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मेरे हीरो दारा सिंह थे

दोनों ने दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ाई की. दोनों स्वतंत्र-समानांतर भारतीय सिनेमा के अहम चेहरे रहे हैं. दोनों ने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में भी अपने को आजमाया. अपनी-अपनी पीढ़ी के बेहतरीन अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और इरफान बता रहे हैं कि आखिर वे क्या चीजें थीं जिन्होंने उनको और उन्हें अभिनय को प्रेरणा दी.

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सरोज कुमार / संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 19 December 2017
मेरे हीरो दारा सिंह थे कला का शिल्प नसीर और इरफान

नसीरुद्दीन शाहः इरफान का सफर मुझसे दिलचस्प और मुश्किल रहा है. खुशकिस्मती से मैं उस वक्त मुंबई पहुंचा था जब सीरियस सिनेमा उभरना शुरू ही हुआ था. सारा आकाश (1969) को बड़ी कामयाबी मिली थी. अंकुर (1975) तो बॉबी के साथ एक ही दिन रिलीज हुई थी और 25 हफ्ते चली. मैं खुशकिस्मत था कि हरदिल अजीज और चॉकलेटी चेहरे वाला न होने के बावजूद मेरे जैसे अभिनेता भी उस दौर की जरूरत थे. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलाणी और केतन मेहता सरीखे लोग फिल्में बना रहे थे तो मुझे भी काम मिलता रहा.

इरफानः मैं नसीर साब और दिलीप कुमार साब से बेहद इंस्पायर्ड था. मैं खुद को साबित करने के लिए इस इंडस्ट्री में आया था और किसी दिशा की तलाश में था. नसीर साब की परफॉर्मेंस ने उस ओर इशारा कर दिया. मुझे समझ आ गया कि जिंदगी और किरदार हमारे सब्जेक्ट हैं. मैं जिस वक्त मुंबई पहुंचा, समानांतर सिनेमा का पूरा आंदोलन दम तोड़ रहा था. मैं उसका हिस्सा बना. गोविंद निहलाणी के साथ एक फिल्म की. फिर वह आंदोलन भी दम तोड़ गया.

फ्रंट रो में बैठकर, सीटियां बजाने का, अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी की फिल्मों का जमाना आ पहुंचा. मैं इंतजार करता रहता था कि किसी फिल्म में 2-3 मिनट वाला ही कोई रोल मिल जाए या किसी का गुर्गा ही बन जाऊं. मैं आया तो था फिल्में करने लेकिन खप गया टीवी में, जो सचमुच बहुत बोरिंग था. मुझे इंतजार था कि किसी दिन सुभाष घई फोन करके पूछेंगेः ''ये लड़का कौन है सीरियल में.'' मैं उनके फोन का इंतजार करता रहा पर साला कभी आया ई नहीं.

इस फिल्म मंडी में आने के बाद मेरा स्ट्रगल यह था कि मैं अपनी इंस्पिरेशन को किसी तरह जिदा रखूं. दिल्ली में कम से कम सिनेमा और थिएटर था. इसी मोड़ पर मुझे एहसास हुआ कि ऐक्टर बनने की हूक भीतर से नहीं उठी बल्कि गढ़ी हुई चाहत है, जिसके लिए मुझे इंस्पिरेशन बनाए रखनी होगी. इसी की खातिर मैंने अपनी पहली कमाई से वीसीआर खरीदा और खुद को एंगेज रखने के लिए फिल्में देखने लगा.

नसीरः किसी मोड़ पर कोई पछतावा या कोफ्त हुई? खुद पर शुबहा?

इरफानः यही लगता था कि यार! इसमें कहीं मैं फिट हो पाऊंगा? मैं दूसरे ऐक्टर्स को देखता और उनके साथ खुद को कंपेयर करता—देखता कि मेरा चेहरा मिठुन चक्रवर्ती से मिलता है या नहीं. मैं उनके डायलॉग दोहराता क्योंकि मृगया (1976) में वे टिपिकल हीरो नहीं बल्कि एक नक्सली बने थे.

नसीरः मिठुन की तरह बोल सकते हो?

इरफानः बिल्कुल. (नकल करते हुए) वो जो बैठा है तुम्हारा राजा बाबू, उससे पूछो कि क्यूं मारा?

नसीरः जब आप छोटे-मोटे रोल कर रहे थे तब कभी ख्याल में आता था कि अब कामयाब होने से रहे?

इरफानः आइ थिंक मैं कफन बांध के आया था. मेरे पास दूसरा ऑप्शन था ई नहीं. परिचितों ने सुझाया था कि एमए करके कोई नौकरी कर लो, फिर ट्राइ कर लेना. मैंने कहा, सवाल ई नहीं. मैं इस क्राफ्ट को सीखने के लिए पागल था. एनएसडी न होता और आप न होते, तो मुझे नहीं लगता कि मैं यहां आया होता. मैं एनएसडी जाना चाहता था जबकि अप्लाइ करने के लिए जरूरी तादाद में नाटक भी मैंने नहीं किए थे.

नसीरः एनएसडी से पहले आप कहां थे?

इरफानः जयपुर (राजस्थान). कॉलेज में हम यूं ही आवारागर्दी करते रहते थे.

नसीरः कॉलेज में नाटक किए थे?

इरफानः एक ई बड़ा नाटक किया था. रवि चतुर्वेदी ड्रामा स्कूल से आए थे. उन्होंने एक स्वीमिंग पूल के किनारे पेड़ की लोकेशन चुनी, बोले 'क्यूं मुझे सूट करता है'. वहीं उन्होंने ओपन एअर ऑडिटोरियम बनाया. सीरियस नाटक का वह मेरा पहला अनुभव था. उससे पहले मैं फिल्मी नाटक कर रहा था, जैसे जलते बदन. सारे करतब करने होते थे. गाना सुनकर गिलास रेडियो पर फेंकना होता था, जिस पर गाना रुक जाता. मैंने गिलास फेंका लेकिन वह रेडियो के केस से होता हुआ बाहर निकल गया और गाना बजता ही रहा. खैर, फ्रस्ट्रेशन बाद में आया. ऐक्टिंग से ऊब होने लगी. टीवी में आप वही कॉन्फिलक्ट बार-बार रिपीट करते हैं. आप इंप्रूवाइज करना चाहें तो करने न देंगे.

नसीरः ऐसे में तो कोई भी दारू पीकर दुनिया-जहान को भला-बुरा कहने लगता है. आपके भीतर वह तल्खी कैसे नहीं आई?

इरफानः मैं एक ही चीज पर काम करता रहा, और वह थी मेरी परफॉर्मेंस. एनएसडी से आया तो अपने काम से मैं बहुत मुतास्सिर नहीं था. लगा कि मेरे पास अनुभव तो है नहीं, बस चीजों को मैनिपुलेट कर रहा हूं. वही एक खुनक मुझे आगे लिए जा रही थी. मैं ऐडिटिंग से बोर हो रहा था कि तभी कुछ-कुछ होने लगा. जब कुछ डायलॉग और सिचुएशंस से बोर होने लगा तो एकाएक लगा कि भीतर जैसे एक सुकून शक्ल ले रहा है. बस मुझे लगा, यई है.

किस्मत से कुछ अच्छी फिल्में मिल गईं. मैंने हासिल की, उसी की वजह से मकबूल मिली. बड़ी इंटरेस्टिंग बात है, बोरियत से मुझे वह सुकून मिला, जो कि बतौर एक ऐक्टर जरूरी होता है. वरना आपके हाथ में हमेशा एक चार्ट होता है और दिमाग में डिजाइन, ये करना वो करना. यूं कहिए कि जब वह प्लान मेरे हाथ से खिसकने लगा और मैं यूं ही अपने अंदाज में कुछ करने लगा तो मुझे ऐडिटिंग में मजा आने लगा.

नसीरः ऐक्टर्स का अपने काम के बारे में अपना अलग एसेसमेंट होता है लेकिन मैं इरफान के बारे में कुछ शेयर करना चाहूंगा. पहली दफा प्राइवेट डिटेक्टिव में हमने साथ काम किया था पर उसमें हमारे साथ वाले सीन नहीं थे. फिर हम मैकबेथ पर आधारित मकबूल में साथ आए. मैकबेथ में बैंको का भूत आने वाला सीन एक पार्टी का है, मकबूल में इसे जनाजे के सीन में तब्दील कर दिया गया है. लाश लाए जाने पर बैंको आंखें खोलता है. इरफान वह सीन कर रहे थे. मैं साथ ही था. उस (भूत आने वाले) लम्हे में ये पीछे गिरते हैं. मुझे लगा कि ये सचमुच गिर पड़े हैं. मैं मदद के लिए लपका तो ये बोले, 'ऐडिटिंग कर रहा हूं.' वो मेरा पहला सीन था इनके साथ.

इरफानः इसमें शक नहीं, नसीर साब से पूरी एक पीढ़ी इंस्पायर हुई है.

नसीरः ठीक है, कुबूल कर लेता हूं ये कॉम्प्लीमेंट.

इरफानः इनका काम देखने का मुझे इंतजार रहता था. हॉल में ज्यादा लोग नहीं होते थे, मैं शहंशाह जैसा महसूस करता, लगता कि सब कुछ मेरे लिए हो रहा है. बाजार (1982) मुझे अब भी याद है, हालांकि ये उसको लेकर क्रिटिकल रहे हैं, जानना चाहूंगा कि क्यों?  और दिलीप साब की कौन-कौन-सी फिल्में आपको पसंद आईं?

नसीरः मुझे चारों खाने चित किया था गंगा जमुना (1969) ने. उससे पहले मैंने उनकी आजाद (1955) और उडऩखटोला (1955) नैनीताल में देखी थीं, जब मैं छह-सात साल का ही था. मैंने महसूस किया कि किसी काबिल डायरेक्टर के निर्देशन में काम करने पर वे कमाल की ऐडिटिंग करते हैं. मुझे लगता है, मुगले आजम (1960) में उन्होंने अपनी बेस्ट परफॉर्मेंस दी. मैंने पहली बार इसको उस वक्त देखा था जब स्कूल में पढ़ता था, तब मुझे बहुत बोरियत हुई थी.

वे मधुबाला को शुतुरमुर्ग के पंख की नोक से बस सहलाते रहते थे. मैं सोचता था कि वे क्यों नहीं आगे बढ़कर उन्हें गले लगाते हैं, किस करते हैं. बाद में मुझे लगा कि मुगले आजम हिंदी सिनेमा की बेमिसाल फिल्मों में से एक है. मैंने जब उन्हें यह बात बताई तो बे बस चुपचाप घूरकर रह गए. कभी मुलाकात हुई दिलीप साब से?

इरफानः मिलना तो चाहता था पर अब ये कहां मुमकिन है. एक दफा वे एक मुहूर्त में आए थे, वहां उन्होंने जिस प्यार से अपना हाथ मेरे सिर पर रखा, उसे अब भी महसूस करता हूं.

नसीरः इन लोगों से सच में मिलना किसी ख्वाब-सा लगता है. मैं उनसे मिला, फिर देव साब से, शम्मी कपूर और दारा सिंह से मिला—ये वे ऐक्टर थे, जिन्हें देखते हुए मैं बड़ा हुआ था. आपने जिन शम्मी कपूर को परदे पर अदा के साथ नाचते, दिलीप कुमार को गरजते हुए या देव साब को उनकी अदा में हैरत के साथ देखा हो, और फिर एक दिन आप खुद भी उसी स्पेस में अपने को पाएं तो यह सब यकीनन निहायत सपने जैसा लगता है. मुझे तो देव साब के साथ तीन फिल्मों में काम करने का मौका मिला. मुझे नहीं लगता कि अगर वे उनकी फिल्में न होतीं तो मैंने वे की होतीं. लेकिन उनके चार्म का मैं भी दीवाना था. मुझे लगता है, गाइड अब तक की महानतम हिंदी फिल्म है.

इरफानः लेकिन गाइड तो...

नसीरः हां हां, डायरेक्टर तो उसके विजय आनंद हैं लेकिन उसमें देव साब की परफॉर्मेंस कमाल की है. और उनकी पुरानी ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्मों के तो क्या कहने! टैक्सी ड्राइवर (1954), तेरे घर के सामने (1963), नौ दो ग्यारह (1957). और फिर शम्मी कपूर से मुलाकात एक और अहम लम्हा थी.

इरफानः कभी उनकी तरह डांस करने का ट्राइ किया आपने?

नसीरः किया, और उसका सुबूत है सितम  (1982) फिल्म, जिसमें स्मिता पाटील भी हैं. उसमें शम्मी साब के पांच गानों पर मैंने डांस किया. फिल्म करने से पहले मैं उनके पास पूछने के लिए गया कि वे यह सब कैसे कर लेते हैं. उनका जवाब था, ''मैं इन डांस डायरेक्टर्स की रत्ती भर भी परवाह नहीं करता, उल्लू के पढ़े हैं सब. मैं वही करता था जो मुझे अच्छा लगता था. म्यूजिक मुझे हमेशा से पसंद रहा है और मैं पूरे वक्त ये गाने सुनता रहता हूं, चाहे वह तारीफ करूं क्या हो या दिल दे के देखो. मैं इन्हें सुनता हूं और उन्हीं पर थिरकता रहता हूं.'' मुझे लगा कि उन्होंने तो जैसे रास्ता ही दिखा दिया. मैं कोई नाटक करते वक्त भी ऐसा ही करता हूं.

मैं उसे तब तक पढ़ता रहता हूं, जब तक कि उसकी लाइनों पर मेरे शरीर में हरकत न होने लगे. तो शम्मी साब ने ये किया. और अगर आप उनके गाने देखें तो आप पाएंगे कि मुंबई का हर कोरियोग्राफर ऐक्टर्स से आज भी ऐसा ही करवाता है. शम्मी कपूर ने हिंदी फिल्मों में गानों के पिक्चराइजेशन की फॉर्म मुहैया की है. अनट्रेंड डांसर होते हुए भी रिद्म और लचीलापन उनमें इस कदर समाए हुए थे, कि वे अपने से मूव बना लेते थे. एक बार उन्होंने मुझसे कहा, ''खुद को उसी तरह से अप्लाइ किया करो, जैसा कि मंथन (1976) फिल्म में किया था. मैंने वह सब देखा है.'' मैं तो फूला न समाया. मेरे लिए तो इससे बड़ी कोई तारीफ नहीं हो सकती थी. जब मैं कहता हूं कि शम्मी कपूर और दारा सिंह मेरे पसंदीदा ऐक्टर हैं तो लोगों को लगता है कि मैं मजाक कर रहा हूं.

इरफानः दारा सिंह किसलिए?

नसीरः क्योंकि मेरा बचपन का मजा तो वही थे. मैं उन्हीं के जैसा बनने के ख्वाब देखता था. जब मैंने शम्मी कपूर को डांस करते हुए देखा तो लगा कि मैं तो ऐसा कभी न कर पाऊं. जब दारा सिंह को मैंने लड़ते हुए देखा, तो वो एक ही लड़ाई के लगातार चलते शॉट्स जैसा था...आजकल जो आप टीवी पर डब्ल्यूब्ल्यूएफ में देखते हैं, वह सब कुछ दारा सिंह और किंग कांग की फिल्मों में होता था. मुझे लगा कि ये तो मैं कर सकता हूं. कोई इमोशन जब मैं किसी महान अभिनेता को अभिनीत करते हुए देखता हूं तो मुझे हमेशा लगता है कि यह मेरे बस का नहीं. द ओल्ड मैन ऐंड द सी (1958) में जब मैं स्पेंसर ट्रेसी को देखता हूं तो लगता है कि नहीं, मैं ऐसा न कर पाऊंगा. यही वजह है कि चार्ली चैप्लिन सबसे महान अभिनेता माने जाते हैं क्योंकि जो उन्होंने किया, वैसा कोई न कर पाएगा. आपने वैसा करने की कोशिश की तो आपकी पसलियां बराबर हो जाएंगी.

इरफानः मुझे अब भी याद है, दारा सिंह एक फिल्म में टेलीग्राम से भी तेज दौड़कर पहुंचते हैं (हंसते हुए).

नसीरः और यह उन्हीं की कुव्वत कहिए कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री जब एक निहायत बुरे दौर से गुजर रही थी, तो उन्होंने ही उसको बचाए रखा. देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर बुढ़ा गए थे और सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र जैसे अभिनेता टॉप पर जा बैठे थे. उनकी एक फिल्म थी आया तूफान (1964), जिसमें वे अंधे बने हैं. स्पर्श (1980) में मेरा अभिनय उन्हीं को एक ट्रिब्यूट है. उन्हीं से मैंने सीखा कि एक अंधे आदमी के कैसे हावभाव होते हैं. कर्मा (1986) की शूटिंग के वक्त आखिरकार उनसे मुलाकात हुई. पर ये बताओ, ये कैरेक्टर बन जाने का क्या माजरा है?

इरफानः आप कभी भी पूरी तरह वो कैरेक्टर नहीं बन सकते, कहीं न कहीं आपको अपना पर्सनल दिखाना पड़ता है, खासकर जब वह आपकी चाहत न रहा हो.

नसीरः ये कैसे कह रहे हो, फिर आपकी चाहत क्या थी?

इरफानः बिजनेसमैन बनने की, या यूं ही कहीं काम करना चाहता था.

नसीरः फिर ये ऐडिटिंग का चस्का कब लगा?

इरफानः मुंबई में टेक्निकल ट्रेनिंग के बाद मुझे एअरकंडिशनर की रिपेयरिंग के लिए जाना पड़ता था. तब लगा कि ये नहीं हो पाएगा. जो जंचे वो करो, पैसा तो उसका बाइप्रोडक्ट है.

नसीरः आपको याद है, किसके घर एअरकंडिशनर ठीक करने गए थे?

इरफानः राजेश खन्ना के घर.

नसीरः ओ हो हो. आपके वाल्दैन ने इस पर क्या कहा?

इरफानः फादर का इंतकाल हो चुका था, इसलिए उनको तो कभी बता न सका, मदर कहा करती थीं कि आ जाओ, भाइयों के साथ ही कुछ काम करो. एक दफा मैं उनको द नेमसेक के प्रीमियर में ले गया, सोचा कि उन्हें मजा आएगा. देखने के बाद वे बोलीं, ''हां है तुम्हारा डायरेक्टर? उस कमबखत को मेरा ही बच्चा मिला था मारने के लिए?''

नसीरः मेरी मदर को मिर्च-मसाला (1987) से नफरत थी, कहती थीं 'तौबा तौबा तौबा, ऐसे वाहियात रोल मत किया करो'.

इरफानः और ओए ओए? उसके बारे में भी तो कुछ बताइए.

नसीरः देखो, हम ऐक्टर इसलिए बनते हैं क्योंकि हम लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं. मुझे तो बिल्कुल यकीन नहीं था कि ये फिल्म (त्रिदेव, 1989) चलेगी. मैं रत्ना (पाठक शाह, उनकी बेगम) के साथ एक सिनेमाहॉल में दाखिल हुआ और तभी वह गाना आ गया. भाईसाब, लोग-बाग पागल हो गए. इस गाने ने मेरा करियर 10 साल बढ़ा दिया. और फिर 10 साल ऊ ला ला (डर्टी पिक्चर, 2011) ने.

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