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कृषि औषधीय खेती: महकने लगा घर संसार

सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती पर लोगों में पैदा हो रही है नई समझ. बिहार के शेखपुरा जिले के केवटी गांव के अभिनव वशिष्ठ ने फिलहाल 20 एकड़ में तुलसी की खेती कर रहे हैं, जिसका सालाना टर्नओवर 20 लाख रु. को पार कर गया है.

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aajtak.in
अशोक कुमार प्रियदर्शीपटना, 30 April 2012
कृषि औषधीय खेती: महकने लगा घर संसार अभिनव वशिष्ठ

उनकी उम्र 31 वर्ष है और वे एमबीए हैं. लेकिन वे बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करने के बजाए अपने पुस्तैनी खेत में सुंगधित पौधों की खेती कर रहे हैं. बिहार के शेखपुरा जिले के केवटी गांव के अभिनव वशिष्ठ ने आइएमटी-गाजियाबाद से एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के लिए आवेदन नहीं किया बल्कि पुश्तैनी जमीन को कॅरियर का आधार बनाया.

पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद 2005 में पांच एकड़ जमीन में करीब 3,00,000 रु. की पूंजी से सुगंधित पौधों की खेती की शुरुआत की. इसमें कामयाबी मिलने के बाद खेती का दायरा बढ़ाते गए, वे फिलहाल 20 एकड़ में तुलसी की खेती कर रहे हैं, जिसका सालाना टर्नओवर 20 लाख रु. को पार कर गया है.

अभिनव पंचानन हर्बल इंडस्ट्रीज के जरिए मार्केटिंग और कंसल्टेंसी का कार्य भी करते हैं. वे बिहार एरोमेटिक ऐंड मेडिसिनल प्लांट ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं, जिससे सैकड़ों किसान जुड़े हैं. अभिनव के प्रयासों को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और बिहार के राज्‍यपाल देवानंदुकुंवर भी सराह चुके हैं. अभिनव बताते हैं, ''एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए देहरादून जाने का मौका मिला था, यहीं सुगंधित पौधों की खेती के बारे में जानकारी मिली. रुचि जगी और पढ़ाई के बाद इसे कॅरियर के रूप में अपनाया.''

बदलते दौर के साथ विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग इस तरह की कृषि को अपना रहे हैं. बांका जिले के चिरैया गांव के होमियोपैथ चिकित्सक मदनलाल गुप्ता को ही लें. पांच साल पहले तक उनकी पहचान एक चिकित्सक के रूप में थी, लेकिन अब प्रगतिशील किसान कहे जाते हैं. वे फिलहाल किशनगंज जिले के झूलाबाड़ी गांव में लीज की 40 एकड़ जमीन पर लेमनग्रास, सिटरोला, तुलसी और खस की खेती कर रहे हैं.

डॉ. गुप्ता ने एक एकड़ जमीन से औषधीय खेती शुरू की थी, लेकिन मुनाफा देखते ही उन्होंने अगले साल चार एकड़ जमीन लीज पर लेकर खेती को आगे बढ़ाया. उनके बेहतर प्रयास के कारण 2007 में वे प्रखंड के सर्वश्रेष्ठ किसान चुने गए, जिन्हें राज्‍य सरकार ने किसानश्री का अवॉर्ड और 1,00,000 रु. का चेक दिया. एक समय 5,000 रु. मासिक आय वाले डॉ. गुप्ता की आमदनी अब 25,000 रु. प्रति माह हो गई है. डॉ. गुप्ता कहते हैं, ''सुगंधित पौधों से सलाना 3,00,000 रु. का 600 लीटर तेल का उत्पादन होता है. सरकार सुविधाएं दे तो खेती किसानों के लिए रोजगार का बढ़िया साधन हो सकती है.''

अब तक सुगंधित और औषधीय पौधों के तेल वाली दवाएं और सौंदर्य प्रसाधन के उपयोग से तन और मन स्वस्थ होने की बात से लोग वाकिफ थे. लेकिन लोगों के इस खेती की ओर रुख करने से आर्थिक सेहत सुधरने का भी यह एक बड़ा कारण साबित हो रही है. तभी पूर्णिया सिविल कोर्ट में वकील विक्रम लाल शाह ने भी वकालत से इतर खेती को अपनाया है.

शाह कहते हैं, ''तीन साल पहले एक मित्र ने औषधीय खेती की जानकारी दी थी. तभी 40,000 रु. की पूंजी से तीन एकड़ में लेमनग्रास की खेती शुरू की थी, लेकिन अधिक लाभ मिलने से 15 एकड़ में खेती का विस्तार किया, जिसे अगले साल से 20 एकड़ में करने की योजना है.''

यही नहीं, औषधीय खेती की आमदनी की महक से राजधानी पटना में रहने वाले लोग भी आकर्षित हो रहे हैं. पटना के 46 वर्षीय राजीव सिंह बिल्डर का काम करते थे लेकिन चार साल पहले उन्होंने भी इस खेती को अपना लिया. सिंह बताते हैं, ''पूर्व राष्ट्रीय डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जब बिहार दौरे पर आए थे, तब उन्होंने पालीगंज में औषधीय खेती की तारीफ की थी. तब इसे पांच एकड़ में शुरू किया गया था, अब यह दस एकड़ तक फैल चुकी है.''

बिहार एरोमेटिक ऐंड मेडिसनल प्लांट ग्रोअर्स एसोसिएशन के सचिव गिरेंद्र नारायण शर्मा कहते हैं, ''किसानों की आर्थिक तंगहाली व्यावसायिक किस्म की खेती से दूर हो सकती है. जागरूकता के अभाव में किसानों की बड़ी आबादी व्यावसायिक खेती और मार्केटिंग से अनभिज्ञ है.''

सरकारी स्तर पर समूह में तकनीकी आधारित खेती करने पर 20-75 फीसदी अनुदान की योजना है लेकिन बैंकों की जटिल प्रक्रिया के कारण इसका लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा. 2010-11 में 1,466 लाख रु. का प्रावधान किया गया था लेकिन नाममात्र राशि ही वितरित हुई, शेष राशि बची पड़ी है.

बहरहाल, नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन के जरिए औषधीय और सुगंधित खेती को बढ़ावा देने के लिए सभी 38 जिलों में कार्यक्रम तय हैं. शत-प्रतिशत अनुदान पर 10 नर्सरी भी स्थापित हैं. बिहार बागवानी मिशन के औषधीय पौधों के विशेषज्ञ डॉ. जे.के. हंडू ने बताया, ''आम तौर पर उत्पादन बढ़ने से मांग घटती है, लेकिन औषधीय और सुगंधित पौधों के उत्पादन बढ़ने के साथ मांग और कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं. दवा और हर्बल कंपनियां भी कृत्रिम के बजाए प्राकृतिक चीजों को अपनाने लगी हैं. जिसकी खपत देश और विदेशों में बड़े पैमाने पर है.'' बहरहाल, बदलाव की छोटी-सी शुरुआत हो चुकी है, और कुछ समय में बड़े नतीजे भी नजर आने लगेंगे. -

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