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भारत के होकर भी अलग-थलग

देश के उत्तर-पूर्वी इलाके को देशभक्ति की घुट्टी नहीं पिलाई गई है, यहां के परिदृश्य पर उथल-पुथल और हिंसक इतिहास और एक-दूसरे से टकराती वफादारियों के जख्मों के निशान पड़े हैं.

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 12 August 2019
भारत के होकर भी अलग-थलग 72 वर्ष आजादी के

साल 1948 की बात है. रॉबर्ट रीड नॉर्थईस्टर्न प्रांतों के पूर्व राज्यपाल थे. वे नगा हिल्स (अब नगालैंड) जा रहे थे. भारत तब नया-नया आजाद हुआ था. बंटवारे से जुड़ी घटनाएं और उनके साथ आई उथल-पुथल और आघात यहां भी तेजी से सामने आ रहा था. नॉर्थईस्टर्न प्रांतों को लेकर राजनैतिक अनिश्चितता तो थी ही—इस विशाल उपमहाद्वीप में उनका भविष्य क्या होगा? इस संवेदनशील ऐतिहासिक लम्हे के बीच रीड कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे के हाथों एम.के. गांधी की हत्या की खबर सुनते हैं.

दु:ख और सदमे की हालत में वे अपने नगा मेजबान कोन्याक प्रमुख चंगराई को बताते हैं कि गांधी मर चुके हैं. असम पर अपनी किताब फ्रैग्मेंटेड मेमोरीज में यास्मीन सैकिया ने रीड और चंगराई के बीच हुई यह अहम बातचीत बयान की है. चंगराई हक्के-बक्के रह जाते हैं और कहते हैं कि उन्हें नहीं पता, गांधी कौन हैं. रीड उन्हें बताते हैं कि गांधी वही शख्स हैं जिन्होंने भारत को आजादी दिलाई है और उन्हीं की वजह से अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा. चंगराई टका-सा जवाब देते हैं: 'अच्छा, तो नगाओं की इस सारी परेशानी की जड़ वही हैं.''

यह लम्हा इस अंतर्विरोध को खूबसूरती से पकड़ता है कि भारत की आजादी और समान नागरिक के तौर पर हरेक शख्स की आजादी की हिफाजत करने का उसका वादा उस इलाके में क्या मायने रखता था जो नाइंसाफी और नाराजगी से गुजरा था. हिंदुस्तान की आजादी के फलस्वरूप इस पूरे इलाके में संप्रभुता के लिए नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी), मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ), यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (यूएलएफए या उल्फा) और पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) सरीखे कई देशज आंदोलन उठ खड़े हुए थे. इनके लिए चंगराई की बात बिल्कुल सही है, क्योंकि आजादी के अलग-अलग लोगों के लिए अलहदा मायने होते हैं.

उत्तर-पूर्व तेजी से अलगाव का शिकार हो गया और इसकी वजह थी जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस की अगुआई में भारत सरकार की हठधर्मिता, जिसने राष्ट्र को एक करने के लिए बातचीत और मतभेदों को जगह देने के बजाए संगठित सैन्य शक्ति को ज्यादा तरजीह दी. साफ हो गया कि मन का मिलन नहीं हुआ था. उन्हें एक थोपी गई भारतीय पहचान स्वीकार करनी पड़ी जिसने उनके सांस्कृतिक और राजनैतिक अनोखेपन और आकांक्षाओं को जगह देने से इनकार कर दिया. भारतीय राज्य ने इस इलाके को जिद्दी और उद्दंड भूभाग की तरह देखा; उन्हें इसे अपनी इच्छा के आगे झुकाना था.

सीधे 2019 में आइए. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पांच साल पहले की अपनी चुनावी जीत से भी आगे बढ़कर सरकार बनाई. भारत के उत्तर-पूर्व में उन्होंने असम, त्रिपुरा, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में सरकारें बनाईं और नगालैंड, मेघालय और मिजोरम में गठबंधन कायम किए जो नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (एनईडीए) का हिस्सा हैं. बहुत कम वक्त में उन्होंने क्षेत्रीय नजरिए के साथ राष्ट्रीय पार्टी की अपनी प्रमुख चुनावी विचारधारा के जरिए कांग्रेस को पीछे धकेल कर प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया. लेकिन अगर हमें समझना है कि क्या हुआ, तो हम मौजूदा तनावों को नजरअंदाज नहीं कर सकते. भाजपा एक संयुक्त भारत के परकोटे में उस इलाके को कैसे ला सकती है जिसके ज्यादातर हिस्सों ने इस एकता का विरोध किया है?

हाल की इन घटनाओं को समझने के तीन तरीके हैं. पहला, यह साफ है कि भारत की भूभागीय एकता को बनाए रखने के भाजपा के पुरजोर एजेंडे पर कोई समझौता नहीं हो सकता. 4 जून, 2015 को जब नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-खापलांग (एनएससीएन-के) ने भारतीय सेना पर हमले किए और डोगरा बटालियन के 18 जवानों को मार डाला, तो भारत के विशेष बलों ने इसका जवाब 10 जून, 2015 को भारत-म्यांमार सीमा पर एनएससीएन-के 100 से ज्यादा उग्रवादियों को मार कर दिया. बाहुबली राष्ट्रवाद अखाड़े में उतर चुका था.

भाजपा का रुख उन लोगों से भी आहत होता है जो उसके साथ  आमने-सामने बैठकर बातचीत करने को इच्छुक और तैयार हैं. एनएससीएन-इसाक/मुइवा (एनएससीएन-आइएम) के साथ 3 अगस्त, 2015 को हुए फ्रेमवर्क समझौते को 'राजनैतिक' दस्तावेज माना जाता है जो 'नगाओं के अनूठे इतिहास' का मूल्यांकन करता है. इस अनूठे इतिहास को सबसे पहले 2002 में भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वीकार किया था. फ्रेमवर्क समझौता भारत सरकार और एनएससीएन-आइएम के लिए आधार तैयार करता है, जिसके मुताबिक वे भारत-नगा स्थिति को लेकर अंतिम समझौते के लिए बातचीत आगे बढ़ा सकते हैं. उनका सारा संघर्ष उनके अनूठे नगा इतिहास से जुड़ा है, उसे स्वीकार करना उनकी शिकायतों को दूर करने की दिशा में पहला कदम है.

हालांकि यह पक्का नहीं है कि यह समझौता अव्वल तौर पर नगा नेताओं को इंतजार करवाने और थकाने का तरीका है ताकि वे घुटने टेक दें या 'नगाओं के अनूठे इतिहास' की वाजपेयी की स्वीकारोक्ति को राजनैतिक कार्रवाई में बदला गया है. बीते कुछ सालों में मैंने संघ परिवार (भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आरएसएस सहित हिंदू राष्ट्रवादियों के परिवार) के जिन कई कार्यकर्ताओं से बातचीत की है, वे इस इलाके के सैन्यकरण की वजह से पैदा ऐतिहासिक तकलीफ को स्वीकार करते हैं और इसलिए फ्रेमवर्क को स्वीकार करते हैं, मगर महज एक शांति समझौते के तौर पर जिसमें संप्रभुता का कोई जिक्र नहीं है.

भारत की भूभागीय एकता की बहुत ऊंची कीमत है जिसे इतनी आसानी से न्योछावर नहीं किया जा सकता. फैसला चाहे जो हो, चर्चा का केंद्र संघ परिवार ही रहेगा. या तो वे राज्य सत्ता के छल-प्रपंचों से नगा आंदोलन को दबाएंगे और उस चीज को कायम करेंगे जिसे राजनैतिक विज्ञानी जेक्वस सी. स्कॉट 'सीइंग लाइक अ स्टेट' कहते हैं, या फिर वे दिल जीतने की कोशिश में उनके वजूद के बारे में नगाओं के विजन को जगह देंगे. सेवा के दौरान अथक काम करने वाले संघ परिवार के कई कार्यकर्ता वे हैं, जिन्होंने लोगों की सनकों को उजागर किया है और जो भी तय होता है, उसके नतीजे भी उन्हें ही भुगतने पड़ सकते हैं.

दूसरे, भाजपा के उत्थान के साथ हिंदुत्व का एक इकहरा विचार आया है जो अब चौतरफा फैल गया है. इसका उस इलाके के लिए क्या मतलब है जिसने इकहरी पहचान थोपने की कोशिशों का विरोध किया है? हिंदुत्व 'स्वदेशी' का कार्ड खेलकर तमाम किस्म की जातीय, धार्मिक और भूभागीय संबद्धताओं के बीच जगह बनाने के लिए धक्का-मुक्की कर रहा है. 'स्वदेशीपन' के विचार ने पहले तो उन्हें 'धरती पुत्र' के तौर पर खुद को सामने रखने की सहूलत दी है क्योंकि धरती पुत्र होने का यह विचार इस इलाके के भी कई लोगों के मन में गूंजता है, जिनकी अपनी पहचान अपनी जमीन से गहराई से जुड़ी है. यह हिंदुत्व को उनमें भी फर्क करने की सहूलत देता है जो 'स्वदेशी' हैं और जो 'विदेशी' हैं.

ईसाइयत और इस्लाम, दोनों को विदेशी ताकत के तौर पर देखा जाता है, जो देश के भीतर घुस आए और भोले-भाले तमाशबीनों को बेवकूफ बनाकर ऐसी जीवनशैली दे रहे हैं जो देश के भौगोलिक नक्शे के लिए बिल्कुल पराई है. हिंदुत्व जहां इन ताकतों को अस्वदेशी बनाने की चेष्टा करता है, वहीं उसे इस इलाके में उन ईसाइयों को भी जगह देनी पड़ती है, जो अपने जुड़ाव और इस तरह अपनी संप्रभुता के आधार पर अपनी पहचान का दावा करते हैं. इनके अनुयायियों की यहां बहुत भारी तादाद है. इस गतिरोध को तोडऩे के लिए हिंदुत्व ईसाइयत को एक ऐसी आंतरिक गतिविधि के तौर पर परिभाषित करता है जो उसके अपने बाहरी राष्ट्रीय देशभक्त के स्वरूप (सभ्यता की ताकत के तौर पर हिंदू) के साथ सहअस्तित्व में रह सकता है. अलबत्ता वे मुसलमानों के प्रति हमेशा उदार नहीं हैं. यह नागरिकता संशोधन विधेयक में देखा जा सकता है.

2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर इस पूरे इलाके में विरोध की आग भड़क गई थी. यह विधेयक संबद्धता के उस स्वरूप का उदाहरण है जिसका विरोध किया जाता है. इसके मुताबिक उन अल्पसंख्यकों—जिनमें हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, सिख और यहां तक कि ईसाई भी आते हैं—हिंदुस्तान में फिर से बसाया जाएगा जो मुस्लिम बहुल देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान) से जुल्मो-सितम की वजह से भागकर आए हैं. अगर हिंदुत्व की ज्यादा बड़ी परिकल्पना में मुसलमान 'दूसरे' या पराए हैं तो नागरिकता संशोधन विधेयक या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी, असम में) को लेकर चल रही  बहसों में भला क्या जगह होगी? क्या इस किस्म की व्यवस्थाएं उन्हें साफ तौर पर बहिष्कृत कर देंगी, फिर भले ही उनमें से कइयों के घर भारत में हों?

नागरिकता को लेकर दो ध्रुवों में बांटने वाली इन बहसों का लुब्बोलुबाब समझा जा सकता है. द हिंदू के मुताबिक, नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी दोनों को भाजपा, 'बांग्लादेशी मूल के मुसलमानों को ऐतिहासिक तौर पर आप्रवासियों के प्रति एलर्जिक रहे राज्य से बाहर रखने' के तरीके समझती है. बताया जाता है कि तब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह ने कहा था कि 'भाजपा को लगा कि यह विधेयक असम को कश्मीर की तरह मुस्लिम बहुल राज्य बनने से रोकने के लिए जरूरी है'. इस समूचे इलाके में केवल अपने अधिकार के दावे पर आधारित स्वदेशी की राजनीति का बढ़ता उभार शाह के बताए इन विचारधारात्मक मंसूबों से मेल खाता है.

अंत में, संघ परिवार की ताकतें इस इलाके को हिंदुत्व के ज्यादा बड़े संसार के भीतर समाहित करने की बढ़-चढ़कर कोशिश कर रही हैं. उन्होंने ऐसा कई तरीकों से किया है. यहां के कई मूल देशज राष्ट्रीय आंदोलन ऐतिहासिक भिन्नता का दावा करते हैं कि यह इलाका कभी 'भारत' का हिस्सा नहीं रहा. इसलिए भाजपा और संघ परिवार को इस इलाके के बाहरी जुड़ावों को दिखाने के तरीके खोजने चाहिए. इस भावना को जगाने का ताकतवर तरीका कहानियां हैं. एक मिसाल लीजिए:

28 मार्च, 2018 को मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और गुजरात के मुख्यमंत्री भगवान कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह महोत्सव मनाने के लिए भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात में चार दिन के माधवपुर मेले में इकठ्ठा हुए. इस मेले में देश भर से हजारों लोग आए थे. साथ ही उत्तर-पूर्व की 150 के आसपास सांस्कृतिक मंडलियां भी आईं जो भगवान कृष्ण के साथ विवाह के लिए अरुणाचल प्रदेश से गुजरात की रुक्मिणी की 'अमर यात्रा' का उत्सव मनाने के लिए दुलहन की तरफ से आई थीं. खबरों, टीवी तथा सोशल मीडिया साइटों पर प्रसारणों में रंगों, विविधता और 'एकता' दिखाई गई और यह एकता केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्रालय के 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' नारे के तहत पूरब और पश्चिम को एक साथ लाकर हासिल की गई थी.

अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल बी.डी. मिश्रा ने इस मौके के जज्बे को बयान किया, ''आप यहां पश्चिमी सीमा पर हैं और हम 3,500 किलोमीटर दूर पूर्वी सीमा से आए हैं. मगर यह दूरी हमेशा जुड़ी रही है. अगर सीमा के उस पार से कोई दावा करता है कि अरुणाचल प्रदेश उनका है, वे सरासर गलत हैं क्योंकि अगर हमारी राजकुमारी 5,000 साल पहले यहां आ सकती थी और उन्हें यहां की रानी बना सकते थे तो इसका साफ मतलब है कि अरुणाचल हमेशा भारत के साथ रहा है और आगे भी रहेगा.''

यह साफ तौर पर साझा इतिहास गढऩे की कोशिश है, जो इससे बिल्कुल विरोधी दावों के पक्ष में उठ रही आवाजों के बीच की जा रही है और जो भारत की राजनीति को टूट-फूट और विघटन की तरफ ले जा रही हैं.

हिंदू राष्ट्रवाद, भारत की आजादी के जश्न और उसके साथ जुड़ी देशभक्ति की भावना के सामने इन घटनाओं का क्या मतलब है? क्या इस इलाके में हिंदुत्व का उभार देशभक्ति की भावना और 'भारत' के जश्न को बढ़ावा देकर इस तनाव को कम करेगा? या यह 'हम' और 'उन' के बीच लड़ाई की लकीरों को और तीखा कर देगा, उस इलाके में जो पिछले 70 वर्षों से हिंसा देखता आया है?

कहा जा सकता है कि समूचे उत्तर-पूर्व में हिंदुत्व की सर्वसमावेशी विचारधारा में जातीय होमलैंड की राजनीति की कोई जगह नहीं होगी, खासकर तब जब हिंदुत्व की यह विचारधारा एक ही भूभाग की सच्चाई को अपने मर्म के तौर पर खुलेआम स्वीकार करती है. ऐसा कोई बेजोड़ आख्यान नहीं है जो खुरदुरेपन को ठीक करता और उस सतह को चिकना बनाता हो, जिसमें उत्तर-पूर्व का इतिहास उकेरा हुआ है. हरेक आधुनिक वैचारिक ताकत की तरह हिंदुत्व को उन जटिल समीकरणों को साधना पड़ेगा जो इस इलाके की खासियत रही हैं– ब्रिटिश से लेकर अमेरिकी मिशनरियों और अब भारतीय राज्य तक.

तो भी यह दिलचस्प तनाव है जो हरेक राष्ट्र-राज्य के हृदय तक जाता है. केंद्र से दूर ले जाने वाली ताकतें जितनी ज्यादा ताकतवर होती हैं, उनका बराबर से मुकाबला करने वाली ताकतें भी उतनी ही ज्यादा अनुकूल हो जाती हैं. किसी एक देश की देशभक्ति की उस इलाके में अपेक्षा नहीं की जा सकती, जहां के भूदृश्यों पर उथल-पुथल और हिंसक इतिहासों के जक्चमों के निशान हैं और जहां वफादारियां विभिन्न संस्थाओं में बंटी होती हैं. गांधी की हत्या के बारे में सुनकर रीड की भावुकता पर चंगराई की प्रतिक्रिया को समझा जा सकता है; शायद यह इस इलाके और इसके लोगों के लिए तमाम परेशानियों की शुरुआत थी. चंगराई की ईमानदारी में एक अहम सच्चाई है, जो आज भी मौजूं है.

अर्कोटोंग लोंगकुमार मानवविज्ञानी हैं और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा, यूके में पढ़ाते हैं.

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