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ड्रग्स से लड़ने की चुनौती

बेरहम कानून भी ड्रग्स की खपत पर लगाम कसने में नाकाम रहे. अकेला हल यही है कि इसे गैर-आपराधिक बनाने के साथ और सबूत आधारित नियमों की जद में रखा जाए

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अभिनव कुमारनई दिल्ली, 16 August 2018
ड्रग्स से लड़ने की चुनौती इलेस्ट्रशनः नीलांजन दास

इकहत्तर साल पहले 15 अगस्त, 1947 को आधी रात का गजर बजने के साथ ही भारत के लोगों ने कल्पना की एक साहसी छलांग लगाई थी. उन्होंने न केवल अपने औपनिवेशिक आकाओं से आजादी हासिल की बल्कि उस आजादी को सबसे हिम्मतवर मुमकिन तरीके से परवान चढ़ाया था.

कभी-कभार उथल-पुथल के दौरों के बावजूद उमंग और आशा की वह उड़ान जारी है. बीते सात दशकों के दौरान जब हमारे ज्यादातर पड़ोसी तमाम किस्म की पराधीनताओं के साथ छेड़छाड़ में मुब्तिला थे, हमारी स्वाधीनता की उड़ान बहादुरी और पक्के इरादे की चिरस्थायी गाथा में बदल गई.

हिंदुस्तान का मतलब अब लाखों आजादियां हैं. निजता के अधिकार की हाल ही में संवैधानिक मान्यता के तौर पर तस्दीक की गई है. जेंडर और जाति लगातार विशेषाधिकार की खबर ले रही हैं.

समलैंगिक अधिकार कानूनी मान्यता मिलने के कगार पर हैं. इच्छामृत्यु को और कानूनी और सामाजिक स्वीकार्यता हासिल हो रही है. दिव्यांग लोगों को ज्यादा से ज्यादा देखा और सुना जा रहा है और इस तरह खुद उनकी जिंदगी और पूरे समाज में फर्क लाया जा रहा है.

इस प्रक्रिया में बेशक कुछ पुरानी गड़बडिय़ां भी हो गई हैं. अलबत्ता वे भी उसी आजादी की साझा नींव कायम हैं जहां आकांक्षाओं का कोलाहल मौजूद है और मुकम्मल हो रहा है.

हारी हुई जंग

ऐसी ही एक आजादी वह है जिसे कई देशों में पहले से ही आजमाया जा रहा है. यह है मनबहलाव के लिए पदार्थों के सेवन की आजादी. दूसरे लफ्जों में, "नशा करने का अधिकार''. तमाम पुरानी सभ्यताओं की तरह ऐंद्रिक सुख के प्रति हमारा दोहरा रवैया रहा है.

20वीं सदी ने दुनिया भर में 1960 और 1970 दोनों दशकों के नशीले और मादक दौर देखे, जब जन शिक्षा, यात्रा और वाणिज्य की शक्ति से ओतप्रोत एक वैश्विक युवा संस्कृति अपने दम पर ताकत बनकर खड़ी हो गई. उन्हीं दिनों तमाम किस्म के मनबहलाऊ नशों के इस्तेमाल में इजाफे से निपटने के लिए समाजों ने बेहत सक्त कानूनी उपाय किए. 1980 का दशक अमल का दौर था. ज्यादा साफ कहें तो नशे के दुरुपयोग के खिलाफ जंग का जमाना.

नशे के खिलाफ जंग की अगुआई अमेरिका ने की और उसी ने इसमें सबसे ज्यादा पैसा लगाया. विरोधाभासी बात यह कि आजादख्यालों की सरजमीं के तौर पर इसकी जय-जयकार की जाती थी और तीन दशक  से पश्चिमी दुनिया के गुस्से और आक्रोश के निशाने पर रहा था.

दूसरी जगहों के समाज नशीले पदार्थों पर 1961 के संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन और उसके बाद की अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत अपनी जिम्मेदारियों से बंधे थे और 1970 के दशक में उन्होंने अपनी विधायी और प्रवर्तन मशीनरी को तैयार करना शुरू कर दिया था. 1980 के दशक का मध्य आते-आते मनबहलाऊ नशीले पदार्थों के उत्पादन, वितरण और सेवन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था मोटे तौर पर कायम हो चुकी थी.

इन कानूनों और एजेंसियों के खिलाफ सक्रिय और फैला था एक पचमेल जमावड़ा जिसमें उत्पादकों और वितरकों के कार्टेल के अलावा सबसे अहम वे लाखों उपभोक्ता थे जो इस कानून को ताक पर रखकर मुजरिमों की जिंदगी बसर करने का जोखिम उठाने के लिए तैयार थे. केवल इसलिए कि वे मानते थे कि ऐसा करना आजादी की जिंदगी बसर करना होगा.

आप मानकर चल रहे होंगे कि इस जंग का नतीजा तो पहले से तय ही रहा होगा. हर साल हम महान सफलता की कहानियां सुनते हैं जिनमें सरकारी एजेंसियां टनों मारिजुआना या क्विंटलों कोकीन पकड़ती हैं और जनसंकल्प का शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्हें आग के हवाले कर देती हैं.

अलबत्ता, इस सबका इन पदार्थों की स्ट्रीट प्राइस यानी रोज-रोज बदलती और घोषित से कम कीमत पर, और न ही इनके मिलने और खपत के स्तरों पर, कोई फर्क पड़ता मालूम देता है. यह वाकई अजीब जंग है जिसमें हम लड़ाइयां जीतते जाते हैं तो भी जंग के नतीजे पर संदेह बना रहता है.

धीरे-धीरे, जैसा कि यौन क्रांति के मामले में हुआ, पश्चिम में नशे की आजादी को लेकर आम लोगों की राय बदल रही है. इसकी कुछ वजह तो नशीले पदार्थों के खिलाफ जंग से पैदा हुई तबाही है और कुछ वजह खुद आजादी के बारे में बदल रही अवधारणा है.

2011 में पहिया तब पूरा उलटा घूम गया जब संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान, पूर्व अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जॉर्ज शुल्ज और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के पूर्व चेयरमैन पॉल वॉकर सरीखी दो दर्जन प्रमुख हस्तियों की सदस्यता से लैस ग्लोबल कमिशन ऑन ड्रग पॉलिसी ने अपनी लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में कहा कि "नशीले पदार्थों के खिलाफ वैश्विक जंग नाकाम हो चुकी है और इसके दुनिया भर के लोगों और समाजों के लिए विनाशकारी नतीजे हुए हैं''.

रिपोर्ट ने इस जंग से पैदा तबाही का विश्लेषण किया और विकल्प के तौर पर इस बात की वकालत की कि नशीले पदार्थों के इस्तेमाल को उन लोगों के लिए बड़े पैमाने पर गैर-आपराधिक बना दिया जाए जो दूसरों को कोई शारीरिक नुक्सान नहीं पहुंचाते. इस रुख को कमिशन की 2017 की रिपोर्ट में और विस्तार से रखा गया जिसका शीर्षक थाः "नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वाले लोगों के खिलाफ पूर्वाग्रहों का मुकाबला करना.''

नशीले पदार्थों पर नियंत्रण के कानूनों और उन पर अमल का हिंदुस्तानी तजुर्बा भी दुनिया भर के तजुर्बे की तरह कामयाबियों और नाकामियों का उतना ही मिला-जुला तजुर्बा रहा है. हमने भी 1985 में एक बेहद सक्चत कानून नारकोटिक ड्रग्स ऐंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेज (एनडीपीएस) ऐक्ट बनाया जो 1961 के पहले सम्मेलन से शुरू होकर तमाम संयुक्त राष्ट्र संधियों के तहत हमारी बाध्यताओं के अनुपालन में तैयार किया गया था.

एनडीपीएस कानून के वजूद के तीन से ज्यादा दशकों के दौरान कई हलकों से इसकी आलोचना की गई और इसे पुलिस की कथित बदसुलूकी का उदाहरण बताया गया, जो इससे कहीं ज्यादा कुख्यात आंतकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) कानून या टाडा से मिलता-जुलता था.

पुलिस अफसर होने के नाते मैं कहूंगा कि असल दिक्कत हमारी प्रवर्तन एजेंसियों के हाथों इस कानून के अमल में नहीं है, बल्कि दिक्कत उस बुनियादी फलसफे में है जो इस कानून की जड़ में ही है. आप जब एक सख्त कानून बनाते हैं, तो उसके दुरुपयोग की आशंका तो होती ही है.

हिंदुस्तान में नशीले पदार्थों के खिलाफ जंग हमारी पारंपरिक संस्कृति में नारकोटिक्स पदार्थों के इस्तेमाल के समृद्ध और जटिल इतिहास को देखते हुए और भी बिडंबना से भरी है. मनोरंजन के दूसरे रूपों मसलन संगीत और कला की तरह तमाम पदार्थों का सेवन भी धार्मिक प्रथाओं में गुंथा हुआ है.

जिस तरह दक्षिण अमेरिकी शामनावादी अनुष्ठानों के लिए अयुवास्का और मेस्केलिन सरीखे मतिभ्रम पैदा करने वाले पदार्थों का सेवन करते हैं, उसी तरह भांग और चरस का सेवन नागा अखाड़ों की शैव पूजा पद्धति के साथ अभिन्न तौर पर जुड़ा हुआ है. आप हरिद्वार में लगने वाले कांवड़ मेले में जाएं या चार शहरों में लगने वाले किसी भी एक कुंभ मेले  में जाएं, तो आप चरस का जश्न मनता देखेंगे.

इसका इस्तेमाल यहां ज्यादा खतरनाक नशे की तरफ ले जाने वाले शुरुआती नशे के की तौर पर नहीं, बल्कि शिव की भक्ति के तौर पर होता है. इसी तरह अफीम का इस्तेमाल देश के बड़े हिस्सों में खासा आमफहम और समाज में स्वीकृत है.

इन प्रथाओं और दस्तूरों को आपराधिक बनाने से भी इनकी खपत पर लगाम कसने में कोई मदद नहीं मिली है. इसने सिर्फ इतना किया कि लोगों को परेशान करने का एक और औजार पुलिस के हाथों थमा दिया.

यौन दस्तूरों की तरह ही यह वह इलाका है जिसमें सरकार निजी आजादी के आगे यह जंग रोज-ब-रोज हार रही है और राज्यसत्ता की नैतिक ताकत और निजी स्वतंत्रता से इसकी भारी कीमत चुका रही है.

यह वह जंग है जो राज्यसत्ता नहीं जीत सकती. विवेक और गरिमा के साथ पीछे हटकर इसे गैर-आपराधिक बनाना और मेडिकल रिसर्च तथा सबूतों के आधार पर नियम-कायदे लागू करना ही इसका अकेला समाधान है.

लेखक सेवारत आइपीएस अधिकारी हैं. व्यक्त विचार उनके निजी हैं

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