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हिमाचल प्रदेशः हर ठिकाने का जायका टकाटक

इस पर्वतीय राज्य में कहीं स्थानीय उत्सवी भोज धाम की खुशबू तो कहीं आम व्यंजनों और बेकरी उत्पादों का भी ऐसा स्वाद कि मुंह में पानी आ जाए

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डी.डी. गुप्ता 17 December 2018
हिमाचल प्रदेशः हर ठिकाने का जायका टकाटक हिमाचल का जयका

टक्का बेंच

शिमला

तीन लेयर्स में "चीज़'' का स्वाद और बेकरी के बिस्कुट. जयचंद शर्मा परोसते हैं तो खुशबू पूरे बुक कैफे में महकती है और फिर लीजिए पढऩे का आनंद. शिमला की इस जगह को टक्का बेंच कहते हैं. जहां डॉमिनोज के पित्जा और मैक पफ को भी वे लोग मात दे रहे हैं, जो सजायाफ्ता हैं. जी हां, टक्का बेंच वह जगह है जहां से समूचा शिमला दिखता है, ठीक रिज के ऊपर और सामने खुला-खिला आसमान. गर्मियों में बहती ठंडी हवा और सर्दियों में बर्फीली चांदी से सजे पहाड़.

इसलिए इसे टक्का बेंच कहते हैं क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान यहां पर बैठने के लिए एक "टक्का'' लगता था. सैलानी जहां जाखू मंदिर जाते हैं तो वापसी में भूख लगती है तो टक्का बेंच की चाट-पापड़ी का स्वाद बरबस ही मुंह में पानी भर देता है. बरसों से यहां भेल पूरी और रसीले गोलगप्पे बेचने का काम तीन लोग करते हैं. लेकिन साथ ही में पुलिस विभाग के शिमला जेल केंद्र का एक बुक कॅफे खोला गया, जिसमें वह सामान बिकता है जो कैथू जेल के कैदी बनाते हैं. सामान बेचने का काम भी कैदी ही करते हैं. इनमें बर्गर, पित्जा, पैटीज के अलावा तमाम बेकरी प्रोडक्ट्स रखे गए हैं, जिनका स्वाद गर्मागर्म कॉफी के साथ लिया जाता है.

जयचंद शर्मा को ताउम्र जेल की सजा मिली है. वह हर रोज यहां आता है, कैदियों के बनाए भोजन से लोगों को तृप्त करता है. वह कहता है, "मेरी पत्नी ने आत्महत्या की थी. मैं सजा भुगत रहा हूं पर संतोष है कि काम ठीक तरह से कर पा रहा हूं.'' जो खाने के व्यंजन बनाते हैं, वे भी हत्या, एनडीपीएस ऐक्ट में जेल की सजा काट रहें हैं. वे रोजगार की एवज में कमाई का कुछ हिस्सा पाते है. शिमला का यह खानपान क्षेत्र छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक का पसंदीदा है. साफ-सफाई का यहां बहुत ख्याल रखा जाता है.

टक्का बेंच में चाट-पापड़ी वगैरह के अलावा कैदियों के बनाए स्वादिष्ट व्यंजन मुंह में बस जाते हैं

मंडी की धाम

मंडी

शादी-ब्याह में नीचे जमीन पर दरी पर बैठकर परोसे जाने वाली धाम (खाना) का नाम जेहन में आते ही मुंह में पानी भर जाए. हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के घर-गांव में उत्सवी धाम में गजब का स्वाद होता है. धाम में धोतुआ दाल, दही का खैरू और मीठा बदाना के अलावा चार व्यंजन और होते हैं, जिन्हें सलूना कहा जाता है. मंडी के रहने वाले मोहित के जेहन में आया कि क्यों न धाम शादी-ब्याह के अलावा सामान्य दिनों में आम लोगों को उपलब्ध कराया जाए.

इसी सोच के साथ मंडी-मनाली रोड पर एक छोटा-सा ढाबा खोला गया. यहां हर दिन धाम बनती है. मोहित बताते हैं कि उनके साथ चार लोगों की टीम यहां की संस्कृति के बीच रचा-बसा खाना बनाती है और फिर प्यार से कांसे की थाली में खिलाया जाता है. परोसने का तरीका भी कुछ खास है. पहले चावल दिए जाते हैं. उसके बाद एक-एक करके सलूना परोसा जाता है. परोसने वाले को बोटी कहा जाता है. वह पहले मीठा देता है. इसे दाल के गोले बनाकर उसे चासनी में डुबोकर पकाया जाता है.

कांसे की गोल बड़ी थाली में लोग हाथ से खाते हैं. फिर दाल, कद्दू का खट्टा और सेपू बड़ी को पालक और दही में पकाया जाता है. मंडयाली धाम के दीवाने स्थानीय लोग ही नहीं हैं, बल्कि कुल्लू-मनाली जाने वाले टूरिस्ट भी स्थानीय दाल-भात खाने के लिए यहां रुकते हैं. मात्र 80 रु. में इस थाली में जी भर कर धाम का आनंद लीजिए. अगर कहीं उत्सव का निमंत्रण न भी है तो भी चख लीजिए यहां के रसीले स्वादिष्ट व्यंजन. ठ्ठ

सीताराम के छोले

शिमला

जो भी शिमला गया, उसका शहर के लक्कड़ बाजार में जाना न हुआ हो, यह समझ के परे है. सर्दियों में सड़क पर पड़ी सख्त बर्फ पर चलते कदम वहां बरबस ठहर जाते हैं. वहां पीतल की बड़ी-सी परात (प्लेट) में छोले की महक हवा में जो तैरती रहती है. यूं तो छोले भठूरे आपने कहीं और भी खाए होंगे, लेकिन पांच दशक से इस छोटी-सी दुकान का स्वाद भुलाए नहीं भूलता.

मीठी चटनी, कच्चे प्याज और हरी मिर्च के साथ इसका जायका ऐसा है कि कंपकंपाती ठंड भी छू-मंतर हो जाए. चटपटी और गर्मागर्म प्लेट से जैसे ही एक कौर मुंह में जाता है, ठंड के मारे मुंह से निकलती सफेद भाप भी शांत हो जाती है. लक्कड़ बाजार में सीताराम की दुकान के नाम से मशहूर यह कॉर्नर न सिर्फ  साफ-सुथरा है बल्कि फिल्टर्ड पानी भी यहां मिलता है. हर रोज यह दुकान सुबह 11 बजे खुलती है और शाम तीन बजे तक बंद हो जाती है. यहां बैठने के लिए कोई जगह नहीं लेकिन लंबी कतारें लक्कड़ बाजार की असल रौनक हैं. यह बमुश्किल ही होता है कि कोई वहां शॉपिंग करने जाए और सीताराम की दुकान के छोले न चखे.

 अब दुकान सीताराम के पोते चलाते हैं लेकिन बाप-दादा का स्वाद अब भी बरकरार है. विक्रम ठाकुर अपने दादा के काम को आगे बढ़ाए हुए हैं. तीन घंटे तक का ऐसा समय भी रहता है जब हाथ से कड़छी एक पल भी नहीं छूटती. ठ्ठ

नथूराम की जलेबी

शिमला

सिर पर हैट, गरम कोट, गले में स्कॉर्फ  लपेटे, घोड़े की बग्घी से उतरकर अंग्रेजी हुक्मरान शिमला के स्कैंडल प्वाईंट से सीधा नथूराम की दुकान पहुंच जाया करते थे, ताकि गर्मागर्म जलेबी दूध के बड़े से गिलास में डुबो कर खाई और दूध पीया जा सके. नथूराम-लक्ष्मण दास की बालू शाही के दीवाने तब न सिर्फ  अंग्रेज थे, बल्कि आज भी देश-विदेश से लोग जलेबी का आनंद लेने यहां आते हैं.

शिमला के लोअर बाजार में डी.सी. ऑफिस के समीप यह दुकान 119 साल पुरानी है, लेकिन जायका एकदम लाजवाब. एक बड़ी-सी कढ़ाई में लगातार खौलता दूध और बगल में शुद्ध देसी घी में बनती जलेबी लोगों को खींचती है. "मियां जी'' को लोग दूर से पूछते हैं, "क्यों मियां जी, सब खैरियत है?'' मियां जी गिलास में मलाई डालते-डालते बगैर आंख उठाए कहते हैं कि अल्लाह की मेहर है.

लगातार हाथ कढ़ाई पर रहते हैं और बाहर दूध पीने वालों की कतार. लोअर बाजार से कार्टरोड जाने वाले हों या फिर माल रोड, बीच में पड़ती इस दुकान की इमरती और सोहन हलवे की महक राहगीरों को खींच लेती है. यहां हर चीज शुद्ध घी में बनती है. डालडा या रिफाईंड का इस्तेमाल नहीं होता.

 अब बुजुर्गों की विरासत दो महिलाएं संभाल रहीं है. विमला कश्यप और मंजू सूद दोनों ही नथूराम-लक्ष्मण दास के परिवार से हैं. विमला कहती हैं कि हमारे बजुर्गों ने जो रवायत कायम की, उसे हम भी सहेजे हुए हैं. कहते हैं, इस दुकान में अंग्रेज वाइसरॉय तक आते थे. खासकर सर्दी के महीनों में, जब कंपकंपाती ठंड में कुछ गर्मागर्म स्वाद लेना होता था. अब यहां शहर और गांव के जो लोग शॉपिंग करने आते हैं, यहां की जलेबी की मिठास मुंह में भर कर जाते हैं. विदेशी पर्यटक भी यहां के स्वाद के कायल हैं.

त्रिशूल बेकरी

शिमला

अभी देश-विदेश के बेकर्स ने बेशक हिंदुस्तान के कोने-कोने में दस्तक दे दी हो लेकिन त्रिशूल की चॉकलेट पेस्ट्री से लिपटी उंगलियों से मुंह में चटखारे का मजा कहीं भी नहीं. शिमला वाले चाहे अब देश-विदेश में बस गए हों, लेकिन जब भी यहां आएं तो इस बेकरी के मोराईन बिस्किट खाना नहीं भूलते.

दरअसल, अंग्रेज जब ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में बसे तो विलायत से अपने बेकर्स भी लाए. ये बेकर परंपरागत तकनीक से यह पेस्ट्री ही नहीं, बल्कि ब्रेड भी बनाते थे. उस वक्त "बाबा जी'' ने उनसे काम सीखा था और बाद में त्रिशूल बेकर्स कायम की. तब अंग्रेजों के टेस्ट को ध्यान में रखकर उन्होंने यह बेकरी खोली. लिफ्ट के पास एक पुरानी बेकरी थी. करीब 100 वर्षों तक यह बेकरी लकड़ी से जलने वाली भट्ठी (ओवन) से चलती थी. यहां हर सामान पुरानी ईंटों से मिट्टी की लेप के भीतर ओवन में बनता था. यहां ब्रेड, पेस्ट्री और मैकरूम्स बिस्किट बनाए जाते थे और फिर लोहे के बड़े ट्रंकनुमा ट्रे में बिकते थे.

बाबा जी के परपोते हैं सूरज टॉयल. वे बताते हैं कि उनके दादा कृष्णचंद टॉयल ने 1959 में मॉल रोड पर शॉप खोली थी. मूलतः ये लोग शिमला जिले के चडग़ांव के रहने वाले हैं. सूरज को अपने परदादा का नाम याद नहीं है लेकिन कहते हैं कि उन्हें सभी बाबा जी बोलते थे. सूरज आज अपनी चार पुश्तों का स्वाद पेस्ट्री में बनाए हुए हैं. "हमने कई मॉर्डन ब्रान्ड रखने चाहें, लेकिन लोगों ने खारिज कर दिया. हम अपनी ट्रेडिशन पर ही कायम हैं.''

अब लकड़ी जलाने पर रोक लग गई है इसलिए भट्ठी इलेक्ट्रिक की जा रही है लेकिन बनेगी पुराने स्टाइल से ही. त्रिशूल पहले चर्चित गेटी थिएटर का हिस्सा था. अब यह मॉल रोड है. पेस्ट्री देसी घी और चॉकलेट से बनाई जाती है. इसमें पाइनएपल का स्वाद भी है. पिंक मोमजामे के लिफाफे में लिपटी ताजा ब्रेड आज भी मिल जाती है. इसलिए खाना कहीं भी खाएं मगर शिमला में त्रिशूल की पेस्ट्री का स्वाद लेना न भूलें.    

***

"अंग्रेजों के जमाने में विलायती बेकरों से सीख लेकर देसी घी और चॉकलेट से पेस्ट्री को देसी स्वाद देने वाले त्रिशूल बेकरी सौ साल से शिमला के मॉल रोड पर ऐसा ठिकाना है, जहां लोग अमूमन खाना खाने के बाद बरबस खिंचे चले आते हैं''

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