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लोकतांत्रिक शख्सियत वाले वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी सफलताओं का स्वाद चखा तो कई पीड़ाएं भी सहीं. वाजपेयी, जिनका सम्मोहक अंदाज बहुत हद तक करुणा से ओत-प्रोत मुस्कुराते हुए बुद्ध जैसा दिखता था, कई विरोधाभासों, विसंगतियों से भरे और यहां तक कि समझौतावादी व्यक्ति रहे.

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Sahitya Aajtak 2018
राज चेंगप्पानई दिल्ली, 28 August 2018
लोकतांत्रिक शख्सियत वाले वाजपेयी वाजपेयी

वाजपेयी की शख्सियत कई विरोधाभासों से भरी थी. अटल और सख्त इरादों वाला सौम्य व्यक्तित्व. कट्टरपंथी संघ परिवार का विनम्र और संयत चेहरा. सिद्धांत, संयम और संकल्प का अभ्यास करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री को इतिहास में राष्ट्र के एक महान समावेशी व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाएगा.

एक सुपरकंप्यूटर में, जो कि हमारा दिमाग वास्तव में है, अरबों टेराबाइट्स की मेमरी सुरक्षित रहती है—अरबों अनुभव हमारी स्मृतियों में कदाचित अंधाधुंध तरीके से भरते चले जाते हैं. जो स्मृतियां महत्वहीन हैं, वे कहीं दबी रहती हैं.

लेकिन जो महत्वपूर्ण हैं—जैसे जिस दिन आपने अपने साथी के सामने विवाह प्रस्ताव रखा था, कोई जबरदस्त सफलता या विफलता का अवसर, आपके किसी प्रिय सम्मानित नेता की मृत्यु आदि—ये स्मृतियां समय-समय पर उभरती रहती हैं.

कई धुंधली यादों की तरह तो कुछ से जुड़ी हर छोटी-बड़ी याद तरोताजा रहती है. विख्यात धावक मिल्खा सिंह ने एक बार कहा था कि 1960 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर की जिस दौड़ में वे चौथे स्थान पर रहे थे, 50 साल बाद भी वह दुख उन्हें सालता है कि ट्रैक ऐंड फील्ड में पहला मेडल जीतने वाले भारतीय न बन सके.

93 वर्षों के अपने घटनापूर्ण जीवनकाल में, अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी सफलताओं का स्वाद चखा तो कई पीड़ाएं भी सहीं. वाजपेयी, जिनका सम्मोहक अंदाज बहुत हद तक करुणा से ओत-प्रोत मुस्कुराते हुए बुद्ध जैसा दिखता था, कई विरोधाभासों, विसंगतियों से भरे और यहां तक कि समझौतावादी व्यक्ति रहे.

एक तरफ आक्रामक अवतार वाले वाजपेयी ने 1998 में पोकरण में परमाणु परीक्षण करके भारत को परमाणु की बेड़ियों से आजाद करा दिया और अगले ही वर्ष पाकिस्तानी सैनिकों के करगिल की चोटियों पर पहुंच जाने पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध भी छेड़ दिया.

शांतिदूत के रूप में अपने अवतार में वाजपेयी अपने कट्टर दुश्मनों के साथ कभी भी बातचीत शुरू करने को आतुर रहते थे. सारी परंपराओं को धता बताते हुए अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ को बधाई देने वे लाहौर तक बस से यात्रा करके गए, तो उस जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ आगरा में हाथ भी मिलाया जिन्होंने करगिल की पटकथा लिखी थी और फिर जल्द ही शरीफ का तक्चतापलट करके खुद बादशाह बन बैठे. और बाद में चीन के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर करने बीजिंग भी गए.

फिर देश ने वाजपेयी को एक ऐसे सुधारक के अवतार में भी देखा जिन्होंने दूरसंचार क्रांति लाकर प्रति मिनट कॉल की लागत को काफी कम कर दिया. और मुगलों की तरह वाजपेयी ने अपने बिल्डर अवतार में भारत के चारों कोने को जोड़ने वाले स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग (गोल्डन क्वॉडिलेट्रल) की कल्पना की.

लोकतांत्रिक वाजपेयी ने अपने तीसरे कार्यकाल में विभिन्न विचारों वाली पार्टियों के गठबंधन को सफलतापूर्वक एकजुट रखा तो विपक्ष को भी साधकर रखा. और एकजुटता के सूत्रधार वाजपेयी ने इनसानियत के अपने नजरिए की बदौलत कश्मीरियों का दिल जीता.

व्यक्तिगत रूप से वाजपेयी के व्यक्तित्व के कई आयाम थे. आरएसएस के अपने साथियों के विपरीत, उन्हें मांसाहार प्रिय था और वे शराब का भी आनंद लिया करते थे. कविताएं लिखीं और एक गैपरंपरागत कुटुंब में रहे. उनकी अनासक्ति मिथ्या थी—वे बॉस दिखते भले नहीं थे पर थे तो बॉस.

वे महत्वाकांक्षी थे, बड़ी चतुराई से अपने प्रतिद्वंद्वियों को पटखनी देने के महारथी, लेकिन बिना प्रतिशोधी हुए. कई लोगों का मानना है कि उन्होंने सत्ता के परित्याग का इस्तेमाल अपनी पकड़ मजबूत करने के साधन के रूप में किया.

उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश करके पार्टी के एक धड़े द्वारा उनकी जगह लालकृष्ण आडवाणी को बिठाने की कोशिशों की हवा निकाल दी. वे गहराई से चिंतन करते, चट्टान की तरह शांत और दृढ़ रहकर सराहनीय परामर्श दिया करते थे.

वे मितभाषी व्यक्ति थे, लेकिन उन्हें दर्शकों के बीच खड़ा कर दिया जाए तो वे अपनी भाषण कला से जनता को घंटों तक मंत्रमुग्ध रख सकते थे. 1977 में आपातकाल हटाए जाने के बाद दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई विपक्ष की उस रैली को कौन भूल सकता है जब वाजपेयी ने अपने खास अंदाज में आंखें मूंदीं और कहा, "खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने?''

उनकी राजनीति का व्याकरण उन लोगों से भिन्न था जिनकी विचारधारा का वे समर्थन करते थे. उन्हें भगवाधारी, त्रिशूलधारी संघ परिवार की सेना का सौम्य चेहरा माना जाता था. मुट्ठी लोहे की ही सही पर मखमली दस्ताने भी चढ़े थे. कइयों का कहना था कि वे एक गलत पार्टी में बैठे सही व्यक्ति थे. जिसका वे पलटकर जवाब देते कि अगर फल अच्छा है, तो डाल कैसे खराब हो सकती है? सत्ता के टकराव और खींचतान के बावजूद आडवाणी के साथ उनकी दोस्ती पक्की बनी रही.

वे आडवाणी की रथयात्रा जैसी टकराववादी राजनीति से असहमति रखते थे फिर भी आम सहमति के साथ गए. हर नेता की तरह वाजपेयी में भी कुछ सीमाएं थीं. 2002 में गोधरा नरसंहार और उसके बाद हुए दंगों में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कार्यकलाप से वे नाखुश थे और जब बात मोदी को बर्खास्त करने की आई तो उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज को नजरअंदाज कर दिया और समझौतावादी बने रहे.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व विचारक के.एन. गोविंदाचार्य ने एक बार वाजपेयी को पार्टी का मुखौटा बताने की भूल की और इसकी भारी कीमत चुकाई. सत्ता में बैठे किसी भी नेता को कई मुखौटे पहनने चाहिए और हमारे विशाल और जटिल देश को सफलतापूर्वक नियंत्रित करने के लिए उसे इस अंदाज में कई तरह के चेहरे लगाने चाहिए कि उसे इसके लिए सम्मानपूर्वक याद रखा जाए.

तो स्वतंत्रता के बाद से भारतीय प्रधानमंत्रियों के मंडप में वाजपेयी कहां विराजते हैं? अपनी परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करने की खातिर लिए गए फैसलों, दोनों से एक महान नेता का निर्माण होता है.

जब वाजपेयी ने कुर्सी संभाली तो उनके सामने 1991 की सुधार प्रक्रियाओं के कारण देश में बने अस्थिर द्वंद्व से निपटने की चुनौती थी—एक तरफ से तेजी से बढ़ता महत्वाकांक्षी मध्य वर्ग था जो बेहतर जीवनशैली के लिए लालायित था तो दूसरी तरफ गरीब ग्रामीण आबादी जो पानी, छत और संपर्क सुविधाओं जैसी बुनियादी जरूरतों की फरियाद कर रही थी.

उच्च आर्थिक विकास दर सुनिश्चित करके सामाजिक और आर्थिक समानता के लक्ष्यों को प्राप्त करना भी जरूरी था. इसके अलावा, विरोधाभासों में उलझे एक ऐसे भारत को संभालना था जो राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कई हिस्सों में बंटा हुआ था.

गठबंधन सरकारों की अपनी अलग मजबूरियां होती हैं और वाजपेयी को प्रधानमंत्री के रूप में अपने सभी तीन कार्यकालों में गठबंधन की सरकार चलानी पड़ी. उन्होंने सब को बड़ी बुद्धिमत्ता, खूबसूरती और संजीदगी के साथ संभाला.

हर प्रधानमंत्री ने उस अमृतकलश को खोजने की कोशिश की है जिसकी मदद से वह राष्ट्र को पुनर्जीवित और पुनर्निर्मित कर सके. वाजपेयी ने कहा कि "न सिर्फ भारतीय राजनीति बल्कि राष्ट्रीय जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है कि हम मिल-जुलकर काम नहीं कर सकते.

चलो एकजुट होना सीखें, विभाजन की जगह समरसता पैदा करने की कोशिश करें और अपने स्वार्थ और अहंकार को किनारे रखना सीखें.'' वाजपेयी एक महान समावेशी थे. सिद्धांत, संयम और संकल्प का चेहरा.

वे आमराय कायम करने में यकीन रखते थे. संकीर्ण मानसिकता से मुक्त, विविध सरोकारों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाले, सर्वधर्म समभाव से प्रेरित सामाजिक समरसता के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सक्वमान करने वाले.

उनके शासन ने सुधार प्रक्रिया को बल दिया और भाजपा को कांग्रेस के गंभीर विकल्प के रूप में उभरने के लिए आधार तैयार किया. लेकिन वाजपेयी की सबसे महत्वपूर्ण विरासत रही प्रबुद्ध बहुलवाद के साथ ज्यादा दयालु, ज्यादा विनम्र और ज्यादा मजबूत राष्ट्र. उनकी इस थाती को हमें सहेजना चाहिए.

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