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रियल एस्‍टेट: छोटे शहरों के ऊंचे ठाट

नए शहरों के उभरने का अनुमान है, अगले दो दशक में. ये अभी के शहरों की बढ़ती आबादी को मैनेज करने के लिए होंगे.

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डॉ अमित कपूरनई दिल्‍ली, 12 March 2013
रियल एस्‍टेट: छोटे शहरों के ऊंचे ठाट रियल एस्‍टेट

शहरीकरण वह बुनियादी कारण है जो भारत में रियल एस्टेट और रिहाइश की जगहों की मांग बढ़ाता है. फिलहाल भारत में शहरी आबादी कुल आबादी का 31 फीसदी है यानी कुल 37.7 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं. तादाद में देखें तो अमेरिका और ब्रिटेन की पूरी आबादी के बराबर. इसके और बढऩे की संभावना है. आबादी में यह इजाफा महानगरों और जयपुर, सूरत, पटना, इलाहाबाद जैसे शहरों में खास तौर पर देखा जा रहा है.

गुडग़ांव: उभरा देश का चेहरा
इन शहरों में संसाधनों, बुनियादी ढांचे और निवासियों के लिए रिहाइशी जगह की कमी भी महसूस की जा रही है. अनुमान के मुताबिक 2031 तक शहरी आबादी साठ करोड़ के स्तर को छू जाएगी. शहरों में इतनी भारी आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें सालाना 70 लाख मकान बनाने होंगे. अगले दो दशकों में 35 नए शहरों का उभार भी अनुमानित है जो शहरों की बढ़ती आबादी को मैनेज करने के लिए होगा. इसलिए यह सही वक्त है कि सरकार अपनी जड़ता तोड़े और नियोजित तरीके से संसाधनों को उपयोग में लाने और आवंटित करने के तरीकों को पहचाने.

नोएडा: सबसे ऊंचा नोएडा
बढ़ती आबादी, शहरों में पलायन और एकल परिवारों के चलन से शहरीकरण की जो लहर उठी है, उसने अधिकतर भारतीय शहरों में रिहाइश और व्यवसाय के लिए ज्यादा मकानों की मांग पैदा कर दी है. हाउसिंग सेक्टर पर काफी दबाव है, जिसके चलते पिछले एक दशक में फैलती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसमें 32 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसके बावजूद मध्यवर्गीय आय वाले लोगों के लिए किफायती मकान पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हैं. वास्तविक मांग और आपूर्ति में भारी अंतर है. जमीन की कमी और उसकी बढ़ती लागत ने समस्या को और गंभीर बना दिया है.real estate special

गाजियाबाद: हाइराइज का नया हब
हाल के एक सर्वे के मुताबिक, भारतीयों के पास शहरों में प्रति व्यक्ति 100 वर्ग फुट जगह है. मान लें कि एक परिवार में औसतन चार लोग हों, तो प्रति व्यक्ति यह आंकड़ा 25 वर्ग फुट बैठता है. सतह पर फैलाव के लिए घटती जगह और बढ़ती आबादी के मद्देनजर अब मीनारी विकास पसंदीदा विकल्प बनता जा रहा है. इससे शहरों को और वृद्धि में मदद मिलेगी, वे सुनियोजित तरीके से विकसित होने के अलावा जमीन का अधिकतम उपयोग कर सकेंगे. मीनारी विकास की इस अवधारणा को सिंगापुर और शंघाई जैसे शहरों की सिर्फ  नकल नहीं समझ जाना चाहिए. इसकी बजाए भारतीय शहरों को अपनी ताकत और कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए अपने तरीके से फैलना चाहिए.

फरीदाबाद: एनसीआर में जन्नत
कुछ भारतीय शहर मीनारी विकास के लिए तैयार नजर आते हैं. नोएडा इसका जीवंत उदाहरण है जो आज हाइ-एंड लग्जरी प्रोजेक्ट्स के केंद्र के तौर पर विकसित हो चुका है. यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों की पसंद है और पड़ोस के गाजियाबाद, फरीदाबाद और भिवाड़ी वगैरह को कड़ी टक्कर दे रहा है. धीरे-धीरे मेरठ, जयपुर, रांची, इंदौर और चंडीगढ़ जैसे शहर भी इसी के नक्शेकदम पर बढ़ रहे हैं. इन शहरों के निजी डेवलपर खरीदारों को एक ऐसी जगह का लोभ देकर आकर्षित करने में लगे हैं जहां न सिर्फ खुदरा सेवाएं बल्कि मल्टीप्लेक्स, गेमिंग जोन और तमाम अभिजात्य ब्रांडों के साथ मनोरंजन के हर साधन उपलब्ध हैं. इस तरह वे आज के उन महत्वाकांक्षी उपभोक्ताओं को समूचा पैकेज मुहैया करा रहे हैं, जो अपनी जीवनशैली को दोबारा गढऩे और प्रतिष्ठा का हर आधुनिक तमगा अपने साथ चिपकाने की ख्वाहिश में विश्वस्तरीय ब्रांडों की ओर देखते हैं.

रांची: सबके लिए आशियाना
आज दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगर खुद को फैलाने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं क्योंकि इनकी वृद्धि का पहिया अब थम चुका है. ठस यातायात, चौतरफा प्रदूषण और बुनियादी सेवाओं की कमी इन शहरों के लिए कमजोरी बन रही है. नतीजतन, इनके पड़ोसी इलाकों में विकास की रफ्तार तेज है और वे इलाके मध्यवर्ग को बहुमंजिला इमारतों के रूप में ज्यादा व्यावहारिक रिहाइश मुहैया करा रहे हैं. इन इलाकों में बहुमंजिला इमारतों का चलन लोगों को बेहतर जीवन स्थितियां दे रहा है.

लखनऊ: ऊंची होती नवाबी नगरी
यह न सिर्फ हर व्यक्ति को पर्याप्त जगह देकर भीड़-भाड़ की समस्या से निजात दिलाता है, बल्कि यह भी तय करता है कि यहां रहने वालों के पास घूमने-फिरने को पर्याप्त जगह हो. ये शहरी ढांचे बनाए ही इस तरह जाते हैं कि जहां टहलने-फिरने या साइकिल चलाने की जगह होती है. वे आसपास के बाजारों और मॉल में जा सकते हैं. यहां से अच्छे संपर्क साधन लोगों को बसों और ट्रेन आदि तक पहुंचने में मदद करते हैं. इस तरह भीड़-भाड़ से मुक्त प्रदूषणरहित रिहाइश संभव हो पाती है.

आगरा: बुलंदी को छूता शहर
देशभर में तमाम निजी डेवलपर बहुमंजिला इमारतें बनाने की मंजूरी पाने के लिए लाइसेंस की अर्जी दे रहे हैं. गुडग़ांव इलाके में इस तरह के करीब 129 लाइसेंस डेवलपरों को दिए गए हैं. इसके बावजूद गुडग़ांव इस बात की मिसाल है कि एक शहर को कैसे विकसित नहीं होना चाहिए. इसे शहरी विनाश का पर्याय माना जा सकता है. ऐसा नहीं कि ढेर सारी बहुमंजिला इमारतें मिलकर शहर के मौजूदा हालात को दुरुस्त कर देंगी. अगर किसी इलाके को सुनियोजित तरीके से विकसित नहीं किया गया है, तो मीनारी विकास वहां की समस्याओं का इलाज नहीं हो सकता. नियोजन ऐसा अहम पहलू है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती.

पटना: आकाश छूने को बेताब
कम-से-कम बुनियादी ढांचा तो होना ही चाहिए, जबकि गुडग़ांव एक शहर के तौर पर सिर्फ  विशाल दफ्तरों और किफायती तरीके से रहने के लिए बमुश्किल ही मकान उपलब्ध करवाता है. यहां की बुनियादी नागरिक सेवाएं बदहाल हैं. यहां आवासीय और ऑफिस स्पेस में भारी असंतुलन है क्योंकि ये दोनों एक ही जगह पर बने हुए हैं. गुडग़ांव के अर्बन प्लानर्स ने जो गलती की है, दूसरे शहरों को उससे सीख लेनी चाहिए. किसी भी शहर के लिए एक ऐसा मॉडल जरूरी है जो आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश और पर्यावरण संतुलन के साथ-साथ साधन, आवाजाही और कुल मिलाकर बेहतर जीवनस्तर उपलब्ध करा सके.

चंडीगढ़/मोहाली: यही है सपनों की मंजिल
रिहाइशी विकास के साथ कदम-से-कदम मिलाते हुए दफ्तरों वाली जगहों पर भी निवेश ठोस ढंग से बढ़ा है. कॉर्पोरेट संस्थान पहले दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में अपने दफ्तर खोलना चाहते थे. अब वे लगातार घटते स्पेस और महानगरों में कारोबार की बढ़ती लागत के चलते पहले, दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में भी जाने को तैयार बैठे हैं. आज भिवाड़ी, फरीदाबाद, ग्वालियर, पटना, रायपुर, लुधियाना, लखनऊ, जयपुर जैसे शहरों में उम्मीद की नई लहर पैदा हो रही है क्योंकि अधिकांश औद्योगिक विकास इन्हीं के इर्द-गिर्द हो रहा है. इन शहरों में प्रतिभा, स्थानीय टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का ऐसा संसाधन आधार मौजूद है, जिसका दोहन अब तक नहीं हुआ है. ये शहर आज अगली कतार में हैं और कार्यालयों के लिए जगह खोजते कॉर्पोरेट जगत को लुभा रहे हैं.

जयपुर: सिर उठाती संभावनाएं
मेगाप्लेक्स की मेक्सिकन सीरीज सिनेपोलिस चंद साल पहले जब भारत के बाजार में आई तो उसने अमृतसर, भोपाल, पटना जैसे शहरों को चुना. आज यह भविष्य के लिए ऐसे ही शहरों को अपने प्रोजेक्ट्स के लिए चुन रही है. जाहिर है, ये शहर अच्छे पर्यावरण, नए बुनियादी ढांचे और काम के लिए बेहतर लोग हासिल करने में आसानी की वजह से न सिर्फ  अंतरराष्ट्रीय बल्कि घरेलू कंपनियों को भी लुभा रहे हैं. शहरी इलाकों में आवासों और दफ्तरों की घटती जगह की चुनौती से निबटने और उनके क्षितिज को विस्तार देने के लिए नियोजित विकास एक मजबूत औजार के तौर पर काम कर सकता है और रिहाइश की समस्याओं का प्रबंधन कर पाने में सक्षम है.

लेखक गुडग़ांव स्थित एमडीआइ में प्रोफेसर और इंस्टीट्यूट फॉर कांपिटीटिवनेस के मानद चेयरमैन हैं

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