एडवांस्ड सर्च

न्यायिक सक्रियता: सुप्रीम को सुप्रीम बनाने वाले

इस देश में न्याय के सर्वोच्च मंदिर में अपमानजनक भाषा के लिए आम तौर पर कोई स्थान नहीं है. लेकिन वहां से भी पिछले दिनों इस तरह की प्रतिक्रिया सुनने की मिली-''इस देश में आखिर हो क्या रहा है?'' घोटालों से त्रस्त इस देश में अगर लोगों का धैर्य अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है, तो उसके सर्वोच्च न्यायाधीशों का भी यही हाल हो गया लगता है.

Advertisement
aajtak.in
दमयंती दत्तानई दिल्‍ली, 19 May 2011
न्यायिक सक्रियता: सुप्रीम को सुप्रीम बनाने वाले सरोश होमी कापड़िया

इस देश में न्याय के सर्वोच्च मंदिर में अपमानजनक भाषा के लिए आम तौर पर कोई स्थान नहीं है. लेकिन वहां से भी पिछले दिनों इस तरह की प्रतिक्रिया सुनने की मिली-''इस देश में आखिर हो क्या रहा है?'' घोटालों से त्रस्त इस देश में अगर लोगों का धैर्य अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है, तो उसके सर्वोच्च न्यायाधीशों का भी यही हाल हो गया लगता है.

मार्च में एक सुबह न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी ने जब काले धन के मामले पर केंद्र की निष्क्रियता पर अपने गुस्से का इजहार उपरोक्त वाक्य में किया तो यह तुरंत देश भर की मीडिया में सुर्खियां बन गया. एक ही दिन में सरकार हरकत में आ गई. महीनों के कदमताल के बाद मुंबई के प्रवर्तन निदेशालय ने काले धन के सरगना हसन अली को, जिसने कथित रूप से विदेशी बैंकों में 8 अरब डॉलर जमा कर रखे हैं, जल्दी से समन भेज दिया.

भारत के मुख्य न्यायाधीश सरोश होमी कापड़िया की सर्वोच्च अदालत में, जहां काम करने वाले 28 पुरुष (और एक महिला) यह जानते हैं कि बेईमानी के प्रति देश की नई नापसंदगी का इस्तेमाल सही काम को अंजाम देने के लिए कैसे किया जाता है, में यह एक दिन का काम है.

कानूनविद् एन.आर. माधव मेनन इसे ''सजग सक्रियतावाद'' कहते हैं. वे कहते हैं, ''ऐसी व्यापक धारणा बन गई है कि शासन लुंज -पुंज हो गया है. अदालत परिवर्तन का अग्रदूत बन रही है. उसकी सक्रियता कानून से संचालित हो रही है. पिछले साल 12 मई को जबसे न्यायमूर्ति कापड़िया ने पद की शपथ ली है, तभी से यह बदलाव शुरू हुआ है.''

वकील कभी अदालत के ''अस्वस्थ माहौल'' की शिकायत करते थे, लेकिन पिछले एक साल से सचमुच की व्यस्तता के कारण काला चोगा लहराते हुए इधर-उधर भागते नजर आते हैं. वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे कहते हैं, ''यहां पूरी तरह बदलाव आया है. अगर ऊपरी पायदान पर ईमानदारी और साहस होगा तो नीचे तक भी इसका असर होगा.''

सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में अदालत के कमरे स्पष्टवक्ता जजों की टिप्पणियों से गूंजते रहते हैं. वे भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्भीक होकर बोलते हैं. अपनी साफगोई से वे जनता के ऐसे नायक बन गए हैं, जो बुराई के खिलाफ लगातार जंग का झंडा बुलंद किए हुए हैं. चाहे वे जस्टिस मार्कंडेय काटजू हों जिन्होंने इज्‍जत के नाम पर हत्या को सजा-ए-मौत के योग्य अपराध मानने का  फैसला सुनाया, या न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर की टिप्पणी हो कि ''भ्रष्टाचार एक रिवाज बन गया है'', या न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी की टिप्पणी हो कि 100 (फोन टैपिंग) खुलासा करते हैं कि देश को किस तरह से चलाया जा रहा है, या न्यायमूर्ति सुरिंदर निज्‍जर की टिप्पणी हो कि ''2008 से ये एंजेंसियां कहां सो रही थीं.

वे तभी हरकत में क्यों आईं जब हमने कदम उठाया?'', या फिर अयोध्या में विवादित रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन हिस्सों में बांटने के इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले पर न्यायमूर्ति  आफताब आलम की यह टिप्पणी हो कि यह एक ''विचित्र'' फैसला है. स्पष्ट है कि अदालतें शब्दबाण चलाने वाले दस्ते के समान बन गई हैं.

राजनैतिक विश्लेषक आशीष नंदी कहते हैं, ''भ्रष्टाचार शब्द सबकी जबान पर चढ़ चुका है, जो शहरी मध्यवर्ग को आंदोलित करता है.'' राजनीति में किसी करिश्माई नेता के अभाव में अदालत ही भरोसे का केंद्र बन गई है. आज न्यायपालिका संविधान का पालन उसी तरह करवा रही है, जिस तरह 60 और 70 के दशक में अमेरिका की न्यायपालिका ने किया था.

इसकी अगुआई न्यायमूर्ति कापड़िया कर रहे हैं. उनके कक्ष में एक सम्मानजनक सन्नाटा पसरा होता है. ऊंची छत, पॉलिश किए हुए पैनल और लकड़ी की ऊंची पीठिका आदर का भाव पैदा करती हैं. पूर्व न्यायाधीशों के चित्र अपने मौजूदा बंधुओं को जैसे घूरते मालूम होते हैं. मुख्य न्यायाधीश कापड़िया हथेली पर ठुड्डी टिका कर जब बहस सुन रहे होते हैं और टिप्पणी करते हैं तब उनके शब्दों को पकड़ने के लिए आपको अतिरिक्त ध्यान देना पड़ता है.

वे पूरी शिष्टता और विनम्रता से बहस के दौरान बातें नोट करते जाते हैं, सहमत होने पर हामी के अंदाज में सिर हिलाते हैं और जब कोई वकील ''औचित्यपूर्ण'' शब्द का इस्तेमाल करता है तो तारीफ में मुस्कराते हैं.

लेकिन उनकी धीर-गंभीर आवाज अचानक धमाके में तब्दील हो सकती है. ऐसा तब हुआ था  जब उन्होंने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर पी.जी. थॉमस की नियुक्ति को लेकर सरकार के साथ चार महीने की खींचतान के दौरान सवाल किया था.

पिछले नवंबर में मुख्य न्यायाधीश ने अपने गुस्से का इजहार करते हुए एक सीधा-सा सवाल दाग दिया, ''हमें ताज्‍जुब है कि क्या वे अपने ऊपर एक आरोपित का ठप्पा लगा कर सीवीसी के रूप में काम कर सकेंगे.'' यह टिप्पणी सरकार की ओर से एक के बाद एक विरोधाभासी जवाब देने के लिए काफी थी. कभी तो वह अवज्ञा (अदालत की न्यायिक समीक्षा के अधिकार पर सवाल) पर उतरी तो कभी उसने हिचकिचाहट के साथ कदम वापस खींचे.

3 मार्च को मुख्य न्यायाधीश ने देश के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री द्वारा की गई नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए थॉमस को आखिरकार बेदखल कर दिया. आखिर, मुख्य न्यायाधीश धारा के विपरीत तैरने से कभी डरे नहीं. 1999 में उन्होंने शेयर घोटाले में कव्तन पारेख के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी, तो 2006 में चारा घोटाले में लालू यादव के खिलाफ ऐसी ही नाराजगी दिखाई थी.

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव नया नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट जब राजनैतिक वर्ग में दखल देने लगता है, जांच एजेंसियों पर नजर रखने लगता है, प्रशासनिक विसंगतियों को उजागर करने लगता है और शासन के मुद्दों को उठाने लगता है तब कार्यपालिका के लिए खतरा बन जाता है. बैरिस्टर अहिन चौधरी कहते हैं, ''शायद उसने यह धारणा बना ली है कि सरकार कमजोर है.

और वह अपनी सीमाएं बढ़ा रहा है.'' मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर सकें, इसके पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहना शुरू कर दिया है कि अदालतों को ''नीति निर्धारण के दायरे में दखल नहीं देना चाहिए.'' उनकी टिप्पणी ठीक उस समय आई जब न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और दीपक वर्मा की पीठ ने गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने के मामले पर पिछले साल अगस्त में अपना फैसला सुनाया था. (अदालत ने कृषि मंत्रालय का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मोहन पारासरन से कहा था, ''अपने मंत्री को बता दें कि अनाज का मुफ्त वितरण फैसले का हिस्सा है''). लेकिन प्रधानमंत्री की टिप्पणी के कुछ ही घंटों के भीतर सुप्रीम कोर्ट ने अपना सुर नरम करते हुए कहा कि वह सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से संतुष्ट है.

लेकिन ईमानदारी चूंकि उनकी एकमात्र पूंजी है, इसलिए भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है जो मुख्य न्यायाधीश को सबसे ज्‍यादा व्यथित करता है (''मेरी एकमात्र पूंजी मेरी ईमानदारी है''). जब कभी भी भ्रष्टाचार पर कोई जनहित याचिका आती है, वे उसे स्वच्छ छवि वाले और योग्य जजों को सौंप देते हैं या उसे खुद ही अपने हाथ में ले लेते हैं.

वरिष्ठ वकील रंजन करंजावाला कहते हैं, ''आज आपके सामने ऐसी स्थिति है जहां मुख्य न्यायाधीश जनहित याचिका पर विचार करने वाले अकव्ले नहीं हैं. जनहित याचिका को एक से ज्‍यादा पीठों के दायरे में लाया गया है. इसीलिए जनहित याचिकाओं पर सुनवाई एक साथ अलग-अलग बेंचों में चल रही होती है. यह स्वागतयोग्य बदलाव है. मुख्य न्यायाधीश की अदालत की मुख्य विशेषता यह है कि आज अदालत का कद ऊंचा हो गया है और न्यायाधीश भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में मुख्य न्यायाधीश के पीछे एकजुट हैं.

सभी घोटालों की जननी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को देख रहे दोनों ही न्यायमूर्ति गणपत सिंह सिंघवी और अशोक कुमार गांगुली बुद्धिजीवी हैं. वे भी न्यायपालिका की सक्रियता के मंत्र को मानते हैं. न्यायमूर्ति गांगुली ने हाल ही में कहा, ''अदालतें शासन की संस्थाओं के तरह काम कर रही हैं, सिर्फ विवादित मामलों को निबटाने वाली मध्यस्थ नहीं हैं.'' इसी तरह जस्टिस सिंघवी ने अदालत में कहा, ''हमारे बाबू पूरी तरह ब्रिटिश परंपरा में प्रशिक्षित हैं. वे हमेशा अपने आकाओं की सेवा करते हैं.''

सुप्रीम कोर्ट ने शुरू से ही 2जी घोटाले की जांच को गति प्रदान की. 29 अक्तूबर, 2010 को इसने सीबीआइ को लापरवाही के साथ काम करने के लिए लताड़ा (''कितना लंबा समय आप लेंगे? क्या और 10 साल?''). और जब दागी दूरसंचार मंत्री ए. राजा पद पर बने रहे तो इसने सरकार की खिंचाई की. इसी के बाद सरकार हरकत में आई, दो हफ्ते के भीतर राजा को मजबूरन हटना पड़ा. एक हफ्ते बाद न्यायाधीशों ने प्रधानमंत्री की ''निष्क्रियता और चुप्पी'' पर सवाल उठाते हुए इतिहास रच दिया.

उन्होंने सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम के बचाव (उन्होंने जवाब दिया था कि प्रधानमंत्री निष्क्रिय नहीं हैं बल्कि मसले पर विचार कर रहे हैं जिसके चलते देरी हुई) की अनदेखी कर दी. अदालत ने मनमोहन सिंह से शपथपत्र की मांग की. यह भी पहली बार हुआ. विपक्ष ने संसद में व्यापक जांच की मांग की, तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने तुरंत सुब्रह्मण्यम की जगह अटॉर्नी जनरल जी.ई. वाहनवती को रख दिया.

इतना ही पर्याप्त नहीं था. 16 दिसंबर को अदालत ने दिलचस्प कदम उठाया. उसने सीबीआइ के कामकाज पर नजर रखने का फैसला करते हुए व्यापक जांच के तरीके पर सात सूत्री निर्देश दिए और अपील की कि वह इस ''षड्यंत्र के लाभार्थियों'', कॉर्पोरेट आकाओं, कारोबार के मालिकों, यहां तक कि सरकारी बैंकों और दूरसंचार की नियामक संस्था 'ट्राइ' की भी जांच करे.

2 फरवरी से सीबीआइ ने आरोपितों को गिरफ्तार करना शुरू किया. गिरफ्तार होने वालों में राजा, पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा, डायनामिक्स बलवा.ज (डीबी) के प्रबंध निदेशक शाहिद बलवा, उसके भाई आसिफ बलवा और दो अन्य शामिल थे. अदालत ने जांच में तेजी लाने के लिए अदालत की पसंद के एक विशेष सरकारी वकील (जो आम तौर पर सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं) के अधीन रोज सुनवाई करने वाली विशेष अदालत को जांच का काम देकर एक और नया चलन शुरू करने का फैसला किया. इस पर वाहनवती ने आपत्ति उठाई. लेकिन पीठ सहमत नहीं हुई.

'व्यवस्था को सुधारो'-यही जैसे सुप्रीम कोर्ट का मंत्र हो गया है. मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही दिन उस परंपरा को खत्म कर दिया जिसके तहत हर रोज सुबह मामलों का उल्लेख किया जाता था (पहले, गैर-सूचीबद्ध मामले, बिना उल्लेख वाले और बिना बारी के मामलों की सुनवाई के विवेकाधीन अधिकार का खुल कर इस्तेमाल होता था). इस झ्टके से अभी कई लोग उबरे भी नहीं थे कि तब एक और चोट पड़ गई जब उन्होंने घोषणा की, ''बेतुकी जनहित याचिकाओं'' पर जुर्माना किया जाएगा (ये याचिकाएं पूर्व मुख्य न्यायाधीश के नियंत्रण में थीं और दबाव बनाने वाले समूहों की ओर से उनकी बहुत मांग थी).

अब जजों की योग्यता और ईमानदारी के मुताबिक उन्हें मामले सौंपे जाते हैं. या ''कंप्यूटर द्वारा'', जैसा कि वकील बताते हैं, खासकर नियमित मामलों के लिए जो  बोझ बढ़ाने वाले होते हैं. बताया जाता है कि संविधान पीठ के मामलों में मुख्य न्यायाधीश अब भी निजी विवेक का इस्तेमाल करते हैं. पूरी तन्मयता से काम करने वाले मुख्य न्यायाधीश सबसे पहले आते हैं, सबसे बाद में जाते हैं. और, वे रोज के प्रशासनिक मुद्दों को भी देखते हैं.

तमाम अधिकारों से लैस होने के बावजूद चोटी के इन न्यायाधीशों का संसार रहस्य के आवरण में लिपटा है. न्यायमूर्ति कापड़िया ने कुछ कठोर नियम बनाए हैं. अदालत के अंदरूनी लोग बताते हैं कि ''एक मक्खी भी उनके करीब नहीं जा सकती.'' ये न्यायाधीश मीडिया में पहचाने जाने वाले शख्स नहीं हैं.

अदालत के कमरों में टीवी कैमरे और सेलफोन की इजाजत नहीं है. उनकी ज्‍यादातर बातचीत अदालत के कमरों (जहां वे बोलने से ज्‍यादा सुनते हैं) तक ही सीमित होती है. यहां तक कि कोर्ट में वे एक-दूसरे से लिखकर बात करते हैं.  हर सुबह ठीक 10.15 बजे वे जजों के लाउंज में चाय, कॉफी या शीतल पेय पर बैठक करते हैं. ठीक 10.27 बजे अलग हो जाते हैं. 10.30 बजे मुकदमों की सुनवाई का काम शुरू हो जाता है. बंद दरवाजे के अंदर की उनकी फुसफुसाहट सुनने के लिए वकील पूरा ध्यान लगा देते हैं. कहा जाता है कि  सुबह की बैठकें देश की न्यायिक किस्मत का फैसला करती हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay