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किताबें/कहानी: संग्रह शहरी जटिलताओं के नैरेटिव

इस नए कहानी संग्रह के कई शेड्स हैं. वस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर इस संग्रह की कहानियों में आकर्षण के तत्व हैं. संवेदना के स्तर पर घर-परिवार के नितांत निजी पहलू, आदिवासी समाज की जटिल विडंबनात्मक नियति, स्वकीया-परकीया, बेरोजगारी-पलायन के जटिल समीकरण से लेकर अर्थ चिंतामुक्त समाज के रोमांटिक तनाव और वहां संबंधों की भंगुरता जैसे भिन्न-भिन्न परिदृश्य यहां मौजूद हैं.

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aajtak.in
राजीव कुमारनई दिल्‍ली, 28 January 2012
किताबें/कहानी: संग्रह शहरी जटिलताओं के नैरेटिव

पहर दोपहर, ठुमरी
प्रत्यक्षा
हार्पर हिंदी, हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स, ए-53, सेक्टर-57, नोएडा, उत्तर प्रदेश
कीमतः 150 रु.

प्रत्यक्षा: नैरेटर के दखल से
मुक्त कहानियां

इस  नए कहानी संग्रह के कई शेड्स हैं. वस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर इस संग्रह की कहानियों में आकर्षण के तत्व हैं. संवेदना के स्तर पर घर-परिवार के नितांत निजी पहलू, आदिवासी समाज की जटिल विडंबनात्मक नियति, स्वकीया-परकीया, बेरोजगारी-पलायन के जटिल समीकरण से लेकर अर्थ चिंतामुक्त समाज के रोमांटिक तनाव और वहां संबंधों की भंगुरता जैसे भिन्न-भिन्न परिदृश्य यहां मौजूद हैं. शिल्प के स्तर पर भी पर्याप्त प्रयोगात्मकता है.

कहीं पूरा नैरेशन उच्छवास-सा है तो कई बार मध्यम पुरुष वाली शैली. कुछ कहानियां कसकती स्मृति के अवसाद के कोहरे में लिपटी हैं, जहां निर्मल वर्मा और प्रियंवद-सा एंबियांस और इंप्रेशन है. प्रत्यक्षा की कहानियों में नैरेटर का प्रायः क्षीण हस्तक्षेप है, एक निर्लिप्त दूरी. यह आज के युवा स्वर से अलग दृष्टिकोण है. शायद बचकर राह तलाशने की ख्वाहिश.

इस संग्रह में आर्थिक दुश्चिंता से मुक्त, हाइ सोसाइटी की आवारा इच्छा से उपजे तनाव भरे संबंधगत द्वंद्व को पर्याप्त स्पेस मिला है. शीर्षक कहानी को ही लें. ख्वाहिशें सीमाहीन पर कमिटमेंट का एक कतरा भी नहीं. पूर्व पत्नी केतकी का नर्वस ब्रेकडाउन होने पर जय उसकी देखभाल करता है. जय, केतकी, पारो, नीश, सुजोय, नामहीन लातिन अमेरिकी के बनते-बिगड़ते संबंध हैं. मानो हर कोई अपने मानदंड और इच्छा की अंतहीन तलाश में भटक रहा है. हर किसी को जैसे थ्रिल की तलाश है. परणति? उकताहट.

पारो पूर्व प्रेमी के  बारे में टिप्पणी करती है, ''...वो मुझसे खुशी लेना जान गया था. देने को सीखने की उसने जरूरत कभी नहीं समझी.'' पारो की यह टिप्पणी कमोबेश सभी पर लागू होती है. कहानी में आत्मकेंद्रित, स्व-सुखदायी स्वतंत्रता की तलाश बहसतलब है. एक अन्य कहानी स्वप्न गीत में भी नैरेटर रोमांटिक तनाव में जीता हुआ एक के बाद एक संबंध में पड़ता और निकलता जाता है. अंत में बचता है खालीपन. अभिव्यक्ति के स्तर पर ये कहानियां विदेशी संदर्भों से अटी पड़ी हैं.

शाहरुख शाहरुख! कैसे हो शाहरुख एक अलग मि.जाज की कहानी है जो वंचित आदिवासी समुदाय की अंतहीन पीड़ा की नियति को बयान करती है. इसका घटना संदर्भ ग्राहम स्टेंस कांड है. इसके जरिए आदिवासी समाज की विडंबनात्मक नियति और भलाई का स्वांग करती मिशनरियों की प्राथमिकता को सामने लाया गया है. राफेल का सपना बड़ा आदमी बनकर जहालत भरी जिंदगी से निकलना है. इसके लिए वह फादर जॉर्ज का सहयोग चाहता है. पर उसका सपना हकीकत नहीं बन पाता.

''...लोग जान गए हैं कि मिशन में ड्राइवर और चौकीदार के आगे उनके लिए कुछ नहीं.'' प्रत्यक्षा की कहानियों में सामाजिक-पारिवारिक संबंधों के बहुरंगी, बहुस्तरीय आयाम हैं. ललमुनिया, हरमुनिया  मातृत्व के अनछुए आयाम को व्यक्त करती है. अपने दौर में विद्रोही रही रंजू बेटी की शादी के रिचुअल्स के  प्रति आग्रही हो जाती है. यहां आंतरिक स्तर पर अभिभावक की भावनाओं को समझ्ने का प्रयास है, जो संतान के लिए हर कुर्बानी को तैयार रहते हैं. केंचुल पिता-पुत्री-मां के संबंध की कहानी है. कहानी में लड़की की भावनात्मकता के साथ रैशनलिटी भी है और वह पिता और प्रेमी की सलाह के बावजूद मां के बरक्स आहत पिता के साथ खड़ी होती है.

मेटिंग रिचुअल्स, पांच उंगलियां पांच प्यार और बलमवा तुम क्या जानो प्रीत प्रेम और स्त्री पुरुष संबंधों के अलग-अलग रूपों को अभिव्यक्त करने के साथ ही स्त्री पीड़ा के अलग-अलग आयाम को व्यक्त करती हैं. मेटिंग रिचुअल्स कुछ प्रह्‌सनपूर्ण अतिरंजित प्रसंगों के बावजूद द्रवित कर देने वाली कहानी है, जिसमें सौंदर्य के जड़ मानदंड वाले समाज में एक सामान्य स्त्री कुंठा और चिड़चिड़ेपन को अभिशप्त होती है. बलमवा तुम क्या जानो प्रीत प्रेम के तर्कातीत स्वरूप को सामने लाती है. मुन्नी बेगम तमाम नवाबी लालच को छोड़ प्रेमी के साथ भागती है. दूसरी ओर उसकी सहचरी लौंगलती है, जो मुन्नी के साथ ही नहीं निबाहती, उसके  बाद उसके प्रेमी से भी ताउम्र निबटती है.

कूचा-ए-नीमकश इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है, जो पारिवारिक प्रेम, परकीय चाहत, स्वीकार-अस्वीकार, हुनर, तकनीक, बेरोजगारी, उदासी, पलायन के जटिल और परस्पर उलझे ताने-बाने को सूक्ष्मता के  साथ अभिव्यक्त करती है. नाजिम खुद के बनाए कैमरे से लोगों की तस्वीर उतारता है.

पत्नी फर्रूखजाद की खालाजाद बहन हुमरा से उसका राग-विराग है. रंजिश से भरी हुमरा शहर घूमने आए परदेशी से संबंध गांठ लेती है और परदेशी का फोटो स्टुडियो खुलवा देती है. नाजिम बेरोजगारी-बोरियत से तंग आकर पलायन कर जाता है. संबंधों की जटिलता का बखूबी निर्वाह करती बेहतरीन कहानी है यह.

वैसे तो प्रायः हर कहानीकार वस्तु के स्तर पर विविधता का प्रयास करता ही है. पर वस्तु का निर्वाह करते हुए अभिव्यक्ति का एक खास ढब विकसित करना प्रत्यक्षा की विशिष्टता है. संवेदना के धरातल पर वे जटिलता और सूक्ष्मता को बखूबी नैरेट कर पाती हैं. कुछेक कहानियों में कार्य व्यापार इतना क्षीण है कि सिर्फ थीम की मौजूदगी भर का एहसास होता है. ऐसी जगहों पर संप्रेषण अस्पष्ट है. बावजूद इसके यह स्वागत योग्य संग्रह है.

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