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खेल के मैदान में हिंदुस्तान

1983 की विश्व कप की जीत के फौरन बाद के वर्षों में हिंदुस्तान की श्रेष्ठता खिली और कुम्हलाई, धुंधली पड़ी और चमकी, मगर जीत के उल्लास का यह चीखता-चिल्लाता, नीली शर्ट फाड़ता जज्बा अगले 30 वर्षों तक डिगा नहीं.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 14 August 2019
खेल के मैदान में हिंदुस्तान 72 वर्ष आजादी के

देश में सच्ची देशभक्ति और खेल की सच्ची दौलत तभी अपनी ऊंचाई पर पहुंचेगी जब खिलाड़ी रसूखदारों और सियासी नेताओं की जी-हुजूरी बंद कर देंगे

हिंदुस्तान का क्रिकेट और उसके समर्थक उस सफर के बारे में बहुत कुछ बताते हैं जो हमने एक समाज के तौर बीते सौ वर्षों में तय किया है. क्रिकेट पर रामचंद्र गुहा और प्रशांत किदांबी की किताब हमें बताती है कि 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में बंटवारे से पहले देश के विभिन्न शहरी और मुफस्सिल इलाकों में क्रिकेट जहां-तहां खेला जाता था. शुरुआती भारतीय क्लब बॉम्बे, कराची, मद्रास और कलकत्ता में बनाए गए थे और वे अपने ऊबडख़ाबड़ मैदानों पर आपस में खेला करते थे. वहीं साहेब लोग अपने हरे-भरे मैदानों में खेलते थे.

देश के विभिन्न राजनैतिक समूहों ने जिस वक्त साम्राज्य की निर्विवाद सत्ता को ललकारना शुरू किया, उन्हीं दिनों हिंदुस्तान की टीमें कभी-कभार गोरों के खिलाफ भी खेलने लगीं. शुरुआत में हिंदुस्तानी टीमें आम तौर पर हार जाती थीं, पर धीरे-धीरे नतीजों के बारे में पहले से बताना उतना आसान नहीं रह गया. इन मैचों में स्थानीय जनता की चीखती-चिल्लाती भीड़ होती जो अपनी देसी टीमों का समर्थन करती. जीत का मतलब उपद्रवी जश्न हो सकता था. जाहिर है, यह खेल भावनाओं को हवा देता था.

राष्ट्रीय टीम का विचार भी आजादी के आंदोलन के आसपास सामने आया. फर्क यह था कि शहरी और ग्रामीण हिंदुस्तान के गरीबों के साथ जुडऩे की खातिर गांधी और कांग्रेस अपने मध्यमवर्गीय घेरों से बाहर आ गए, पर हिंदुस्तान का संगठित क्रिकेट अगुआई के लिए महाराजाओं और नवाबों की ओर ताकता रहा. हैरानी नहीं कि देश की सियासत के मुद्दे रिस-रिसकर खेल में आते रहे. क्या हिंदू, मुसलमान, सिख, पारसी और ईसाई एक ही टीम में खेल सकते थे? ऊंची जाति और तबकों के बोझ से दबी टीम तब क्या करती जब दलित होनहार खिलाड़ी खुद को टीम से बाहर रखना नामुमिकन बना देता? टीम एक साथ सफर करती? क्या वे साथ बैठकर खाना खाते? क्या वे केवल खेल के मैदान पर ही साथ आते?

दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होते-होते, उपमहाद्वीप में वाकई होनहार खिलाडिय़ों की अच्छी-खासी संख्या थी. सही तरीके से चुने 11 खिलाड़ी दुनिया की किसी भी टीम को चुनौती दे सकते थे. एक मशहूर खिलाड़ी की पार्टनर ने एक बार कहा कि अंग्रेजों ने हिंदुस्तान का बंटवारा मुख्य रूप से इस वजह से किया क्योंकि ''संयुक्त भारत की टीम विश्व क्रिकेट में तमाम बड़े मुकाबलों का खात्मा कर देती.'' क्रिकेट को भी बंटवारे ने तहस-नहस कर दिया था, खासकर उपमहाद्वीप के उत्तर और पश्चिम में. लोग अब भी कहते हैं कि होनहार बल्लेबाज बड़ी तादाद में हिंदुस्तान में रह गए जबकि तकरीबन पूरा का पूरा पैस अटैक पश्चिमी पाकिस्तान में चला गया. यह भले ही खालिस सरलीकरण हो, हकीकत यही थी कि बंटवारे ने चीजों को हिंदुस्तान और दो पाकिस्तान के बीच गैर-बराबर बांट दिया.

जिस तरह देशभक्ति की धारणाओं को फिर से फेंटना पड़ा, उसी तरह हिंदुस्तानी टीम का समर्थक होने का मतलब 1947 के बाद में वही नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था. आजादी के बाद शुरुआती 20 वर्षों में हमें जो बहुत-से अपमान और सम्मानजनक ड्रॉ झेलने पड़े. क्रिकेट के ये मुरीद 1950 और 1960 के दशक में बड़े हुए थे, और तो भी हमारे भीतर के देशभक्त क्रिकेट प्रेमी ने कभी हार नहीं मानी. भारतीय क्रिकेट ने दो ऊंची छलांग लगाईं, एक 1970 के दशक की शुरुआत में और दूसरी ठीक उस दशक के खत्म होने पर.

1970-71 में पहले वेस्ट इंडीज में और फिर इंग्लैंड में सीरीज जीतने से हिंदुस्तानी मुरीदों की उम्मीद परवान चढऩे लगी. वर्ष 1983 के मायने बहुत अलग थे—हम इस फॉर्मेट में भी जीत गए, वही फॉर्मेट जो अभी तक धीमी रफ्तार से रन बनाने वाले हमारे बल्लेबाजों, टेस्ट के लिए तैयार गेंदबाजों और सुस्त फील्डरों को ललकार रहा था. विश्व कप में हम हर देश से बेहतर साबित हुए. उस विश्व कप में जीत के फौरन बाद के वर्षों में हमारी यह श्रेष्ठता खिली और कुम्हलाई, पर जीत के उल्लास का यह चीखता-चिल्लाता, नीली शर्ट फाड़ता जज्बा अगले 30 वर्षों तक डिगा नहीं.

हाल में चीजें बदल गई हैं. हिंदुस्तानी टीम छिपे रुस्तम से दबंग बन गई, पर यह जीत का उल्लास वाकई किसी भद्दी चीज में बदल गया है. यह तब्दीली 2001 और 2011 के बीच अपने आखिर दौर में पहुंची और इसका वास्ता दूसरी चीजों के अलावा हमारे बेहतर खेल, हिंदुस्तानी टीवी दर्शकों में जबरदस्त बढ़ोतरी और आइपीएल के विशाल खेल उद्योग में बदलने से है.

इस आर्थिक ताकत के साथ-साथ खिलाड़ी मैदान में आक्रामकता का ज्यादा प्रदर्शन करने लगे. 2001 के आसपास (या उसके कुछ बाद) हमारे खिलाड़ी उस बीमारी की चपेट में आने लगे जिसे 'ऑसिआइटिस' या 'ओजिआइटिस' कहा जा सकता है—बढ़-चढ़कर स्लेजिंग और आक्रामक शारीरिक इशारेबाजी, जिसे स्टीव वॉ के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलियाइयों ने कला की ऊंचाई पर पहुंचा दिया था. 2001 की टेस्ट सीरीज के दौरान गांगुली ने खीझ दिलाने की हद तक वॉ को टॉस के लिए इंतजार करवाया, द्रविड़ ने तीन ऑस्ट्रेलियाइयों को 'फकऑफ' बोल दिया. जोहनिसबर्ग में 2003 के विश्व कप फाइनल में जहीर खान ने मैथ्यू हेडन को स्लेज करने की कोशिश की. हिंदुस्तान के लड़कों की अगली खेप ने जब तक राष्ट्रीय टीम की ड्रेस पहनी, स्लेजिंग उतनी ही जरूरी हो गई जितना बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग का हुनर. इनमें से एक युवा तुर्क (अब टीम में पस्त पड़ते बड़े खिलाड़ी) से अचानक मेरी मुलाकात हुई और मैंने कहा कि वे कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो रहे हैं, तब उन्होंने दूर से गुर्राते हुए कहा, 'नो, नो, नत्थिंग! वीय्यावतु गिव्विदबैग टुडेम! '

हमें ऑस्ट्रेलियाइयों की बीमारी लगी थी, पर इसमें हमने अपनी ऐंठ भी जोड़ ली. ऑस्ट्रेलियाई नस्लवादी, मर्दाने और दबंग हो सकते हैं, वे धोखाधड़ी भी कर सकते हैं, पर वे अंधराष्ट्रवाद या सैन्यवाद का प्रदर्शन नहीं करते. मैदान में उनकी ड्रेस पर अगर कोई चीज जुड़ी होती है, तो वह स्तन कैंसर के खिलाफ जंग सरीखे मकसद का समर्थन करने के लिए होती है; वे राष्ट्रवाद या सियासी मान्यताएं दूर रखते हैं. दूसरी ओर हम अनर्गल से बेहूदापन की ओर जा रहे हैं. हमारी टीम 'अपने सैनिकों के प्रति हिमायत दिखाने' के लिए अंतरराष्ट्रीय मैच में मिलिटरी कैप पहनकर आ जाती है, महेंद्र सिंह धोनी विश्व कप में विकेटकीपिंग ग्लव्ज पर अपनी रेजिमेंट का चिन्ह पहनकर आते हैं; इंग्लैंड की नीली ड्रेस से अलग दिखने की दलील पर हम अपने कपड़ों में एक खास रंग जोड़ लेते हैं, जो सत्तासीन पार्टी का पसंदीदा रंग होता है.

खिलाड़ी सियासी तौर पर मूर्ख होने के लिए जाने जाते हैं और आम तौर पर दबंग नेताओं की ओर झुक जाते हैं (मेसुट ओजिल के विवाह समारोह में जब एरदोगान की तस्वीरें देखिए), मगर अपवाद भी हैं. अमेरिकी फुटबॉल के बड़े खिलाडिय़ों को देखें जो राष्ट्रगीत के लिए खड़े होने से मना कर देते हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ खड़े होते हैं, या मेगन रेपिनो को देखें, जिन्होंने विश्व कप जीतने के बाद ट्रंप को अपनी बीच की उंगली दिखाई.

हम हिंदुस्तानी खेलों में ऑस्ट्रेलिया की बहुआयामी कामयाबी से कोसों दूर हैं, पर हम क्रिकेट खेलने वाली दुनिया के अशिष्ट नवधनाढ्य हैं. सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के हाथों मगरूर हिंदुस्तानी टीम को धराशायी होते देखने में थोड़ा अजीब-सा संतोष था. जहां तक विरोध की बात है, आजादी और सच्ची देशभक्ति (और हां, खेल की सच्ची दौलत) तब जाहिर होगी जब हिंदुस्तान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाब कोई महिला या पुरुष खिलाड़ी किसी सियासी मुद्दे पर निर्भीक ढंग से देश की सरकार के खिलाफ खड़ा होगा.

रुचिर जोशी फिल्मकार और लेखक हैं.

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