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स्वतंत्रता के गीत

सच्ची देशभक्ति को सभी तरह का उत्पीडऩ समाप्त करना चाहिए और इसे मानवता से जुड़ा होना चाहिए, न कि किसी राष्ट्र-राज्य से

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टी.एम. कृष्णानई दिल्ली, 12 August 2019
स्वतंत्रता के गीत इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास

मैं यह सब ऐसे दिन लिखने की कोशिश कर रहा हूं जब भारत के नागरिक के रूप में मैं जिन बातों पर विश्वास करता था, उनमें से बहुत-सी छीन ली गई हैं. मैं सोचता था कि संविधान ऐसी चीज है जो हमें संस्कृति प्रदान करती है, हमारे अतीत को दर्ज करती है और हर मोड़ पर हमारे वर्तमान को नई कल्पना से परिभाषित करती है. लेकिन 5 अगस्त को विविध संस्कृतियों, विचारों और आवाजों का सम्मान करने की हमारे संविधान में निहित परंपरा को टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया.

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने हमें मानवता, निष्पक्षता और जीवन जीने की नैतिकता प्रदान की थी. लेकिन मुझे डर है कि हम उस शृंखला का पहला चरण देख रहे हैं जो कई वर्ष पहले इस पवित्र पुस्तक में सन्निहित किए गए भारत के सपनों को समाप्त कर देगी. हमारा अतीत निर्दोष नहीं रहा है और महत्वपूर्ण अवसरों पर बहुत से लोगों ने इस बारे में बार-बार अपनी आवाज उठाई है. लेकिन हम जो अब देख रहे हैं, वह बहुत ही अलग तरह की राजनीति है—जैसे भयावह आवाज वाला कोई सायरन जिसने संगीत की झलक को भी पूरी तरह से खत्म कर दिया हो. संस्कृति पर कब्जा कर लिया गया है और देशभक्ति को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है. 5 अगस्त, 2019 को ऐसे दिन के रूप में याद किया जाएगा, जब एक देश के रूप में हमने शेष भारत के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित करने के लिए कश्मीरियों के अधिकारों को पैरों तले रौंद दिया.

हमने अपना वादा तोड़ते हुए रात के अंधेरे में एक इलाके को खामोश करने के लिए सारी मशीनरी तैनात कर दी. अगर यही भारतीय संस्कृति है, तो मैं इसे अभी और हमेशा के लिए नकारता हूं. अगर इसकी सराहना करने पर ही मुझे देशभक्त माना जाना हो, तो शायद मैं देशभक्त नहीं हूं. हालांकि, बहुत से लोगों की निगाह में यह देशभक्ति का काम और बहादुरी भरा निर्णय है जिससे देश एकजुट होगा, एक गलती सुधरेगी और हमें साथ खड़े होने का मौका मिलेगा. पर देशभक्ति है क्या?

पिछले पांच साल से ज्यादा समय से यह जरूरत महसूस होती रही है कि देशभक्ति और उग्र राष्ट्रवाद के बीच अंतर किया जाए. लेकिन हमारे रास्ते में हर दिन फेंकी जा रही बकवास के बीच क्या हम इस बारे में सचमुच कुछ जानते हैं या इस भावना को गंभीरता से जानने की इच्छा रखते हैं? 

कुछ साल पहले की बात है जब मैं एक गायन प्रस्तुति के लिए ग्रीन रूम में बैठा तैयारी कर रहा था कि आयोजक ने मुझे बताया कि प्रेक्षागृह राज्य सरकार के स्वामित्व में है, इसलिए वे कार्यक्रम शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाने पर जोर दे रहे हैं. हालांकि यह कोई सरकारी समारोह नहीं था. इस पर मैंने राष्ट्रगान समाप्त होने से पहले ग्रीन रूम छोडऩे या स्टेज पर आने से मना कर दिया. क्या मैं राष्ट्रगान में भाग न लेने के कारण देशद्रोही था? यह राष्ट्रगान अपने आप में है क्या? पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने अक्सर हमारे राष्ट्रगान में मन शब्द की बात की है. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर इसका प्रयोग आशा के अर्थ में करते थे. यह शब्द जो हमारी सहज निष्कपटता का प्रतीक है.

हमारी निष्पाप देसजता नहीं, बल्कि निर्लोभी आत्म की निश्छलता—जैसे किसी पत्ते पर पड़ी ओस की चमक. वे हर भारतीय में निश्छलता की इस संभावना का उत्सव मनाते थे और ऐसा देश के होने की उम्मीद करते थे जहां के लोग हथेली में ओस की बूंदें समेटे उसके सौंदर्य पर रीझ सकेंगे. लेकिन जब यह कलात्मक कार्य, राष्ट्रगान, हम पर निष्ठा के गीत के रूप में थोपा जाता है तो यही सुंदर गीत अधिनायकवादी शासन की तुरही में बदल जाता है. मैं यह भी कहूंगा कि किसी संगीत परंपरा के उत्सव से पहले इसका गायन-वादन सौंदर्यशास्त्रीय रूप से विकृत संस्कृति, कला, माधुर्य, लय और सौंदर्यानुभव के अभाव का प्रतीक है.

यदि हम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गाए गए गीतों को सुनें, प्रत्येक सुनाई गई कविता को सुनें, प्रकाशित गद्य को पढ़ें और गुनगुनाई गई धुनों को सुनें तो हमें पता चलेगा कि उनमें कैसे न्याय, और समानता, निष्पक्षता, लोकतंत्र, अधिकार तथा स्वतंत्रता की बातें की गई थीं. हमने शरीर और मन की मुक्ति चाही थी. अंग्रेज स्पष्ट उत्पीड़क थे, लेकिन इन गीतों, कविताओं और गद्य के शब्द केवल उनकी दुष्टता को इंगित करने तक सीमित नहीं थे. उन गीतों और कविताओं में अपने भीतर के लोगों से स्वतंत्रता का चीत्कार भी था, उनमें आत्मावलोकन की अपील थी और हमारे लिए सामाजिक उनींदेपन से उठने का आह्वान था.

सुब्रह्मण्यम भारती जब पूछते हैं कि 'हमारी आजादी की प्यास कब बुझेगी? दासता से हमारा मोह कब खत्म होगा?' तो वे ब्रिटिश शासनकाल की बात करते हुए भी अपने समय से आगे की बात कर होते हैं और मानवीय स्थितियों पर सवाल उठा रहे होते हैं. वे कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति के लिए बोल रहे होते हैं और अधिकारसंपन्न लोगों से स्थितियों में बदलाव की मांग कर रहे होते हैं. भारती रहे हों या द्विजेंद्रलाल रॉय, वे लोगों की बात करते थे, लोगों से बात करते थे और लोगों के लिए बात करते थे. हमने अंग्रेजों से कठोर संघर्ष इसलिए नहीं किया कि वे बाहरी थे, बल्कि इसलिए किया कि वे अन्यायी थे. अपने सार रूप में देशभक्ति किसी तरह की आज्ञाकारिता या निष्ठा की अभिव्यक्ति नहीं है; यह प्रश्नों और स्वेच्छा का उत्सव है. जब डी. के. पट्टाअम्मल देशभक्ति के भाव से ओतप्रोत होकर गाती थीं तो वे भारतीयों से अपेक्षा करती थीं कि वे निडर होकर अपनी बात करेंगे और दूसरों की मदद के लिए खड़े होंगे. उन गीतों के शब्दों और धुनों के भीतर हर व्यक्ति के अधिकार संरक्षित थे.

देशभक्ति के गीत सत्ता पर कब्जा करने के लिए नहीं बनाए गए थे; वे खुद को सशक्त बनाने, मानवाधिकारों को मजबूत करने और लोगों को डराने या कमजोर करने वाली सत्ता को चुनौती देने के लिए गाए गए थे. देशभक्ति विध्वंसक है—सामंती चेतना की, गैर-जिम्मेदार और सत्ता के भूखे लोगों की और तानाशाहों की. यह राज्य की सेवक नहीं है और इसीलिए हर समय उच्चतम मानवीय गुणों को बनाए रखने वाली होनी चाहिए. कोई देश तभी जीवित रहता है जब वह देशभक्तों की बात सुने और उनसे सीखे.

देशभक्ति बहुसंख्यकों की ओर से लादी गई बात नहीं है; यह सभी का ध्यान रखने वाला गीत है, खास कर उनका जिनके गीत सुने नहीं गए. राष्ट्र-राज्य का देशभक्ति से बहुत कम लेना-देना था और है. जब पूरा देश एक साथ आत्मनिर्णय के लिए उठ खड़ा हुआ तो लोगों को पता था कि इसका कारण मानवीय है न कि भारतीय. लेकिन सभी आदर्शों की तरह, यह भी जल्द ही समुदाय और धर्म में खो गया. देशभक्ति जैसे ही नि:स्वार्थ प्रकृति छोड़ती है, उग्र राष्ट्रवाद में बदल जाती है और तब वह सत्ता की पक्षधर होकर दूसरों को, खासकर कमजोर लोगों को अपराधी बनाने में लग जाती है.

उस रेखा के बारे में क्या बात करें जिसे हम अपनी सीमा कहते हैं, जो हमारी संप्रभुता निर्धारित करती है? क्या देशभक्ति उस राजनैतिक रेखा की वंदना करते हुए पहाड़ों, नदियों, समुद्रों और जंगलों में होकर गुजरते उसके जटिल आकार की रक्षा में नहीं लगी है? 2010 में, श्रीलंका में गृहयुद्ध समाप्त होने के ठीक बाद, मैंने तमिल वकील, नेता और शैक्षाविद् नीलन तिरुचेल्वम की याद में कोलंबो में एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था. तिरुचेल्वम की हत्या लिट्टे ने की थी. वे एक देशभक्त थे, जो मृत्यु तक संवाद और सुलह की प्रक्रिया के लिए लड़ते रहे और हर पक्ष की बात सुनते रहे. उस प्रस्तुति के लिए, मैंने एक तमिल कवि तारा भारती का लिखा एक गीत चुना था. कवि अपने गीत में पूछता है:

क्या किसी देश ने चुराई है कोई नदी क्योंकि वह बहती है सीमा के पार तक?

क्या कोई बांध सका है हवा को क्योंकि वह पार कर जाती है बाड़?

क्या दीवारें रोक सकी हैं बादल को, जो ऊपर शहरों में बरसे और उतर कर चले गए नीचे?

क्या हम सीमा पर उगे पेड़ पर लगाते हैं अतिक्रमण का आरोप और काट देते उसकी जड़ें

कि वह पड़ोसी देश से ले रहा है पानी?

गीत के अंत में कवि लोगों से साझेदारी की भावना पैदा करने के लिए कहता है. देशभक्ति इस स्वतंत्रता से अंकुरित होती है, मानवीय मूल्यों की साझेदारी से. एक जुड़ाव जो बड़े राजनैतिक निर्माण के रूप में फैल जाता है जिसे हम देश कहते हैं लेकिन जिसे बाधाओं या रुकावटों से नहीं रोका जा सकता. जिन रेखाओं को हम मानचित्र पर खींचते हैं, वे केवल एक समूह के लोगों के एक साथ होने का संकेत भर हैं. यह किसी बाहरी व्यक्ति की स्थिति को चिन्हित नहीं करता.

इसलिए, देशभक्ति को जमीन हासिल करने या उसे सुरक्षित रखने के रियल एस्टेट जैसे व्यवसाय में नहीं बदला जा सकता और न ही इसका संबंध अंतरराष्ट्रीय समझौतों से जोड़ा जा सकता है. देशभक्ति न तो राष्ट्र के विचार से बंधी रह सकती है और न उसे बंधना चाहिए. राष्ट्र को देशभक्तों की जरूरत है, न कि देशभक्तों को राष्ट्र की. देशभक्तों में साहस होना चाहिए कि यही सत्य हो तो वे अपने देश को भी अत्याचारी कह सकें. देशभक्ति सिर्फ न्याय का पक्ष लेती है, राष्ट्र-राज्य का नहीं.

पौराणिक कथाएं और इतिहास भी कई बार देशभक्ति के पतन में योगदान करते हैं. कोई भी लोकतांत्रिक देश निर्वात से अस्तित्व में नहीं आया है और इसका मतलब है कि वह उन सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक प्रथाओं, भव्यताओं और भयों को भी दर्शाता है जो उसके लोकतंत्र के रूप में विकसित होने के पहले से मौजूद रहे हैं. बच्चों के सोने के समय सुनाई जाने वाली कहानियों और लोरियों में वे गहरे पहचान चिन्ह टंके होते हैं जो आगे चल कर भेदभाव के औजारों में बदल जाते हैं. जब लोगों को हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी कहा जाता है, तो ये आरोप लगाने वाला एक झटके में दूसरे की सामाजिक-धार्मिक पहचान और राष्ट्र-राज्य के प्रति समर्पण को नष्ट कर रहा होता है.

इस गंभीर प्रहार से वह अतीत की टूटन को फिर से सामने ला खड़ा करता है और हमारी भारतीयता को विशिष्ट रंगों, प्रतीकों और अनुष्ठानों में सीमित कर देता है. जब ऐसा होता है, तो जुड़ाव का सुंदर गीत भी हिंसक बन जाता है. एडोल्फ हिटलर के दौर में जब जर्मन वर्चस्ववादी धूमधाम से जर्मन राष्ट्रगान को प्रस्तुत करते थे तो वे एक देशभक्तिहीन, असांगीतिक और अमानवीय कृत्य होता था. ऐसे मौकों पर देशभक्ति अपना नि:स्वार्थ भाव छोड़ कर झंडा लहराने और राष्ट्रगान गाने की औपचारिकता में रूपांतरित होकर रह जाती है.

कोई देशभक्त संस्कृति, धर्म और सामाजिक प्रथाओं के सभी अलोकतांत्रिक तत्वों को चुनौती देता है. कोई भी संत, बुजुर्ग, लेखक, चित्रकार, मूर्तिकार, दार्शनिक या गायक सवालों के दायरे से परे नहीं है. ईश्वरीय कथन को भी प्रश्नों से छूट नहीं है और न ही किसी नास्तिक या पूर्ण तर्कवादी को. देशभक्त एक कलाकार, एक नागरिक, एक संवेदनशील इनसान होता है जिसे लोगों और उन सब बातों की परवाह होती है जिन्हें हम इस ग्रह की थाती के रूप में संजोते हैं.

टी.एम. कृष्णा गायक और लेखक हैं

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