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देहरादून: पहाड़ों से है टक्कर

पहाड़ों की गोद में बसे इस शहर में इमारतों की होड़ अब पर्वतों से आगे निकलने की है.

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प्रवीण कुमार भट्टदेहरादून, 12 March 2013
देहरादून: पहाड़ों से है टक्कर देहरादून में फ्लैट

बारह साल पहले तक देहरादून में फ्लैट और अपार्टमेंट बनाने की बात कोई सोचता भी नहीं था. वर्तमान में यहां देश के अधिकांश नामचीन बिल्डर अपार्टमेंट बनाने में जुटे हैं. शहर का नया मास्टर प्लान लागू होने के बाद तो रियल एस्टेट कारोबार उछाल के साथ ही नई ऊंचाइयां भी छू रहा है.

2025 तक के लिए चार साल पहले लागू किए गए मास्टर प्लान में रिहाइशी इमारत की अधिकतम ऊंचाई बढ़ाकर 21 मीटर कर दी गई है. बिल्डर इस फॉर्मूले को जी प्लस सेवन कहते हैं यानी अब वे ग्राउंड फ्लोर या बेसमेंट से ऊपर सात मंजिल और बना सकते हैं. चार साल के भीतर ही देहरादून में 21 मीटर के एक दर्जन से अधिक हाउसिंग प्रोजेक्ट बन गए हैं. वैसे जितने प्रोजेक्ट बन रहे हैं, सब 21 मीटर ऊंचाई का दावा कर रहे हैं.

दो कंपनियों सीआरएस बिल्डर्स और अपोर्ट के राजपुर रोड, सहस्रधारा बाइपास पर साझ प्रोजेक्ट प्रथम प्रीमियम वैली अपार्टमेंट के मार्केटिंग मैनेजर अभिनय कुमार कहते हैं, ''जब हमने इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव दिया था, तब ऊंचाई की सीमा 21 मीटर से कम थी. लेकिन बाद में मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) ने नए मास्टर प्लान के तहत ग्रुप हाउसिंग की ऊंचाई सीमा बढ़ाई तो हमने भी इसे बढ़ाकर 21 मीटर कर दिया. अब हम 21 मीटर की ऊंचाई तक सात मंजिला अपार्टमेंट बना रहे हैं.” एमडीडीए देहरादून में केवल 21 मीटर की ऊंचाई तक के ही टावर पास करता है. तीन साल पहले तक चार मंजिला भवनों पर अटके बिल्डर अब फटाफट सात मंजिला टावर बना रहे हैं. सहस्रधारा रोड, हरिद्वार बाइपास, जीएमएस रोड, और वसंत विहार में ऐसे टावर बन चुके हैं.

देहरादून में जमीन के बढ़ते दाम ने लोगों को ऊंची इमारतों में बसने के लिए मजबूर किया है. लोग वसंत विहार, सहस्रधारा रोड, जीएमएस रोड और रेसकोर्स वैली जैसे पॉश इलाकों में रहना तो चाहते हैं, लेकिन यहां महंगी जमीन खरीदकर उस पर मकान बनाना फ्लैट खरीदने के मुकाबले 25 फीसदी ज्यादा महंगा पड़ता है. कृषानी इन्फ्रास्ट्रक्चर के मालिक संजीव सिंह इस गणित को कुछ इस तरह समझते हैं, ''देहरादून के पॉश इलाकों में 200 गज का प्लॉट लगभग 40 लाख रु. का मिलेगा, जिस पर मकान बनाने की लागत 30 लाख रु. होगी, इतना ही बड़ा फ्लैट 70 की बजाए 50 लाख रु. तक में मिल जाएगा.” देहरादून में ऊंची इमारतें बनाने का चलन नए मास्टर प्लान के बाद ही शुरू हुआ है.

नए जमाने के इस अपार्टमेंट कल्चर से देहरादून की रौनक तेजी से बदल रही है. एक दशक पहले तक देहरादून को रिटायर्ड लोगों का शहर समझ जाता था. लेकिन अब ज्यादातर रिटायर्ड लोग ही विला या बंगले की जगह फ्लैट को प्राथमिकता दे रहे हैं. 60 वर्षीय डॉ. वी.वी. त्यागी एम्स में अपनी सेवाएं देने के बाद अब उत्तराखंड सरकार के स्वास्थ्य महकमे से जुड़े हैं. सहस्रधारा रोड में ग्रीन व्यू अपार्टमेंट की चौथी मंजिल पर रह रहे डॉ. त्यागी कहते हैं कि वे जिंदगी भर प्राइवेट हाउस में रहे, लेकिन जो मजा फ्लैट में रहने का है, वह प्राइवेट हाउस में नहीं है.

ऊंची इमारतों के निर्माण के साथ उनकी कीमतें भी आसमान छू रही हैं. देहरादून में ऊंची बिल्डिंग बन तो रही हैं, लेकिन केवल 21 मीटर की ऊंचाई और सात मंजिल की बाध्यता बिल्डरों को रास नहीं आ रही है.

देहरादून में 650 करोड़ रु. की लागत से एक मेगा प्रोजेक्ट बना रहे यूनीटेक गु्रप के बिजनेस हेड संजीव जैंतका कहते हैं, ''जमीन कम हो रही है और आबादी बढ़ रही है. शहर का विस्तार सीमित है. सरकार ने जैसे ऊंचाई सीमा बढ़ाकर 21 मीटर की, भविष्य में इसे और बढऩा ही है.” वहीं इसका समर्थन मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण के नगर नियोजक आर.पी. सिंह भी करते हैं, ''भूकंप जोन बताकर गु्रप हाउसिंग की सीमा रोक नहीं सकते. जापान तो उत्तराखंड और देहरादून से भी ज्यादा डेंजर जोन में है. तब वहां 100 मंजिला इमारतें कैसे बन रही हैं.”

यहां कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स का क्रेज भी बढ़ा है. राजपुर रोड, चकराता रोड, आइएसबीटी में कई ऊंचे कॉम्पलेक्स बने हैं. राजपुर रोड पर बना स्टेनमैक्स देहरादून का सबसे ऊंचा मॉल है. देहरादून में भवनों के नक्शे पास करने और उनकी खामियों की जांच का काम एमडीडीए करता है. एमडीडीए के सीनियर इंजीनियर विनोद चमोली कहते हैं, ''भूखंड की भली-भांति जांच-परख करने के बाद ही नक्शा पास किया जाता है.” चमोली के मुताबिक, देहरादून भूकंप जोन 4 में है, इसलिए यहां अधिकतम ऊंचाई 21 मीटर तय की गई है.

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