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दिल है कि मानता नहीं

शराबबंदी कोई समाधान नहीं. हिंदुस्तानियों को पीने का हक है और वे पिएंगे. मौजूदा अराजकता से निकलने का रास्ता यही है कि संजीदा ढंग से पीने को प्रोत्साहन दिया जाए

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Sahitya Aajtak 2018
रुचिर जोशीनई दिल्ली, 16 August 2018
दिल है कि मानता नहीं इलेस्ट्रशनः अजय ठाकुरी

वृद्ध बाबाजी गरजे, ''मैं शराब पीता हूं लेकिन मैं शराब को मुझे पीने नहीं देता.'' मैंने जब उस साधु को यह कहते सुना उस समय मैंने तीस की उम्र पार की ही थी. वे बीरभूम के एक गांव में अपनी झोपड़ी के बाहर बैठे हुए थे.

सर्दी की उस रात हर कोई रम पी रहा था जो हमारी घुमक्कड़ टीम अपने साथ कलकत्ता से लेकर आई थी. बाबाजी के युवा शिष्यों में से एक ने शराब के साथ थोड़ी ज्यादा ही दोस्ती कर ली थी और वह बाकियों से कहीं ज्यादा तेज गति से उसे गटके जा रहा था. उसके वृद्ध गुरु ने उसे ओल्ड मोंक ज्यादा चढ़ा लेने के लिए कसकर डांट लगाई और फिर उसे सोने भेज दिया. मुझे बाबाजी की बात को समझने में थोड़ा वक्त लगा.

लेकिन फिर मैंने जब बाउल और वैष्णव साधुओं के साथ थोड़ा समय बिताया तो देखा कि यह बात खूब कही जाती है. थोड़ा-बहुत अंतर हो जाता था क्योंकि शराब—जो बांग्ला में माढ़ थी—वह गांजा या खाली नेशा का रूप ले लेती थी.

नेशा शायद हिंदुस्तानी के नशा लफ्ज से ही आया था—''आमि नेशा कोरि, नेशा आमाके कोरे ना'' यानी मैं नशा करता हूं, नशा मुझे नहीं करता. मतलब साफ था, नशीली चीजों का सेवल भले ही करो लेकिन उसे अपने सिर चढऩे न दो, नशे की लत को आपको काबू में करने न दो.

मैं उस परिवार और संस्कृति से आता था जहां शराब पीना अभिशाप समझा जाता था. मां-बाप में से कोई भी नहीं पीता था, खास तौर पर मां तो शराब पीने वालों को गलीज समझती थीं. उनके लिए शराब पीने वाले सभी नशेड़ी थे, वे चाहे कोई भी शराब पी रहे हैं और चाहे कोई भी हों—सिनेमा के पर्दे पर कोई अभिनेता, या रेस्तरां में बगल की मेज पर बैठा व्यक्ति या फिर कोई नजदीकी दोस्त.

दुनिया को लेकर इस शास्त्रीय भारतीय मध्यवर्गीय नजरिए में शालीनता और नागरिक नैतिकता पर दो तरफ से लगातार हमला हो रहा थाः एक तो गरीब और निचली जातियों से जिनके आदमी सारा पैसा शराब में उड़ा देते थे, और फिर पश्चिमी-विदेशियों से या पाश्चात्य भारतीयों से.

माता-पिता दोनों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था और कम से कम मां के लिहाज से तो हमें बाकी चीजों के साथ-साथ शराब की गुलामी से भी आजादी की जरूरत है. विचित्र बात यह है कि इस नजरिए में एक अजीबोगरीब घालमेल और भागीदारी भी देखने को मिली.

न केवल बंबई, कलकत्ता और मद्रास के पूरी तरह पाखंडी और गहरे शराबखोर कमर्शियल सिने-निर्माताओं ने बल्कि सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे कलकत्ता के गंभीर निर्देशकों ने भी किसी न किसी स्तर तक 'नाइटक्लबों' को खतरनाक शराबखोरी से पैदा हुई उच्च-वर्गीय, पश्चिमी नकल वाली लंपटता के गढ़ के रूप में दिखाया है.

दुनिया के उस नजरिए को लेकर बड़ा होते हुए, मां की तरह यह यकीन कर लेना स्वाभाविक था कि 'असली' भारत मोटे तौर पर शाकाहारी, गोमांस न खाने वाली, शराब न पीने वाली संस्कृति का था. बस वो तो कुछ घातक बाहरी असर के कारण उस संस्कृति पर कुछ दाग लग गए हैं.

वो तो जब मैंने थोड़ा-थोड़ा मांसाहार शुरू किया और अलग-अलग तरह की शराब चखने लगा तब जाकर मेरी आंखें खुलीं. भारत में ज्यादातर लोग मांसाहारी थे, और जो शाकाहारी थे उनमें से भी कई अपनी पसंद के कारण शाकाहारी नहीं थे—जैसे ही वे थोड़ी बेहतर आर्थिक हैसियत में पहुंच जाते थे, वे मांस खरीदना और खाना शुरू कर देते थे.

इसी तरह भारत में शराब की संस्कृति भी पुरानी रही है और यह अंग्रेजों के भारत आने से बहुत पहले की है.

लेकिन यह सब आगे जाकर विकृत और दफन हो गईं. एक तो अंग्रेजी राज के कारण और दूसरे, आजादी की लड़ाई की अर्ध-विक्टोरियाई नैतिकता के चलते जो इस सबका विरोध करती थी. नियमित रूप से शराब पीने का मतलब नियमित रूप से शराब के नशे में डूब जाना नहीं है और कभी-कभी शराब का सुरूर चढ़ जाने का भी यह मतलब नहीं कि आप शराबी हैं और समाज के लिए खतरा हैं.

जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, पाया कि भारत में शराब पीने की कई संस्कृतियां हैं. मसलन शहरी कामकाजी वर्ग में शराब पीना खासा तकलीफदेह है, तनाव पैदा करने वाला कारण जो दरअसल किसी गरीब व्यक्ति के अस्तित्व में तनाव और हिंसा की वजह बन जाता है.

मैं शुरू में जिस संस्कृति का हिस्सा बना वह 'शराब की शहरी मध्य-वर्गीय' संस्कृति कही जा सकती है. यह वो परिवेश था जिसमें शराब आम तौर पर शाम को खाने से पहले पी जाती थी, चाहे कोई खास मौका हो या न हो.

वहां दिन में शराब पीना केवल सप्ताहांत के लिए ही सीमित था. कॉरपोरेट हलकों में शराब पीना एक नियमित काम हो सकता है, तकरीबन काम से जुड़ा हुआ. पुराने शाही परिवारों में शराब एक अलग ही चीज थी जैसी कि शराब पीने वाले भारत के अति-संपन्न वर्ग के मामले में. वहां वह धन, नफासत और अंतहीन खाली समय का प्रतीक भी थी और अक्सर गले और जिगर के इर्द-गिर्द भारी प्राणघातक बोझ का भी. भारतीय समाज के बाकी तबकों में शराब पारंपरिक थी, गोवा से लेकर गुवाहाटी तक वह नियमित जीवन का भी हिस्सा थी और खास मौकों का भी.

समानांतर तौर पर भारत के जनजातीय तबकों के बारे में देखा जाए तो स्थानीय स्तर पर बनाई गई अरक या शराब उनके जीवन के बुनियादी ढांचे के केंद्र में थी. अंग्रेजी राज के ताबेदारों ने 19वीं सदी में इससे छेड़छाड़ की कोशिश की जिसके गंभीर नतीजे हुए.

तब कर्ज और शराबखोरी ने वहां जड़ें जमा लीं जो कि पहले कभी नहीं था. दक्षिण गुजरात में ऐसी ही एक स्थिति का सामना संयम-पसंद मोहनदास करमचंद गांधी को 1920 के दशक के शुरुआती सालों में करना पड़ा.

आदिवासियों पर उनकी अपनी ताड़ी और महुआ बनाने पर तो रोक लगा दी गई, फिर शोषणकारी पारसी शराब निर्माताओं ने इन पारंपरिक शराबों को ज्यादा तेज बनाने के लिए इनमें औद्योगिक एल्कोहल मिलानी शुरू कर दी ताकि वे उनके स्टोरेज की अवधि बढ़ा सकें.

इससे आदिवासी ताड़ी की दुकानों के मालिकों का शिकार होने लगे. पहले तो वे कर्ज में डूबे और फिर जब उनके पास शराब खरीदने को भी पैसे नहीं बचे तो उनकी जमीनें छीन ली गईं. नशे की लत का शिकार होकर फिर वे उन्हीं जमीनों पर बंधुआ मजदूर बनकर काम करने लगे जिन खेतों के कभी वे मालिक हुआ करते थे.

जहां गांधी परहेज की वकालत करते रहे, उनके आसपास के कई नेता तब भी पीते रहे, भले ही थोड़ा संयम से ही सही. इसलिए कोई हैरत की बात नहीं थी कि मोतीलाल नेहरू जैसे शक्चस ने उन्हें एक काफी विनम्र लेकिन स्पष्ट खत लिखकर कहा कि अपने विवेक में वे कभी भी शराब बिल्कुल बंद करने पर सहमत नहीं हो सकते.

हम जानते हैं कि भारतीय शराब पीकर रहेंगे चाहे वो उन्हें वैध-अवैध रूप से प्लास्टिक के पाउच में मिलती हो या गैस के सिलेंडरों में या कोई शराब तस्कर उसे उनके घर पर ही पहुंचा जा रहा हो. हम जानते हैं कि पहले की तुलना में कहीं ज्यादा भारतीयों का उन संस्कृतियों से संपर्क हो रहा है जहां शराब पीना या मांस खाना कोई वर्जना नहीं है.

हम यह भी जानते हैं कि हम इन अलग संस्कृतियों के लोगों को अपने यहां निवेश के लिए बुलाना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि उनके लोग आएं और उन फैक्टरियों व बंदरगाहों में काम करें जो वे स्थापित कर रहे हैं.

हमारे कायर व गलत दिमाग वाले नेता इस बारे में कुछ नहीं करेंगे क्योंकि उनकी निगाहें अल्पावधि फायदों पर हैं. लेकिन हम जानते हैं कि हमें आजादी चाहिए शराब के बारे में 19वीं की धारणाओं और 20वीं सदी की भारतीयों की पीने के तौर-तरीकों से.

रुचिर जोशी लेखक, फिल्मकार और स्तंभकार हैं

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