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सोशल मीडिया पर कैंची चलाने को उतारू कपिल सिब्बल

सोशल मीडिया को सेंसर करने के सरकारी फैसले की तह में सांप्रदयिकता नहीं बल्कि नामचीन हस्तियों की आलोचना है. ऑरकुट से कंटेंट हटाने के लिए किए गए 264 में से 236 'सरकार की आलोचना' से जुड़े थे.

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aajtak.in
भावना विज अरोड़ानई दिल्ली, 14 December 2011
सोशल मीडिया पर कैंची चलाने को उतारू कपिल सिब्बल कपिल सिब्बल

कपिल सिब्बल की सोशल मीडिया पर खुल्लम-खुल्ला सेंसरशिप के पक्ष में बार-बार दी जाने वाली सफाई को समझना ज्‍यादा मुश्किल नहीं है. तथ्यों से साफ है कि सरकार को इंटरनेट पर मौजूद सांप्रदायिक कंटेंट से कुछ खास परेशानी नहीं है क्योंकि वहां इस बारे में बहुत ज्‍यादा सामग्री उपलब्ध नहीं है.

सरकार की असली परेशानी इंटरनेट पर सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत सत्तारूढ़ दल की बड़ी हस्तियों की होने वाली छीछालेदर को लेकर है, क्योंकि ऐसी सामग्री से इंटरनेट पटा हुआ है.

आलोचना का पात्र बनने को अगर आधार मानें तो इतना तय है कि अपने इस ताजा कदम के बाद संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कांग्रेस के दोनों दिग्गजों को काफी पीछे छोड़ दिया है.

गूगल की ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट ने यह खुलासा किया है कि कंपनी को आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए सरकार से भेजे गए अनुरोधों में अधिकांश सरकार की आलोचना से जुड़े थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, गूगल को जनवरी 2011 से जून 2011 के बीच सरकार की ओर से 358 अनुरोध मिले. इनमें से अधिकांश यानी 264 अनुरोध गूगल की नेटवर्किंग साइट ऑरकुट पर उपलब्ध सामग्रियों के बारे में थे. इन 264 में से 236 मामले सरकार की आलोचना, 13 मामले नकली पहचान और दो मामले भड़काऊ भाषण से जुड़े थे.

गूगल रिपोर्ट का कहना है, ''हमें कानून लागू करने वाली एक स्थानीय सरकारी एजेंसी की ओर से ऑरकुट से जुड़ी उन 236 'कम्युनिटी' और 'प्रोफाइल' को हटाने का एक अनुरोध प्राप्त हुआ जो एक स्थानीय राजनेता की आलोचना में शामिल थे. हमने उस अनुरोध को मानने से इनकार कर दिया क्योंकि वहां मौजूद सामग्री न तो स्थानीय कानून का उल्लंघन कर रही थी और न ही हमारी 'कम्युनिटी मानकों' के खिलाफ थी.

यही नहीं, 'यू-ट्यूब' से जुड़ी 'आपत्तिजनक' सामग्री को हटाने के 48 अनुरोधों में से 19 सरकार की आलोचना, छह-छह मामले क्रमशः मानहानि और भड़काऊ भाषण से संबंधित थे.

गूगल ने उस राजनेता का नाम भले ही न बताया हो जिससे जुड़ी सामग्री को हटवाने पर सिब्बल आमादा थे, पर उसके बारे में अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं है.

नाराज सिब्बल ने उनसे मिलने आए इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों के प्रतिनिधियों को फव्सबुक का एक पेज दिखाया जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की आलोचना से संबंधित था.

सिब्बल ने भारत में फेसबुक, गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट की गतिविधियों के संचालन की जिमेदारी संभालने वाले अधिकारियों को पांच सितंबर को अपने दफ्तर बुलाया था.

यह वह समय था जब अण्णा हजारे का आंदोलन पूरे उफान पर था. सरकार को 'नाखुश' करने वाली इन कंपनियों में से एक के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ''कई अधिकारियों को मंत्री के दफ्तर के बाहर एक घंटा इंतजार कराया गया. और जब वे अंदर गए तो बैठने के लिए कहने के बजाए उन्हें सरकार विरोधी सामग्री के बारे में भाषण पिलाया गया.''

सिब्बल ने उन अधिकारियों को सोनिया गांधी विरोधी एक पेज दिखाते हुए कहा कि यह उन्हें कतई 'मंजूर' नहीं है. उन्होंने अधिकारियों को एक ऐसा तरीका निकालने को कहा जिससे किसी भी सामग्री को पोस्ट करने से पहले 'जांचा' जा सके.

सिब्बल यह चाहते थे कि इन कंपनियों के तकनीकी विशेषज्ञ सभी यूजर की ओर से जनरेट की जाने वाली सामाग्री पर निगरानी रखें और 'आपत्तिजनक' चीजें होने से पहले ही डिलीट कर दें.

अधिकारियों को 28 नवंबर को फिर आने का निर्देश देते हुए यह हिदायत दी गई कि वे अब की बार 'प्री-स्क्रीनिंग' की तकनीक के साथ हाजिर होंगे. कंपनियों ने ऐसा नहीं किया.

सिब्बल ने तब कंपनियों को एक सप्ताह की 'आखिरी मोहलत' देते हुए समाधान के साथ उपस्थित होने को कहा. एक सप्ताह बाद कंपनियों ने सिब्बल को सचाई कह दी कि जैसा वे चाहते हैं वैसा संभव नहीं है.

अधिक से अधिक वे यही कर सकते हैं कि अब तक चली आ रही 'शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने' की व्यवस्था को जारी रखें.

माइक्रोसॉफ्ट के एक आइटी एक्सपर्ट ने बताया, ''मानवीय एवं तकनीकी नजरिए से 'प्री-स्क्रीनिंग' नहीं हो सकती. ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे लाखों यूजर्स पर सीधी निगरानी रखी जा सके क्योंकि उनमें से कई एक ही समय में विभिन्न नेटवर्कों पर सक्रिय हो सकते हैं.''

इस समय भारत में ढाई करोड़ लोग फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं जबकि गूगल के उपभोक्ताओं की संख्या दस करोड़ है. एक तकनीकी विशेषज्ञ ने संचार मंत्री पर टिप्पणी करते हुए इंटरनेट पर लिखा, ''कोई सिब्बल को समझओ कि यह इमरजेंसी नहीं है और न ही वे परंपरागत मीडिया से मुखातिब हैं. यह इंटरनेट है और इसे संपादित नहीं किया जा सकता. यहां कोई संपादक नहीं है जिसे गिरफ्तार किया जा सकेगा.''

जिस सोशल नेटवर्किंग जगत को सिब्बल कंट्रोल करना चाहते हैं, वहां उनके इस प्रयास को लेकर काफी हलचल है. उनके इस फैसले की खबर के 24 घंटे के भीतर ट्विटर पर 'इडियट कपिल सिब्बल' नाम का टैग चस्पां हो गया. इस समय देश में ट्वीटर पर चल रहे दूसरे टॉप 10 टैग में 'कपिल सिब्बल' 'सेंसरशिप', 'फ्री स्पीच' और 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' शामिल हैं.

चूंकि सोशल नेटवर्किंग साइट्स के यूजर जनरेटेड कंटेंट पर नियंत्रण संभव नहीं है, लिहाजा अपने इस अपमान पर संचार मंत्री कुछ नहीं कर सकते. हालांकि, सिब्बल ने अपने कदम को सही ठहराने में कोई कसर नही छोड़ी.

उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उनका इरादा सेंसरशिप का था. उनका कहना है कि वे सिर्फ उन आपत्तिजनक और सांप्रदायिक सामग्री को नियंत्रित करना चाहते हैं जिससे तनाव और दंगा भड़कने का खतरा हो.

गूगल के एक प्रवक्ता का कहना है कि अगर कोई सामग्री गैरकानूनी होती है या उनकी सेवा शर्तों का उल्लंघन करती है, उसे वे डिलीट कर देते हैं. उनका यह भी कहना था कि उनकी कंपनी भविष्य में भी ऐसा करना जारी रखेगी.

प्रवक्ता ने बताया, ''हमारा मानना है कि एक स्वतंत्र समाज की बुनियाद के लिए सूचनाओं तक पहुंच जरूरी है.'' उनका यह भी कहना था कि वे यूजर्स की अभिव्यक्ति और मतभिन्नता के लिए प्रतिबद्ध हैं.

सरकारी तंत्र की यह शिकायत आम है कि सर्विस प्रोवाइडर सिर्फ अदालत के निर्देशों के बाद ही हरकत में आते हैं. समस्या यह है कि देश में मानहानि से संबंधित कानून कमजोर है. सूचना-तकनीक से जुडे़ कानून के तहत कार्रवाई में वक्त लगता है क्योंकि इस संबध में अदालतों के निर्णय देर से आते है.

सरकार का पक्ष रखते हुए एक अधिकारी ने कहा, ''सरकार के पास कंपनियों के साथ बात करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. हालांकि, कंपनियां सहयोग क्यों करें? जितनी सनसनीखेज सामग्री साइट्स पर होगी, उन्हें उतने अधिक हीट्स मिलेंगे.''

दूसरी ओर, कंपनियों का कहना है, ''भड़काऊ पोस्टों के लिए रिपोर्टिंग और ब्लॉक करने की व्यवस्था है.''

ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणी करने वालों को हमारे साइट पर ब्लॉक किया गया है. आतंकवाद से जुड़े मामलों को सुलझने के लिए सरकार ने हमसे कई बार संपर्क किया है. उनसे पूछिए कि क्या हमने एक बार भी सहयोग करने से इनकार किया है. जब कभी हमें उचित और तार्किक अनुरोध प्राप्त हुआ है, हमने हमेशा सहयोग किया हैं.''

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