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ममता बनर्जी: बावलेपन के इजहार की मलिका

सत्ता में आने के करीब एक साल बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रोजाना एक नया दुश्मन अपने खिलाफ खड़ा कर रही हैं.

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प्रिया सहगलनई दिल्‍ली, 03 May 2012
ममता बनर्जी: बावलेपन के इजहार की मलिका

ममता बनर्जी के लिए पश्चिम बंगाल से माकपा के 34 साल पुराने शासन का खात्मा करना अपेक्षाकृत आसान था. वे अपनी ऐतिहासिक जीत के एक वर्ष बाद अब भी किसी मुख्यमंत्री की बजाए सड़क पर जूझती विपक्षी नेता की तरह ज्‍यादा व्यवहार कर रही हैं. बावलेपन की मलिका ममता के मनमौजी राज की कुछ झलकियां.

बाएं मत देखो
16 अप्रैल को पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करते हुए खाद्य आपूर्ति मंत्री ज्‍योतिप्रियो मल्लिक ने तृणमूल कांग्रेस के वफादारों से कम्युनिस्टों के साथ घुलने-मिलने से दूर रहने को कहा. उन्होंने कहा, ''उनके साथ बैठो मत, उनके साथ खाना-पीना मत करो. जब तक आप उनसे नफरत करना नहीं सीखोगे, आप बदला लेने लायक नहीं बन पाओगे.''

माकपा के पूर्व राज्‍यसभा सदस्य मोहम्मद सलीम इसका यह कहकर मजाक उड़ाते हैं, ''इन दिनों ममता बनर्जी को पढ़ पाना बहुत मुश्किल है. इसकी एक वजह अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव हो सकते हैं. पश्चिम बंगाल में बहस-मुबाहिसे की भावना बहुत प्रबल है. लोग चाय की दुकानों पर और सामाजिक कार्यक्रमों में एकजुट होते हैं और राजनीति पर बहस करते हैं. हो सकता है ममता को यह चिंता हो कि उनके कार्यकर्ता अपना बचाव नहीं कर पाएंगे.'' लेकिन टीएमसी के नेता डेरेक ओ'ब्रायन कहते हैं, ''बात जिस संदर्भ में कही गई थी, उसे जरूर देखना चाहिए. यह बात पार्टी की एक आंतरिक बैठक में 1,500 पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने कही गई थी.

बयान को संदर्भ से हटकर देखा जा रहा है.'' टीएमसी के एक कार्यकर्ता इशारा करते हैं कि माकपा के पास खीसें निपोरने की कोई वजह नहीं है. ''उनकी पार्टी के अपने संविधान को देखिए. वे खुद भी (पूर्व लोकसभा अध्यक्ष) सोमनाथ चटर्जी जैसे निष्कासित नेताओं के सामाजिक बहिष्कार की नीति अपनाते हैं.''

कार्टून कुफ्र हैं
13 अप्रैल को पुलिस ने जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अंबिका महापात्रा और उनके एक पड़ोसी को इंटरनेट पर ममता विरोधी कार्टून प्रसारित करने पर गिरफ्तार कर लिया. सत्यजित रे की फिल्म सोनार केल्‍ला पर आधारित इस कार्टून में कथित तौर पर ममता और रेल मंत्री मुकुल रॉय को इस बारे में बातचीत करते हुए दिखाया गया है कि पार्टी सांसद दिनेश त्रिवेदी से कैसे छुटकारा पाएं.

लगभग 65 प्राप्तकर्ताओं को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की ''अपमानजनक छवि'' भेजने के लिए महापात्रा पर सूचना तकनीक कानून की धारा 66 और भारतीय दंड संहिता की धारा 500, 509 और 114 (अवमानना के लिए दंड) के तहत आरोप लगाए गए हैं.

ममता के धुर विरोधी और कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी ने मीडिया से कहा, ''यह लोकतंत्र नहीं, बावलेपन का इजहार है.'' तृणमूल कांग्रेस के साथ सत्ता में भागीदार कांग्रेस सावधानी से खुद को इस विवाद से परे रखे हुए है. शहर में घबराहट का माहौल इस कदर था कि बड़ी दीदी के राज्‍य के अपराध जांच विभाग (सीआइडी) से सोशल मीडिया की निगरानी करवाने की योजना की अफवाह चल पड़ी. ओ'ब्रायन ने अपनी नेता के बचाव की कोशिश करने और सीआइडी की अफवाह से इनकार करने का फैसला किया और ट्विटर जंग का मैदान बन गया.

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सबसे पहले इस जंग में कूदे. उन्होंने लिखा, ''अगर मैंने उन लोगों को गिरफ्तार किया जिन्होंने मेरे खिलाफ कार्टून बनाए हैं तो जेलों में जगह कम पड़ जाएगी.

विरोध करो, खामियाजा भुगतो
8 अप्रैल को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन ऐंड रिसर्च में असिस्टेंट प्रोफेसर सारोथी पार्था रे को कोलकाता के नोनाडांगा में जगह खाली कराने के विरोध में आयोजित एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने पर गिरफ्तार कर लिया गया.

12 अप्रैल को उनकी जमानत की अर्जी खारिज कर दी गई और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. इससे वैज्ञानिक समुदाय और गैर-सरकारी संगठन भड़क गए. विद्वानों, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने मनमोहन सिंह को गुस्से से भरा पत्र लिखा. प्रधानमंत्री के लिए परेशानी की बात यह थी कि इस पत्र पर पहले हस्ताक्षर सोनिया गांधी की पसंदीदा अरुणा रॉय के थे. 18 अप्रैल को आखिरकार प्रोफेसर को जमानत मिल गई.

वही पढ़ो, जो बताया है
14 मार्च को एक सरकारी आदेश में कहा गया कि राज्‍य के पैसे से चलने वाली 422 और राज्‍य के स्वामित्व वाले 2,060 पुस्तकालयों में सिर्फ चुनिंदा आठ अखबार खरीदे जाएंगे. इन आठ समाचार पत्रों में से 5 बंगाली हैं, एक हिंदी और दो उर्दू के हैं. तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दावा किया कि यह पुस्तकालय सेवा विभाग के निचले स्तर के किसी अधिकारी का फैसला था, लेकिन पुस्तकालय सेवा मंत्री अब्दुल करीम चौधरी ने मीडिया को बताया कि इस निर्देश को मुख्यमंत्री का आशीर्वाद प्राप्त है. बाद में ओ'ब्रायन ने ट्वीट किया कि इस सूची में एक अंग्रेजी अखबार भी शामिल किया गया है.

माकपा के सलीम चुटकी लेते हैं, ''ममता आपातकाल के दौरान राजनीति में आई थीं. आपातकाल के लिए इंदिरा गांधी ने माफी मांग ली, पर ममता ने कभी नहीं मांगी. उन्होंने सिर्फ इतना कहा है कि उसे गलत ढंग से लागू किया गया था. लिहाजा जो काम संजय गांधी, इंदिरा गांधी और विद्याचरण शुक्ल नहीं कर पाए, वह ममता बनर्जी करेंगी.''

इस कदम के पीछे असली कारण इस आदेश की इबारत में लिखा हुआ है, जिसमें कहा गया है कि जनता के पैसे को राजनैतिक प्रकाशनों पर खर्च नहीं किया जाना चाहिए. माकपा एक अखबार-गणशक्ति-निकालती है, जो ममता का फरमान आने से पहले तक राज्‍य के पुस्तकालयों में मिलता था.

लंदन से प्रेरणा
ममता कोलकाता को लंदन बनाना चाहती हैं. उन्होंने फैसला किया है कि सारे पुलों, बिजली के खंभों, सरकारी इमारतों और यहां तक कि टैक्सियों को भी शांति के रंग-स्काइ ब्लू-में रंगवा दिया जाए. कुछ अनुमानों के अनुसार, नीले रंग में रंगवाने की योजना को अमली जामा पहनाने के लिए राज्‍य को कथित तौर पर 80 करोड़ रु. खर्च करने होंगे, हालांकि जो नागरिक अपने घरों को नीले रंग में रंगवाएंगे, उन्हें टैक्स में कुछ छूट मिलेगी. तृणमूल कांग्रेस के एक नेता गर्व से कहते हैं, ''हर तरफ एक जैसा रंग होने से शहर में अफरातफरी का माहौल कम होगा.'' वाकई...

मार्क्स नहीं, म्यूजिक
चिड़चिड़े ड्राइवरों को शांत करने के लिए ट्रैफिक लाइट्स पर रवींद्र संगीत और पाठ्यपुस्तकों से मार्क्स और एंजेल्स पर प्रतिबंध-बंगाली आत्मा की तृप्ति के लिए ममता की हवन सामग्री है. ओ'ब्रायन का ट्वीट, ''मार्क्स को ऐतिहासिक कथा के तौर पर पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन गांधी और मंडेला की कीमत पर नहीं. बंगाल इतिहास से छेड़छाड़ नहीं, उसमें संतुलन बिठा रहा है.''

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