगलें झांकने को मजबूर किया है. राज्य विधानसभा के पिछले चुनाव में कोई भी सर्वेक्षण मायावती के पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने की भविष्यवाणी तो दूर, उसके आसपास की सीटों का भी अनुमान नहीं दे सका.

अमेरिका की कोलंबिया युनिवर्सिटी में समाजशास्त्र पढ़ा रहे और यूपी चुनाव को करीब से देखने वाले विवेक कुमार कहते हैं, ‘मायावती के ज्यादातर वोटर और समर्थक गांवों में रहते हैं और समाज के संभ्रांत लोग चुनाव का विश्लेषण करते वक्त उसे भांप नहीं पाते.’ चुनाव प्रचार और रणनीति में मायावती की अपनी खास शैली है. वे मीडिया को ज्यादा तवज्जो नहीं देतीं. 2007 में हुए पिछले चुनाव में मायावती ने पहली बार 206 सीटों के साथ राज्य के मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाली.

इस चुनाव में सीएसडीएस-इंडियन एक्सप्रेस के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण और टीवी चैनलों के एक्जिट पोल में किसी को बहुमत मिलता नहीं दिखाया गया था. 2012 की तरह ही 2007 में भी चुनावी पंडितों ने त्रिशंकु विधानसभा और बसपा-सपा में कांटे की लड़ाई का अनुमान लगाया था. जबकि नतीजों ने सारे अनुमान धराशायी कर दिए और मायावती ने अपने बलबूते बहुमत का आंकड़ा पार कर नया इतिहास रच दिया. पिछले चुनाव में मायावती का सर्वजन फार्मूला सबको चौंका गया.

बीएसपी का कैडरइसी तरह 2002 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने तमाम अनुमानों को गलत साबित करते हुए 98 सीटें हासिल की. जबकि आधा दर्जन कंपनियों-चैनलों के सर्वे में बसपा को बमुश्किल 80-84 सीटों पर सिमटता दिखाया गया था. हालांकि सिर्फ द वीक ने 105 से 135 सीटों का अनुमान दिया था. 1996 के विधानसभा चुनाव में बसपा-कांग्रेस का गठबंधन था, लेकिन उस बार भी मायावती का प्रदर्शन दो बड़ी पत्रिकाओं के औसत अनुमान 62 सीट से बेहतर रहा था और 425 में से बसपा को 67 सीटें मिली थीं. लोकसभा के लिए 2004 में हुए चुनाव में एसी नील्सन ने 11, एनडीटीवी ने 17 सीटों का अनुमान दिया था, लेकिन बसपा ने 19 सीटें जीतीं. 2009 के लोकसभा चुनाव में भी चुनावी पंडितों के अनुमान धराशायी हुए, लेकिन भितरघात और कैडर की नाराजगी से माया को पहली बार अनुमान से कम सीटें मिलीं.

मायावती के बारे में पूर्वानुमान लगाने में सर्वे कंपनियों की नाकामी पर डीआरएस के प्रमुख जी.वी.एल. नरसिम्हा राव कहते हैं, ‘जिस पार्टी का जातीय समर्थन होता है, सर्वे में उसके बारे में सही प्रतिनिधित्व नहीं आ पाता.’ सर्वे की प्रक्रिया और मजबूरी के बारे में वे कहते हैं, ‘सर्वे में ज्यादातर जागरूक लोग भाग लेते हैं और जातीय राजनीति में निचले तबके के लोग ज्यादा नहीं बोलते.’ मायावती की चुनावी तैयारी अन्य पार्टियों से अलग है. वे बसपा कैडर को चुनाव की दृष्टि से हमेशा सक्रिय रखती हैं.

विधानसभावार संयोजकों की नियुक्ति में उनका सीधा दखल होता है, जिनसे सीधा संवाद कर वे अपनी रणनीति को अंजाम देती हैं. सीएसडीएस के सीनियर फेलो और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘कुछ समय पहले तक बसपा का मतदाता बोलने में संकोच करता था, लेकिन वह स्थिति अब नहीं है. आज की तारीख में अगर ईमानदारी से रैंडम पद्धति से सर्वे किया जाए तो कोई कारण नहीं कि बसपा के वोट का ठीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता.’

हालांकि वे मानते हैं, ‘एक दशक में जनमत सर्वेक्षणों ने बसपा को कम करके आंका है. लेकिन कुछ बेहतर सर्वेक्षणों ने बसपा के वोट का ठीक अनुमान भी लगाया है.’ बसपा के वोट को कम आंकने के पीछे की वजहों के बारे में यादव कहते हैं, ‘आम तौर पर व्यावसायिक जनमत सर्वेक्षण बसपा को इसलिए कम आंकते हैं क्योंकि सर्वे में उत्तरदाताओं का चयन करने में आम तौर पर समाज के सबल, संपन्न और सवर्ण समाज को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी जाती है.’

मायावती आज भी सर्वेक्षणकर्ताओं के लिए एक पहेली हैं. मतगणना के दिन यानी 6 मार्च का इंतजार सिर्फ नेताओं को नहीं बल्कि सर्वेक्षणकर्ताओं को भी होगा.

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