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इंडिया टुड कॉन्क्लेव-फायदे में एनडीए

योगेंद्र यादव का मानना है कि अगर चुनाव कृषि और रोजगार जैसे बुनियादी मसलों पर होता है तो यकीनन हवा भाजपा के खिलाफ है. सी-वोटर के यशवंत देशमुख 2019 के लोकसभा चुनाव को 'अति, अति सामान्य' बताते हैं. एक्सिस माइ इंडिया के प्रदीप गुप्ता का कहना था कि सत्ता-विरोधी लहर एक खास तबके तक सीमित है और बड़े असंतोष जैसी कोई बात नहीं है.

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 14 March 2019
इंडिया टुड कॉन्क्लेव-फायदे में एनडीए (बाएं से) सत्र के मॉडरेटर शिव अरूर के साथ फली मेजर, हुड्डा, फैसल और मेनन

'कौन जीत रहा है 2019 की जंग?'

प्रदीप गुप्ता सेफोलॉजिस्ट, एक्सिस माइ इंडिया, प्रवीण चक्रवर्ती, डाटा एनालिटिक्स चीफ, कांग्रेस संदीप शास्त्री, सेफोलॉजिस्ट, लोकनीति सीएसडीएस वी.के.बजाज सेफोलॉजिस्ट, टुडेज चाणक्य, यशवंत देशमुख, सेफोलॉजिस्ट, सी-वोटर, योगेंद्र यादव सेफोलॉजिस्ट-नेता, राहुल वर्मा सेफोलॉजिस्ट

फायदे में एनडीए

भारत के चुनाव पंडित भारतीय चुनावों के बारे में पहले भी उतने ही गलत रहे हैं जितना कि मौसम के बारे में भारतीय मौसम विभाग. चुनाव के ऐन पहले देश के प्रमुख चुनाव विश्लेषक फिर से जोड़-बाकी में लग गए हैं. इनमें से ज्यादातर एनडीए की आसान जीत की संभावना जाहिर कर रहे हैं. पाकिस्तान में हवाई हमले से यकीनन एनडीए का गणित और मजबूत होगा, वहीं चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने तो मोदी सरकार पर युद्ध का इस्तेमाल चुनाव जीतने के हथियार के रूप में करने का आरोप लगाया है.

यादव का मानना है कि अगर चुनाव कृषि और रोजगार जैसे बुनियादी मसलों पर होता है तो यकीनन हवा भाजपा के खिलाफ है. सी-वोटर के यशवंत देशमुख 2019 के लोकसभा चुनाव को 'अति, अति सामान्य' बताते हैं. एक्सिस माइ इंडिया के प्रदीप गुप्ता का कहना था कि सत्ता-विरोधी लहर एक खास तबके तक सीमित है और बड़े असंतोष जैसी कोई बात नहीं है.

खास बातें

पुलवामा में आतंकवादी हमले और उसके बाद पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी हवाई हमले से चुनाव का पलड़ा एनडीए के पक्ष में झुक सकता है. कुछ विश्लेषकों ने तो 2014 जैसे नतीजे दोहराए जाने की बात कही है.

अगर सरकार को अर्थव्यवस्था, नौकरियों और ग्रामीण बदहाली जैसे मुद्दों पर आंका गया तो भाजपा को कम से कम सौ सीटें गंवानी पड़ सकती हैं.

भाजपा पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में जगह बना रही है. इन राज्यों में उसके वोट प्रतिशत में इजाफा बाकी राज्यों में आने वाली गिरावट की भरपाई कर सकता है.

हर राज्य अलग तरीके से वोट डालता है. हालांकि राष्ट्रीय नेतृत्व का खासा असर होता है. पर आंकड़े कहते हैं कि राज्य और स्थानीय स्तर का नेतृत्व भी लोकसभा चुनावों में उतना ही अहम.

इसमें शक नहीं कि दिल्ली की गद्दी की रास्ता अब भी उत्रर प्रदेश होकर गुजरता है, जहां भाजपा को सपा और बसपा के बीच तगड़े गठबंधन का सामना करना पड़ेगा, वहीं प्रियंका वाड्रा के रूप में कांग्रेस भी खास भूमिका निभाएगी.

वी.के. बजाज

''हमें अब यह देखना है कि पुलवामा की भावनाओं ने जो जोर पकड़ा है, वह अगले 40-50 दिनों में मतदान के समय तक कितना कायम रहता है.''

संदीप शास्त्री

''पिछले दो हक्रते के घटनाक्रम ने सत्तारूढ़ पार्टी को थोड़ी उछाल दे दी है, शायद हिंदी पट्टी में, लेकिन

बाकी राज्यों में नहीं.''

प्रवीण चक्रवर्ती

''यह दावा करना निराधार है कि कांग्रेस खुद को ऊंचा आंककर गठबंधन नहीं कर रही है. दरअसल, 2014 के बाद से कांग्रेस को ही ज्यादा नए सहयोगी मिले हैं—टीडीपी, जेडी (एस).''

राहुल वर्मा

''छोटे क्षेत्रीय दलों को इस समय

बहुत कम आंका जा रहा है, खेल खत्म होने के बाद ही हमें पता चलेगा कि कौन जीतता है.''

यशवंत देशमुख

''यह एक सामान्य किस्म का ही चुनाव रहने वाला है. 2004 और 2014 के दो पेंडुलम स्विंग के बीच 2009 में एक सामान्य चुनाव भी था.''

योगेंद्र यादव

''हम युद्ध को चुनाव जीतने के लिए बतौर हथियार इस्तेमाल करने की घटिया कोशिशों में से एक देख रहे हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनैतिक खेल के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.''

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