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अभिनेता होना बेशक दुनिया का सबसे बड़ा पेशा है

क्या होता है जब दो बुनियादी तौर पर अलहदा अदाकार, एक जिसे 38 साल का तजुर्बा है और दूसरा जो 20 साल पूरे करने जा रहा है, फिल्म जगत के बारे में खुली और बेरोकटोक बातचीत में मुब्तिला होते हैं? चिनगारियां उड़ती हैं, राज फाश होते हैं और बरसों की दबी हुई बातें बाहर आ जाती हैं. अदाकार खूबसूरत दिखने की अहमियत, सुपरस्टारडम, सिनेमा के विकास के बारे में चुहल और हंसी-मजाक करते हैं और फिटनेस के टिप्स साझा करते हैं. बातचीत के संपादित अंश.

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मोहम्मद वक़ास/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 20 December 2017
अभिनेता होना बेशक दुनिया का सबसे बड़ा पेशा है अपने-अपने अनुभव ह्रितिक रोशन और अनिल कपूर

क्या होता है जब दो बुनियादी तौर पर अलहदा अदाकार, एक जिसे 38 साल का तजुर्बा है और दूसरा जो 20 साल पूरे करने जा रहा है, फिल्म जगत के बारे में खुली और बेरोकटोक बातचीत में मुब्तिला होते हैं? चिनगारियां उड़ती हैं, राज फाश होते हैं और बरसों की दबी हुई बातें बाहर आ जाती हैं. अदाकार खूबसूरत दिखने की अहमियत, सुपरस्टारडम, सिनेमा के विकास के बारे में चुहल और हंसी-मजाक करते हैं और फिटनेस के टिप्स साझा करते हैं.  सदाबहार अनिल कपूर और हरक्यूलीज सरीखे ह्रितिक रोशन के बीच बातचीत के संपादित अंश.

अनिल कपूरः जब मैंने फिजा (2000) देखी थी, मुझे याद है, मैंने आपको उस वक्त बताया था कि आप अगले 20 साल तक बहुत बड़े स्टार रहेंगे. और अब फिजा को रिलीज हुए 17 साल हो चुके हैं. और इन सारे साल के दौरान आप वैसे ही बने हुए हैं.

ह्रितिक रोशनः शुक्रिया आपका.

अनिल कपूरः आपमें धैर्य है, आपमें आत्मविश्वास है, आपमें प्रतिबद्धता है और, सबसे अहम बात, आपके पास वह माली हालत है, जो मेरे पास कभी नहीं थी और मुझसे पहले मेरे पिता के पास कभी नहीं थी. इसलिए बाज दफे हमें अपनी फिल्मों के साथ समझौते करने पड़े, ताकि रसोई में आग जलती रहे.

ह्रितिकः मैंने अपने डैड को इससे गुजरते देखा है.

अनिल कपूरः मुझे नहीं लगता कि आपने कभी कोई ऐसी फिल्म की है जो केवल करने की खातिर की हो. यह आपके भीतर का आत्मविश्वास ही है जो आपको प्रोजेक्ट के बीच में फासले रखने की छूट देता है. यह भी एक वजह है कि आपकी अखिल भारतीय अपील क्यों है. मैंने लोगों को यह कहते सुना है कि ह्रितिक इतने चूजी क्यों हैं? वे ज्यादा फिल्में क्यों नहीं करते? लेकिन फिर मैं एक टॉम क्रूज या एक लिओनार्दो डिकैपरियो की तरफ देखता हूं और जिस तरह की फिल्में वे चुनते हैं, तब मुझे एहसास होता है कि आप अकेले हैं जो उस किस्म के रोल निभा सकते हैं.

ह्रितिकः मैं इन दोनों अभिनेताओं से प्रेरित हूं.

अनिल कपूरः यहां तक कि हममें से उन लोगों को भी, जो खुशकिस्मत और भाग्यशाली रहे हैं कि हमें लोगों ने स्वीकार किया, ऐसे वक्त देखने पड़ेंगे जब फिल्में अच्छा नहीं करेंगी. उस वक्त के दौरान खुद को बनाए रखना चाहिए और प्रतिबद्ध होना चाहिए क्योंकि इस पेशे ने मुझे इतना कुछ दिया है. वह क्या है जो आपको लगातार बेहतर करने को प्रेरित करता है, तंदुरुस्ती को लेकर, लुक्स (रंग-रूप) को लेकर?

ह्रितिकः मैं सोचता हूं इसका जवाब वही है जो आपके लिए भी है. यह इसलिए है क्योंकि मैं कर सकता हूं. मैं जो कर रहा हूं, उसे मैं अपना बेहतरीन दे सकता हूं. अभिनेता होना दुनिया का सबसे बड़ा पेशा है. यह आपको शारीरिक तौर पर, आध्यात्मिक तौर पर, भावनात्मक तौर पर और व्यावसायिक तौर पर चुनौती देता है. ये चुनौतियां हमें गढ़ सकें, इसके लिए हमें बेहतरीन होना पड़ता है. बात सिर्फ आपकी खुराक की नहीं है, सिर्फ कसरत की भी नहीं है. बात इनसान को समझने की है, अपने सुख-दुख को स्वीकार करने की, उनकी व्याख्या करने की और उन्हें अपनी फिल्मों में रखने की है. इतने सारे आत्मनिरीक्षण, खुद के विश्लेषण से हम गुजरते हैं कि अगर आप अपना बेहतरीन देते हैं, तो यह वाकई बेहतरीन यात्रा है.

अनिल कपूरः लेकिन खुद अपने लिए आप क्या करते हैं? मैं इसलिए करता हूं क्योंकि मैं अपने फिल्म निर्माताओं का ऋणी हूं. जब डील-डौल की बात आती है, तो मैं समर्पित नहीं हो सकता जितने आप हैं. मैं तकरीबन 60-70 फीसदी वक्त देता हूं, फिर पीछे हट जाता हूं.

ह्रितिकः मुझे याद है जब हम खेल (1992) की शूटिंग कर रहे थे, और मैं क्लैपर बॉय था, आप सेट पर पूरे वक्त खड़े रहते थे. मैं बीच-बीच में बैठ जाता था, लेकिन मैंने आपको कभी बैठते नहीं देखा.

अनिल कपूरः मुझे बैठना अच्छा नहीं लगता! वैसे मेरे पैर में चोट भी है.

ह्रितिकः लेकिन क्या आप वाकई मानते हैं कि लुक्स की अहमियत है?

अनिल कपूरः बात अच्छा दिखने की बजाए फ्रेश फील करने की ज्यादा है. बात ज्यादा यह है कि आप जब कैमरे के सामने होते हैं, दर्शकों के सामने होते हैं, तब दर्शकों को कैसे बांधे रखते हैं, कैसे मंत्रमुग्ध करते हैं. हरेक की अपनी स्टाइल है, पर हर कोई कड़ी मेहनत करता है.

ह्रितिकः लेकिन क्या आप उन लोगों से प्रभावित होते हैं जो आपको घिसा-पिटा कहते हैं?

अनिल कपूरः मैं प्रभावित हुआ करता था, पर अब नहीं होता. पहले मैं मीडिया के असर में आ जाया करता था, लेकिन मैंने अपने शैतानों से लडऩा सीख लिया है. आप ही अपने गुरु हैं.

ह्रितिकः यह आपके काम में भी दिखाई देता है.

अनिल कपूरः आपको बहुत सारी चोटों से गुजरना पड़ा, आप अस्पताल में भर्ती भी रहे. आपने इतने जबरदस्त ढंग से वापसी कैसे की? आपके परिवार ने इसका सामना कैसे किया?

ह्रितिकः मेरा परिवार जाहिरा तौर पर बहुत फिक्रमंद था. दिमाग और रीढ़ से जुड़ी चोट को लेकर अनिश्चितता थी. लेकिन मेरे लिए यह मायने नहीं रखता था, क्योंकि मैंने इन मौकों का इस्तेमाल खुद के बारे में जानने के लिए किया. मैंने जाना कि खुद को खुश रखना मेरी ही जिम्मेदारी है. मैंने परेशान या पीड़ित होने की भूमिका अदा करने से इनकार किया. मैं हमेशा के लिए उस आदमी के किरदार में हूं जो इस बात की परवाह नहीं करता कि क्या हो रहा है, एक ऐसा शख्स जिसे हालात से निपटना पड़ता है.

अनिल कपूरः और पेशे के लिहाज से?

ह्रितिकः मैंने खुद से कहा कि मैं गायक हो सकता था. मैंने एक पियानो खरीदा, उसे बजाना सीखा. मैंने गाना भी सीखा. लेकिन इसके तकरीबन दो महीने बाद, मुझे बस पता चल गया कि मुझे दोबारा इसकी कोशिश करनी होगी. एक और बहुत खास बात है जो मैंने आपसे सीखी. मुझे याद है जब मैं छोटा था, ऐक्टिंग अपने आपमें पूरी दुनिया नहीं थी, जो यह अब है. यह किरदार के बारे में कम था और ड्रामा, डबल टेक, वॉयस मॉड्यूलेशन के बारे में ज्यादा था. आपका एक सीन था, जिसमें आप एक टेलीफोन बूथ में हैं और रो रहे हैं, जिसने मुझे गहराई तक प्रभावित किया. मुझे याद है, वह क्लिप मैंने एक अवॉर्ड कार्यक्रम में देखी और मैं घर आया और मैंने अपने एक दोस्त से इसके बारे में बात की.

अनिल कपूरः वह फिल्म थी आवारगी (1990), निर्देशन किया था महेश भट्ट ने, और वह शॉट एक टेक में ओके हो गया था. बेशक डायरेक्टर कौन है, इस बात से भारी फर्क पड़ता है. कुछ डायरेक्टर और ऐक्टर हैं जिनके साथ आप काम करना चाहते हैं और आप चाहते हैं कि वे फिल्में कामयाब हों, लेकिन ऐसा हमेशा होता नहीं है.

अनिल कपूरः तो कौन-से अभिनेता हैं जिन्होंने आपको प्रभावित किया और जिन्हें आप सराहते हैं?

ह्रितिकः मैं शम्मी कपूर के डांस और राज कपूर की अतिसंवेदनशीलता से बहुत प्रभावित था.

अनिल कपूरः कोई मिल गया में क्या आप राज कपूर से प्रभावित थे? क्या वे उसमें एक आदर्श थे?

ह्रितिकः जी नहीं, कोई मिल गया पूरी तरह मेरी अपनी थी.

अनिल कपूरः जब मैंने ईश्वर (1989) की, तब मैं बहुत सारे बच्चों से मिला और बहुत सारी रिसर्च की. तब मेरे दिमाग में कहीं पीछे ये महान अदाकार भी थे. यह महान अदाकारी के हवाले का निचोड़ था.

अनिल कपूरः कृश (2006) के बारे में क्या कहेंगे? क्या आपको लगा कि आपके सुपरस्टारडम ने और जिंदगी से कहीं ज्यादा विशाल आपकी शख्सियत ने इस किरदार को निभाने में आपकी मदद की?

ह्रितिकः मैं सुपरहीरो को लेकर बावरा हूं. पहली फिल्म जो मैंने देखी, वह सुपरमैन थी. बेशक, मैं थोड़ा असुरक्षित था, जैसे कि डैड भी थे.

अनिल कपूरः लेकिन इंडस्ट्री में आप अकेले ऐक्टर हैं जिसने सुपरहीरो के किरदार को कामयाबी से निभाया है. आपने स्तर ऊंचा उठा दिया.

ह्रितिकः कृश करने की मेरी ललक इस बात से पैदा हुई थी कि मैं हमेशा से कुछ ऐसा करना चाहता था जो पहले नहीं किया गया है. तो जब आप बड़े हो रहे थे, किन अभिनेताओं को सराहते थे?

अनिल कपूरः राज कपूर थे, क्योंकि पारिवारिक रिश्ते थे और बतौर बच्चे आरके स्टूडियो जाया करते थे. मुझे देवानंद अच्छे लगते हैं. जब मैंने काम शुरू किया तब नसीरुद्दीन शाह मेरे पसंदीदा ऐक्टर बन गए.

ह्रितिकः जब मैंने गुजारिश (2010) की, तो यह मेरे लिए स्टार होने के बेमानीपन की पड़ताल करने वाली फिल्म थी. अगर मैं किसी किरदार से प्रभावित हूं, तो मैं उसे छोटी-सी फिल्म के लिए भी करूंगा. अब सोनम और हर्षवर्धन, दोनों ऐक्टर हैं, इतने गुणवान पिता की छत्रछाया में, तो क्या आप कभी उन्हें कोई टिप्स देते हैं?

अनिल कपूरः मैं उन्हें टिप्स देने के लिए मरा जा रहा हूं! लेकिन उन्हें चाहिए ही नहीं. वे काम और जिंदगी को अपने ढंग से देखते हैं.

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