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चैन की नींद

हमने स्लीपवेल के अपने गद्दों के प्रचार के लिए ''25 साल की गारंटी" का नारा प्रयोग किया, क्योंकि फोम के गद्दों में गड्ढे नहीं पड़ते थे. लाक्ष्य साधकर मेहनत से अपने अंजाम तक पहुंचाने की वजह से सफलता मिली.

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आशीष मिश्र/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 12 December 2017
चैन की नींद राहुल गौतम, मैनेजिंग डायरेक्टर शीला फोम लिमिटेड

अब ''स्लीपवेल" का नाम सुनते ही जेहन में गद्दे-तकिए का चित्र घूम जाता है. देश के बाजार को फोम के बने गद्दों से परिचित कराने वाले राहुल गौतम का एक बड़ा योगदान ध्वनि प्रदूषण के क्षेत्र में भी है. कभी तेज आवाज करने वाले पावर जनरेटर अब चलते वक्त बड़े खामोश बने रहते हैं. इसके पीछे राहुल की कंपनी शीला फोम का हाथ है. आवाज को सोख लेने वाला एक खास तरह का पॉलीयूरीथेन फोम बनाने वाली शीला फोम देश की इकलौती कंपनी है.

पावर जनरेटर को ढकने वाली कैनोपी के भीतर लगा यह साउंड ऐंड फायर प्रूफ फोम आवाज को बाहर नहीं आने देता और जनरेटर शांत बने रहते हैं. राहुल के नवाचार नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे के किनारे सेक्टर-135 में तैयार हो रहे 20 मंजिला भवन में भी दिखाई देते हैं. यह देश की उन चुनिंदा बिल्डिंग में है जिसे ऊर्जा संरक्षण में प्लैटिनम सर्टिफिकेट मिला है. यहां से राहुल देश और विदेश में फैले अपने व्यापार पर नजर रखेंगे.

राहुल के पिता हरिशंकर गौतम मथुरा के मूल निवासी थे. वे सेना में थे. बैंगलोर मिलिटरी स्कूल में प्रिंसिपल रहने के दौरान 1969 में उनकी मृत्यु हो गई. उस वक्त राहुल लखनऊ के कॉल्विन कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहे थे. अगले वर्ष आर्मी रिहैब्लिटेशन स्कीम के तहत राहुल की मां शीला गौतम को फोम के निर्माण का लाइसेंस मिला.

लेकिन फोम का कारोबार शुरू करने के लिए राहुल ने पढ़ाई नहीं छोड़ी. उन्हें 1970 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी) कानपुर में दाखिला मिला. पांच वर्ष बाद 1975 में राहुल ने केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक कोर्स पूरा किया. इसके बाद उन्होंने पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूयॉर्क से मास्टर्स डिग्री ली. पढ़ाई के दौरान ही 1971 में राहुल और उनकी मां ने मिलकर शीला फोम के नाम से एक कंपनी बनाई और दिल्ली के आसफ अली रोड पर दक्रतर खोला. चूंकि फोम बनाने का लाइसेंस उत्तर प्रदेश के लिए मिला था लेकिन दिल्ली में बाजार को देखते हुए इसके करीब गाजियाबाद के साहिबाबाद के इंडस्ट्रियल एरिया में कारखाना खोला गया.

यहां पर पॉलीयूरीथेन फोम का निर्माण शुरू हुआ. यह एक खास प्रकार का फोम है जिसे रबड़ के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इसका इस्तेमाल डायरी, पर्स, जूतों के अलावा गद्दे व तकियों में कुशनिंग (गद्देदार) के साथ पैकेजिंग आदि में भी किया जा सकता है. चूंकि इस खास तरह के फोम के लिए देश में बड़ा बाजार नहीं था और कई कठिनाइयां थीं, साथ ही कच्चा माल और मशीनें भी विदेशों से मंगानी पड़ती थीं. सो शुरुआती 15 वर्ष में उनका व्यापार काफी मंदा रहा.

देश के पास पर्याप्त विदेश मुद्रा भंडार नहीं होने से कच्चा माल मंगाने में भी दिक्कतें थीं क्योंकि सरकार आयात को प्रोत्साहित नहीं करती थी. इसके अलावा, सड़कें नहीं थीं जिससे सामान मंगाने और उसे बाजार तक भेजने में दिक्कतें थीं. राहुल उस समय को याद करते हुए बताते हैं, ''1985 के आसपास जब अर्थव्यवस्था में उदारवाद का दौर शुरू हुआ तब फोम के लिए कच्चा सामान मंगाना आसान हुआ और इसकी मांग भी बढ़ी."

राहुल के नाना मोहनलाल गौतम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रहने के बाद मोहनलाल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के दौरान कृषि के अलावा कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे. राजनैतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 1991 के लोकसभा चुनाव में शीला गौतम को अलीगढ़ से उम्मीदवार बनाया. शीला पहली ही चुनावी परीक्षा में विजयी रहीं और इसके बाद 2004 तक लगातार चार बार भाजपा की सांसद रहीं.

मां के राजनीति में जाने के बाद कारोबार का पूरा दारोमदार राहुल के ऊपर आ गया. इसी के बाद से फोम के व्यापार में प्रयोग का दौर भी शुरू हुआ. नब्बे के दशक तक देश में रुई और नारियल के रेशे (क्वायर) के बने गद्दे बनते थे. राहुल ने 1992 में ''स्लीपवेल" ब्रान्ड के नाम से देश में पहला फोम का गद्दा बनाया. क्वायर के गद्दे पर किसी प्रकार का टैक्स नहीं था जबकि फोम पर आयात शुल्क, 75 प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी, 12 प्रतिशत सेल्स टैक्स था जिससे इसकी कीमत काफी अधिक थी. राहुल बताते हैं, ''रुई और क्वायर के बने गद्दों में गड्ढे पड़ जाते थे लेकिन फोम के साथ ऐसा नहीं था. इसीलिए हमने अपने स्लीपवेल के गद्दों के प्रचार के लिए ''25 साल की गारंटी" का नारा प्रयोग किया." यह रणनीति काम कर गई और स्लीपवेल के गद्दों ने बाजार में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी.

काम बढ़ा तो 1995 में हैदराबाद, उसके अगले वर्ष महाराष्ट्र-गुजरात की सीमा पर सिलवासा और सन् 2000 में ग्रेटर नोएडा में कारखाने खोले गए. आज पूरे देश में 11 अलग-अलग जगहों पर कारखाने खोलकर राहुल ने स्लीपवेल ब्रान्ड को बाजार का सिरमौर बना दिया है. वे बताते हैं, ''नब्बे की दशक की शुरुआत में हमारे कारखानों में साढ़े तीन सौ टन फोम सालाना बनता था  जो अब बढ़कर 45,000 टन फोम सालाना हो गया है."

स्लीपवेल देश की उन चुनिंदा कंपनियों में से एक है जिनके पास सौ से अधिक डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं जो केवल इसी ब्रान्ड का सामान रखते हैं. इनसे आगे सामान को बाजार में पहुंचाने के लिए छह हजार डीलर्स हैं जिनमें से ढाई हजार केवल स्लीपवेल के ही उत्पाद बेचते हैं.

राहुल अपने समूह का फाइनेंस, संयुक्त उपक्रम और अधिग्रहण का काम खुद देखते हैं. उन्हीं की निगरानी में समूह ने 2005 में ऑस्ट्रेलिया की जॉएस फोम का पॉलीयूरीथेन फोम और पॉलीस्टाइरीन के कारोबार का अधिग्रहण किया. उन्होंने 2006 में कनाडा के वुडब्रिज ग्रुप और 2007 में ऑस्ट्रेलिया की ए.एच. बियर्ड के साथ संयुक्त उपक्रम शुरू किया. वुडब्रिज मोल्डेड फोम के उत्पादों के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा समूह है और ए.एच. बियर्ड बेडिंग इंडस्ट्री की अगुआ है.

खेलकूद और किताबें पढऩे के शौकीन राहुल फुरसत के लक्वहों में भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनते हैं और शैक्षिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं. नेतृत्व की खूबियों और अपने उद्योग का लंबा अनुभव होने की वजह से वे पॉलीयूरीथेन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन भी हैं. विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में बढ़ती मसरूफियत और कंपनी को अग्रणी बनाए रखने के लिए नित नए इनोवेशन की जरूरत के मद्देनजर उन्होंने अपने बेटे 39 वर्षीय बेटे तुषार गौतम को कंपनी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है.

करीब आठ हजार करोड़ रु. के व्यापार को संभालने के लिए राहुल को अब तुषार का सहारा मिल रहा है. वे कंपनी के सबसे महत्वपूर्ण विभाग अनुसंधान और विकास (आरऐंडडी) के प्रमुख हैं और कंपनी को अग्रणी बनाए रखने के लिए निरंतर नए इनोवेशन पर जोर दे रहे हैं. तुषार को बचपन ही से टेनिस का जुनून था. दिल्ली में आर.के. पुरम स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढऩे के दौरान तुषार देश में अंडर-16 के शीर्ष खिलाडिय़ों में शुमार थे. उन्होंने अमेरिका से हाइ स्कूल और इंटरमीडिएट किया और फिर वहां की पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग की डिग्री ली. इस दौरान तुषार पर्ड्यू यूनिवर्सिटी की टेनिस टीम के कप्तान भी रहे.

2004 में भारत लौटने के बाद तुषार की कलाई में चोट लग गई और उन्हें टेनिस से दूर रहना पड़ा. उन्होंने ग्रेटर नोएडा के कारखाने में पिछले वर्ष विश्व की पहली ऐसी तकनीक ईजाद की जिसमें मशीन उर्ध्वाधर (वर्टिकल) दिशा में फोम बनाती है और उसका प्रेशर भी नियंत्रित किया जा सकता है. अब हल्का या कठोर फोम बनाने के लिए केमिकल में बदलाव करने की जरूरत नहीं है बल्कि केवल प्रेशर में बदलाव कर ऐसा किया जा सकता है.

फोम के निर्माण से बाजार में उतरने वाले राहुल को इनके स्लीपवेल के गद्दों ने पहचान दिलाई है. इसे और परवान चढ़ाने के लिए राहुल अब कमर कस चुके हैं. वे कहते हैं, ''मेरा सपना है हर भारतीय के पास एक गद्दा हो." इसके लिए अब शीला फोम जल्द सस्ते और टिकाऊ गद्दे लेकर बाजार में उतरने की तैयारी में है. इसके लिए ग्रेटर नोएडा के कारखाने में बना रिसर्च सेंटर काम में जुट चुका है.

राहुल गौतम सफलतापूर्वक कारोबार चलाने के अलावा स्लीपवेल फाउंडेशन के जरिए अनेक सामाजिक कार्य भी कर रहे हैं, जिनमें महिलाओं के सशक्तीकरण के कार्यक्रम सराहनीय हैं. सबसे बढ़कर वे नित नए इनोवेशन के जरिए नींद से वंचित लोगों को चैन और सुकून की नींद सोने का मौका दे रहे हैं.

—आशीष मिश्र

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