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मौन देशभक्ति की ओर

मेरे लिए मेरे देश का अर्थ है मेरे लोग, मेरा शहर और मेरा वातावरण. निश्चय ही यह कोई विचारधारा नहीं है. अपने देश के प्रति प्रेम व्यक्त करने के लिए मुझे अपने चेहरे पर तिरंगा बनवाने की जरूरत नहीं है.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 14 August 2019
मौन देशभक्ति की ओर देशभक्ति

धर्म की ही तरह देशप्रेम भी व्यन्न्तिगत भाव है जो बहुत अंतरंग रूप से अभिव्यक्त होता है और इसीलिए धर्म की ही तरह अलग-अलग लोगों के लिए इसके अलग-अलग अर्थ होते हैं. धर्म की ही तरह यह उत्तेजनाकारी भी हो सकता है. देशप्रेम एक कोमल भाव है और मेरा मानना है कि सिनेमा में इसका बहुत सावधानी से इस्तेमाल होना चाहिए.

मैंने जो पहली देशभक्तिपूर्ण फिल्म देखी, वह थी क्रांति (1981). हैरानी की बात है कि इसे देख कर मुझमें देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं जागा. उस समय मैं बहुत छोटी थी और मुझे लगता है कि बचपन में हम कोई दार्शनिक भाव ग्रहण करने के इरादे से फिल्में नहीं देखते. उस दौर में फिल्म देखना आनंद के आंतरिक अनुभव जैसा होता है जिसका आप पर बाद में जब आप बड़े हो जाते हैं, तब असर होता है. मैं जब बड़ी हो रही थी, उस दौर में देशप्रेम की रंगो-बू काफी अलग थी. उदाहरण के लिए हमारे बचपन के बड़े हिस्से में ऐसी फिल्मों के खलनायक औपनिवेशिक शासक, मुगल या ब्रिटिश होते थे. स्कूली किताबों और फिल्मों से हम एक जैसी बातें सीखते थे.

और पीछे जाते हुए '50 या '60 के दशक की फिल्में देखते हुए मुझे कोशिश करके उनके संदर्भों को याद रखना पड़ता है. उस दौर में हमें स्वतंत्रता मिली ही थी. एक देश के रूप में हम खड़े होने की कोशिश कर रहे थे. हमारी अर्थव्यवस्था एकदम शुरुआती दौर में थी. 'मेरे देश की धरती' और 'ऐ मेरे वतन के लोगो' जैसे गीत लोगों के दिलों की धड़कन बन गए थे क्योंकि वे एक खास इरादे से—लोगों में आत्मबोध का भाव भरने के लिए—लिखे गए थे.

फिल्मों का समाज से अत्यंत सहजीवी संबंध है. दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं. होता है. फिल्में हमारे समय को दर्शाती हैं और बदले में समाज भी फिल्मों से बहुत सी बातों को सोखता है. इसलिए, जब '70 के दशक में हमारे आर्थिक विकास के दौर में मिल मजदूरों की समस्याएं सुर्खियों में थीं तो अमिताभ बच्चन का 'ऐंग्री यंग मैन' व्यक्तित्व लोकप्रिय हो गया. फिल्में जो बात करती हैं, उसका उस काल से बहुत जुड़ाव होता है जिसमें वे बनी होती हैं.

सिनेमा में देशप्रेम भी आंशिक रूप से फिल्म और उसके निर्माता की संवेदनशीलता के अनुसार ही आकार लेता है. उदाहरण के लिए लगान (2001) को लीजिए. इसमें ब्रिटिश शासक स्पष्ट रूप से शत्रु थे, लेकिन ग्रामीण अपनी गरीबी से भी लड़ रहे थे. वे सूखे से भी लड़ रहे थे. फिल्म के अंतिम हिस्से में वे जब क्रिकेट मैच जीतते हैं तो उनकी खुशी की वजह सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने अंग्रेजों को हरा दिया बल्कि उसमें अपनी प्रतिकूलताओं को हराने का सुख भी शामिल है. उनका गौरव मानवीय भावना का प्रकटीकरण है.

उनकी उपलब्धि किसी तुच्छ और नगण्य समझे जाने वाले को चमकने का मौका मिलने की है. मेरे लिए लगान सिर्फ देश प्रेम दिखाने वाली फिल्म नहीं थी. यह लोगों के साहस की कथा थी.

जब मैंने राज़ी (2018) पर काम शुरू किया तो लेखन, छायांकन, निर्माण तथा संपादन की प्रक्रियाओं से गुजरते हुए मेरे दिमाग में कभी यह ख्याल नहीं आया कि मैं कोई देशभक्तिपूर्ण फिल्म बना रही हूं. मेरे लिए यह फिल्म दुर्दमनीय मानवीय भावना, दृढ़ता, और युद्ध की निरर्थकता की कहानी थी. जब हमने फिल्म को पहली बार पूरी तरह संयोजित किया, तब महसूस किया कि यह फिल्म तो और भी बहुत कुछ कह रही है.

अगर आप ध्यान दें तो आपको राज़ी में कहीं भी भारतीय झंडा नहीं दिखेगा. न ही, पूरी फिल्म में कहीं पाश्र्व पृष्ठभूमि के रूप में राष्ट्रगान या 'वंदे मातरम्' का गायन सुनाई पड़ेगा. मेरा इरादा सच्ची दृढ़ता की एक कहानी दिखाने का था. मैं इससे देशभक्ति का पाठ नहीं पढ़ाना चाहती थी. इसके मुख्य चरित्र सहमत (आलिया भट्ट) की ओर जिस बात ने मुझे खींचा था वह यह थी कि उस जैसा भी कोई कभी इस दुनिया में मौजूद था. मेरी नजर में यह चरित्र एक आदर्श था, एक प्रेरणा थी. उसे देखते हुए आपमें गहरे संतोष और उन्नयन का भाव पैदा हो सकता है. मैं उसकी सच्ची कहानी को दिखाना चाहती थी.

यह संयोग भर है कि जब लोगों ने फिल्म को देखना शुरू किया और समीक्षकों ने समीक्षाएं लिखनी शुरू कीं तो हम जिन अर्थों के साथ इसे ले कर चले थे, उससे आगे के अर्थ भी खुलने लगे. यह ऐसी फिल्म के रूप में उभरी जो देश प्रेम को एक अलग नजरिए से पेश करती थी. इसमें देखा जा सकता था कि उग्र राष्ट्रवादी अभिव्यक्तियों का सहारा लिए बिना भी आप देशभक्ति हो सकते हैं.

हम जब सहमत के पाकिस्तानी परिवार के चरित्रों का लेखन कर रहे थे तो हमने शायद अनजाने में ही सुनिश्चित कर दिया था कि उनका व्यवहार, क्रियाएं और निर्णय राष्ट्रवादी प्रभाव से संचालित न हों. इसीलिए जब आप इन पाकिस्तानी चरित्रों के सामने रख कर सहमत को देखते हैं तो वह आपको खलनायिका लगती है. वही है जो पूरे परिवार को बर्बाद करने में लगी है. लेकिन जैसे ही आप उन वजहों का ख्याल करते हैं जिनके चलते वह ऐसा कर रही है तो अचानक उसके प्रति भावों की नकारात्मकता खत्म हो जाती है. उसे प्रेरित करने वाले कारकों को हटाते ही वह फिर प्रति-नायिका लगने लगती है न कि उसका पाकिस्तानी परिवार. 'शत्रु पक्ष' को मानवीय बनाए रखते हुए सहमत को नैतिक रूप से ठीक साबित किए रखना अपने आप में चुनौती थी. जरा भी किसी ओर झुकते ही यह संतुलन बहुत खराब हो सकता था.

भावुकता मुझे बहुत परेशान नहीं करती, लेकिन जब दंभ किसी भावना के रूप में फेरे लगाने लगाता है तो मेरे भीतर की घंटी बज जाती है. अगर मैं फिल्म में सहमत की देशभक्ति का चित्रण कर रही हूं, तो मुझे उसके पति इकबाल के उसके देश के प्रति प्यार के बारे में भी बोलना चाहिए. एक की देशभक्ति दूसरे की कीमत पर क्यों हो? अगर हमारे साथ हमारा देशप्रेम है, तो हमें दूसरों के देशप्रेम को भी स्वीकार करना चाहिए. मेरे हिसाब से मुझे अपने देश से प्यार करने के लिए किसी दूसरे देश से नफरत करने की जरूरत नहीं है.

अंत में, इरादा ही वह चीज है जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. हमने जब तलवार (2015) बनाई थी तो हम किसी तरह के विवाद में नहीं फंसना चाहते थे. हम केवल कहानी के दोनों पक्षों को सामने लाना चाहते थे क्योंकि हमें लग रहा था कि इस बारे में जो समाचार हमारे बीच आए थे वे असंतुलित थे. हमारे पास कोई समाधान नहीं था. हम केवल सारी जानकारी सामने रखना चाहते थे. यह आपका इरादा ही है, जो मुझे लगता है कि सबको दिखाई पड़ता है. इस लिहाज से देशभक्ति का चित्रण भी बिल्कुल ऐसी ही बात है.

देशभक्ति के मेरे चित्रण चाहे जितने भी निश्चेष्ट हों, उन पर मेरे इरादे का प्रभाव होता है. मेरे लिए मेरे देश का अर्थ है मेरे लोग, मेरा शहर और मेरा वातावरण. निश्चय ही यह कोई विचारधारा नहीं है. अपने देश के प्रति प्रेम व्यक्त करने के लिए मुझे अपने चेहरे पर तिरंगा बनवाने की जरूरत नहीं है. मेरा मानना है कि अगर मैं खुद को अपने काम में डुबो लूं तो मैं थोड़ा बहुत कुछ ऐसा सामने ला सकती हूं जिससे इस राष्ट्र को बेहतर बनाने में मदद मिल सके. मैं झंडा फहराने या नारे लगाने का काम नहीं कर सकती. मुझे अपनी फिल्मों या अपने जीवन में अपनी देशभक्ति साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. मुझे ऐसा करने के लिए कहा भी नहीं जाना चाहिए.

मेघना गुलज़ार फिल्म निर्माता हैं. श्रीवत्स नेवतिया से उनकी बातचीत पर आधारित.

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