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देश का मिज़ाज-मोदी की माया

देश के लोगों की नजर में महाबली मोदी दूसरों से श्रेष्ठ, कम से कम इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स देश का मिज़ाज 2019 जनमत सर्वेक्षण के नतीजे ऐसा आभास देते हैं, मानो वे कुछ गलत कर ही नहीं सकते

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aajtak.in
राज चेंगप्पा नई दिल्ली, 21 August 2019
देश का मिज़ाज-मोदी की माया इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास और फोटो इमेंजिग अमरजीत सिंह नागी

ऐसा बमुश्किल ही होता है कि किसी मुल्क का मुकद्दर उसके मुखिया के साथ गहराई से जोड़कर देखा जाए. हाल तक देश की उन सबसे बड़ी और महान राजनैतिक हस्तियों की फेहरिस्त महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी तक ही सीमित हुआ करती थी. कुछ अन्य नेता जो इस त्रिमूर्ति के करीब  पहुंचे, वे थे: अटल बिहारी वाजपेयी, राजीव गांधी, नरसिंह राव और कुछ वक्त के लिए मनमोहन सिंह भी, जब वे दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए. लेकिन ये लोगों के दिलों में पूजनीय का दर्जा नहीं पा सके.

हालांकि अब उस परम सत्ता के एक नए दावेदार का उभार हो रहा है, नरेंद्र दामोदरदास मोदी. हम अपने नेताओं को जिस आकार के स्क्रीन और जिस रंग में देखते आए हैं, दोनों में बहुत बदलाव हुए हैं.

कूबड़ जैसी पीठ वाले टेलीविजन सेटों पर उभरती लाल-भूरी आभा वाली गांधी और नेहरू की तस्वीरों और इंदिरा की चंचल काली-सफेद छवियों से बात काफी आगे निकल चुकी है. अब हम नेताओं को हथेली के आकार की स्क्रीन पर देखते हैं, उनके तीखे ट्वीट्स के माध्यम से उन पर नजर रखते हैं और उनसे पहले से कहीं अधिक करीब से जुड़े हैं.

मोदी ने जिस प्रकार लोगों से जुडऩे में महारत दिखाई है, ऐसा आज तक कोई दूसरा भारतीय नेता नहीं कर सका है. नतीजतन, केवल पांच वर्षों में उनका व्यक्तित्व हमारी सामूहिक चेतना में 70 मिमी की फिल्मी स्क्रीन से भी बड़ा हो चुका है.

पौराणिक जर्मन देवता थॉर (हॉलीवुड ने हाल के दिनों में उन्हें लोकप्रिय बनाया है) की तरह, मोदी अब वह माने जा रहे हैं जो बादलों की गडग़ड़ाहट और बिजली की चमक पैदा कर सकता है.

वे ऐसे तूफान हैं जो मतदाताओं के पैरों और नजरों, दोनों का अपने मनचाहा तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं. वे अब महज मंच के केंद्र में नहीं, बल्कि खुद मंच बन गए हैं. मोदिस्तान में आपका स्वागत है.

ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब प्रधानमंत्री अभिनीत कोई नाटकीय दृश्य हमारी आंखों के सामने न आता हो. मोदी ने राष्ट्र को यह बताने के लिए संबोधित किया कि उन्होंने आजादी के बाद से कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष दर्जे को रद्द करने जैसा महत्वपूर्ण निर्णय क्यों लिया.

मोदी ने संसद में 2025 तक देश को 50 खरब डॉलर आकार की अर्थव्यवस्था बनाने के अपने सपने का बयान किया और उनके सहयोगियों ने मेजें थपथपाकर उनका समर्थन किया.

यह दीगर बात है कि 2014 में उनके सत्ता संभालने के बाद से ही देश की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है और फिलहाल देश सबसे बड़ी आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है.

राज्यसभा (जहां सरकार के पास बहुमत नहीं) में भी मोदी ने विपक्षी एकता की पोल खोलकर रख दी और तीन तलाक को अवैध घोषित करने वाला कानून आसानी से पारित करा लिया तथा इसे मुस्लिम महिलाओं के साथ लंबे समय से हो रहे भेदभाव की ऐतिहासिक भूल को सुधारने का प्रयास बताया.

मोदी का एक नया अवतार एक टीवी चैनल के लोकप्रिय शो में दिखता है. डिस्कवरी के शो के लिए वे हरी वर्दी पहने जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के जंगलों में विचरते दिखे. जब शो के ऐंकर बेयर ग्रिल्स, जिन्होंने मोदी को ''बेहद उदार' बताया, ने उनसे पूछा कि क्या वे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा करते थे, तो उन्होंने जवाब दिया, ''मेरा ध्यान हमेशा एक ही चीज पर रहा है, राष्ट्र का विकास. और मैं उस काम को करके संतुष्ट हूं.'' 

इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण से पता चलता है कि मोदी जिस तरह से अपना काम कर रहे हैं, उससे लोग न केवल संतुष्ट हैं, बल्कि उन्हें इस बात का भी पूरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री ने जो भी काम हाथ में लिए हैं उन्हें पूरा करके दिखाएंगे. 2019 के आम चुनावों में भाजपा के चुनाव अभियान की अगुआई करते हुए मोदी की 300 से अधिक सीटों के साथ सरकार में जोरदार वापसी करने के ठीक दो महीने बाद हुए इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि मोदी की लोकप्रियता आसमान छू रही है.

सर्वेक्षण में 71 प्रतिशत ने प्रधानमंत्री के रूप में उनके प्रदर्शन को 'अच्छा' और 'उत्कृष्ट' बताया. यह नवंबर 2016 में उनके नोटबंदी की घोषणा के तुरंत बाद कराए गए सर्वे में मिले 69 प्रतिशत से भी अधिक है. हालांकि, क्षेत्रों के लिहाज से मोदी की लोकप्रियता दक्षिण में उतनी नहीं है, जितनी देश के अन्य क्षेत्रों में. और जब यह विश्लेषण समुदायों के नजरिए से किया जाए तो गैर-हिंदुओं, विशेषकर मुसलमानों के बीच उनकी लोकप्रियता कम है.

याद रहे कि यह सर्वेक्षण मोदी सरकार के जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में ऐतिहासिक बदलाव करने से पहले कराया गया था. उस निर्णय के बाद उनकी रेटिंग और भी बढ़ गई होगी, क्योंकि सर्वेक्षण में 57 प्रतिशत ने कहा था कि भाजपा को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का घोषणापत्र में किया अपना वादा पूरा करना चाहिए. कश्मीर के फैसले से पहले ही जब उनसे पूछा गया कि सबसे अच्छा प्रधानमंत्री कौन है तो उन्होंने अन्य सभी प्रधानमंत्रियों—इंदिरा गांधी (14 प्रतिशत), अटल बिहारी वाजपेयी (11 प्रतिशत) और जवाहरलाल नेहरू (9 प्रतिशत) की तुलना में मोदी को कहीं अधिक, 37 प्रतिशत की रेटिंग दी.

मोदी के पास जनता की नब्ज पहचानने को जो हुनर है, वैसा हाल के इतिहास में किसी और नेता में नहीं है. इसके साथ मोदी का जबरदस्त आत्मविश्वास, गहरी प्रतिबद्धता, कड़ी मेहनत, बड़ा सोचने की क्षमता और उससे भी बड़ा जोखिम लेने की क्षमता, असाधारण संचार कौशल और कार्यों को बड़े नाटकीय अंदाज में संपन्न करने की प्रतिभा के मेल ने लगता है, उन्हें लोकप्रियता के मौजूदा शिखर तक पहुंचा दिया है. लोगों का मानना है कि मोदी कोई गलत काम कर ही नहीं सकते. अगस्त 2019 में देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के नतीजे इस सोच के स्पष्ट संकेत देते हैं.

फरवरी 2019 में पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद भारतीय वायु सेना के पाकिस्तान के बालाकोट में एक आतंकी शिविर पर जवाबी हमले को लें. हालांकि यह एक बड़ी खुफिया विफलता थी जिसके कारण कश्मीर में हमला हुआ, फिर भी चुनाव हारने का जोखिम या उससे भी बदतर पाकिस्तान के साथ युद्ध का जोखिम मोल लेकर मोदी ने हवाई हमले के लिए हामी भर दी, जिससे उन्हें जबरदस्त इच्छाशक्ति वाले ऐसे नेता के रूप में देखा गया, जो कड़वी गोली निगलने को तैयार रहते हैं. सर्वेक्षण में लोगों ने माना कि ताकतवर राष्ट्रवादी नेता और बालाकोट में हमले का साहस दिखाने के कारण लोगों ने उन्हें फिर से चुना.

नोटबंदी पर लोगों की प्रतिक्रिया उलझन भरी रही है. इससे पहले के देश का मिज़ाज सर्वेक्षणों में ऐसा देखा गया था कि काले धन को बाहर निकालने के नोटबंदी के घोषित उद्देश्य को लेकर शुरुआती उत्साह के बाद, आगे के सर्वेक्षणों में लोगों ने इस पर चिंता जताई थी क्योंकि इससे लोगों को निजी रूप से परेशानी तो उठानी ही पड़ी साथ ही साथ अर्थव्यवस्था को भी नुक्सान हुआ था और नौकरियों की कमी भी हुई थी. लेकिन मोदी लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए यह कदम आवश्यक था. और ऐसा लगता है कि लोगों ने उनकी बात को समझा और अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के प्रभाव की परवाह किए बिना चुनावों में उनका साथ दिया.

सर्वेक्षण में 41 प्रतिशत ने भ्रष्टाचार मुक्त शासन, नोटबंदी और काले धन पर वार को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना. सर्वे में ये तीनों बातंन मोदी की गरीबों के विकास और सामाजिक सुधार से जुड़ी योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना और हर घर में शौचालय बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान सरीखी कल्याणकारी योजनाओं से भी ज्यादा लोकप्रिय दिखती हैं. सरकार के प्रमुख विकास कार्यक्रमों के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में लोगों ने सरकार द्वारा उन कार्यक्रमों को लागू किए जाने के तरीकों को लेकर संतुष्टि जताई.

दिलचस्प यह है कि सर्वेक्षण में लोगों ने चार अन्य महत्वपूर्ण गुणों पर हामी भरी, जो मोदी को खुश कर सकते हैं, उन्हें गरीबों का हमदर्द, भ्रष्टाचार से मुक्त, जनता के साथ असाधारण जुड़ाव और सबका साथ, सबका साथ, सबका विश्वास (बावजूद इसके कि उनकी पार्टी 437 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन केवल सात सीटों पर मुसलमानों को खड़ा किया) में यकीन रखने वाले नेता के रूप में देखा गया है. विपक्ष की आलोचना है कि मोदी प्रचार के भूखे, अमीरों के पक्षधर, तानाशाह, मुस्लिम-विरोधी और हमेशा चुनाव अभियान के मोड में रहने वाले व्यक्ति हैं लेकिन सर्वेक्षण में लोगों ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है (राहुल गांधी, कृपया ध्यान दें).

जनवरी के देश का मिज़ाज सर्वे में, लोगों ने नौकरियों की कमी और किसानों की परेशानी को चिंताओं की सूची में सबसे ऊपर बताया था. इससे आम चुनाव में विपक्ष को मोदी पर हमले का बड़ा मुद्दा मिल गया था. लेकिन अगस्त के सर्वेक्षण में लोग विपक्ष के आरोपों से सहमत नहीं दिखे और मोदी की तुलना में विपक्ष के पास कोई नेता तक नहीं है. सर्वे में 50 प्रतिशत ने कहा कि विपक्ष की विफलता का मुख्य कारण यह था कि उसके पास मोदी की बराबरी का कोई प्रधानमंत्री चेहरा नहीं था और विपक्ष चुनावों में विभाजित भी दिखाई दिया. हालांकि सर्वेक्षण में लोगों ने माना कि किसानों का संकट और नौकरियों की कमी, दोनों ही देश के सामने बड़ी चिंताएं हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि मोदी में अर्थव्यवस्था का रुख बदल देने की क्षमता है और वे इन संकटों का समाधान निकाल लेंगे.

अगर आज चुनाव होते हैं तो भाजपा को जितनी सीटें मिलने का अनुमान है, उससे पता चलता है कि मोदी अजेय हैं. सर्वेक्षण के परिणाम भाजपा को 308 सीटों पर जीत का संकेत देते हैं जो पार्टी को हालिया आम चुनाव में मिली सीटों से पांच अधिक है और पार्टी के वोट शेयर में 37 प्रतिशत से एक प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है. हालांकि कांग्रेस के 20 प्रतिशत के वोट शेयर में तो कोई गिरावट नहीं दिखती लेकिन सर्वेक्षण में उसकी सीटों की संख्या मौजूदा 52 से घटकर 49 हो जाने के संकेत मिलते हैं. कांग्रेस के लिए एकमात्र राहत की बात यह है कि राहुल के अध्यक्ष पद छोडऩे के फैसले के बावजूद, पार्टी के वफादारों ने नेतृत्वविहीन पार्टी को अभी तक नहीं छोड़ा है.

यह पूछे जाने पर कि क्या वे मानते हैं कि कांग्रेस तेजी से गिर रही है, 50 प्रतिशत ने सहमति जताई. नेतृत्व के मुद्दे पर प्रतिक्रिया मिली-जुली थी: 49 प्रतिशत ने महसूस किया कि केवल गैर-गांधी, गैर-वंशवादी नेता ही पार्टी को पुनर्जीवित कर सकता है, लेकिन जब उनसे कांग्रेस के नेताओं की रेटिंग को कहा गया तो उन्होंने अन्य कांग्रेस नेताओं की तुलना में प्रियंका और राहुल, दोनों को ही अच्छी रेटिंग दी. मोदी के खिलाफ विपक्षी लड़ाई का नेतृत्व कौन कर सकता है, इसके जवाब में लोगों ने ममता बनर्जी को सर्वश्रेष्ठ विकल्प के रूप में देखा है, उनके बाद अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, नवीन पटनायक और शरद पवार आते हैं.

विदेश मामलों में भी मोदी चमकते दिख रहे हैं. लोग मोदी के इस नजरिए के भी हिमायती हैं कि जब तक आतंकवाद पर पूर्ण विराम नहीं लगता तब तक पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू नहीं होगी.

लोगों का मानना है कि ट्रंप के शासनकाल में अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में सुधार हुआ है. और यह भी कि मोदी सरकार के कार्यकाल में चीन के साथ संबंधों में धीरे-धीरे सुधार जारी है.

संपूर्ण शक्तिसंपन्न नेता और राष्ट्र पर उसके इतने बड़े भरोसे के कई फायदे हैं तो कई खामियां भी हैं. सबसे पहले, फायदों की बात करते हैं. अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही मोदी ने अपनी पार्टी और उसके संरक्षक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तीन प्रमुख मुद्दों के प्रति अपने संकल्प को जता दिया और उनमें से दो वादों को पूरा कर दिया: धारा 370 को समाप्त करना और समान नागरिक संहिता को लागू करना (तीन तलाक अधिनियम को इसके ही अंश के रूप में देखा जाता है).

कश्मीर पर फैसले से वहां खुशहाली आएगी या हिंसक प्रतिरोध और आतंकी हमले बढ़ेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा. एक अन्य मुद्दे, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए मध्यस्थता के विफल होने के बाद पार्टी उम्मीद कर रही है कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला उसके मनोनुकूल आएगा.

मोदी ने हिंदुत्ववादी समर्थकों को भरपूर खुश रखा है, मगर संकीर्ण सांस्कृतिक एजेंडे से परे जाकर विकास मॉडल पर ध्यान केंद्रित किया है जिसकी वकालत दीनदयाल उपाध्याय जैसे आरएसएस के नेताओं ने की है.

विकास और आर्थिक समृद्धि के लिए उनके इस दृष्टिकोण के साथ ही हाल के बजट में उनके साहसिक एजेंडे को भी समर्थन मिल रहा है, जिसमें देश को पांच वर्षों में 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प शामिल है.

फिर भी, जब अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए कड़े सुधारों की बात आई, तो मोदी धमाकेदार घोषणाओं की बजाए धीरे-धीरे कदम बढ़ाने को तरजीह देते दिख रहे हैं.

एक सहयोगी कहते हैं, ''प्रधानमंत्री दिशाहीन विघटनकारी उपायों की बजाए सही दिशा और स्थिर सुधारों की ओर ले जाने के प्रयासों में अधिक विश्वास करते हैं.''

लेकिन उन्हें इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि 50 खरब डॉलर के अपने सपने को पूरा करने के लिए कड़े सुधारों की ओर ही जाना होगा. ऑटो और रियल एस्टेट जैसे प्रमुख क्षेत्रों के अधर में लटकने के साथ आर्थिक मंदी की स्पष्ट चेतावनी मिल रही है और मोदी सरकार को इसका हल खोजना है.

इस तरह की लोकप्रियता और संसद में भारी बहुमत का एक खतरा यह है कि मतदाताओं की उम्मीदें बेहिसाब बढ़ जाती हैं. ऐसे में किसी भी नेता या सरकार के लिए जनता को संतुष्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है. जनता की असाधारण अपेक्षाओं का क्या परिणाम होता है, इसे सिर्फ भारतीय क्रिकेट टीम ही अच्छी तरह से जानती है. टीम की प्रशंसा और उसके खिलाड़ी तभी तक हीरो बने रहते हैं जब तक टीम जीतती रहती है.

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