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एफएमएस-दिल्‍ली: बदलाव की आंधी

नए कैंपस की तैयारी, बेहतर प्रोग्राम और रिवाइज्ड करिक्यूलम के साथ एफएमएस की पिछले साल के मुकाबले सात रैंक की छलांग.

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aajtak.in
सोनाली आचार्जीनई दिल्‍ली, 13 November 2012
एफएमएस-दिल्‍ली: बदलाव की आंधी

राजधानी के नॉर्थ कैंपस में फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के छात्र को अलग से पहचान लेना काफी आसान है. बस आपको यह देखना है कि कौन लुई विटां या ज़ारा के चुस्त कपड़े पहने है. भारत में पहला फुलटाइम एमबीए प्रोग्राम चलाने वाला यह इंस्टीट्यूट साल भर चलने वाले प्लेसमेंट और इंडस्ट्री एक्सपोजर के माध्यम से छात्रों को चौन की सांस नहीं लेने देता है.

एफएमएस के 26 वर्षीय जनरल सेक्रेटरी निमित मेहरा कहते हैं, ‘‘एफएमएस अपने छात्रों को सिर्फ थ्योरी तक सीमित नहीं रखता. हमें प्रजेंटेशन, स्पीच, नेटर्किंग और सारे व्यावहारिक कौशल सिखाए जाते हैं.’’ फुलटाइम एमबीए प्रोग्राम में 2012 में 100 फीसदी प्लेसमेंट और सालाना मात्र 10,000 रु. की फीस के साथ एफएमएस की पहचान बिजनेस स्कूलों की प्रतिस्पर्धी दुनिया में बिल्कुल अनूठी है.

1954 में स्थापित यह इंस्टीट्यूट तब से लाल ईंटों वाली दोमंजिला इमारत में चल रहा है और एक ही करिक्यूलम चलाया जा रहा है. लेकिन अब सब कुछ बदलने वाला है. यहां के नए डीन 52 वर्षीय राज एस. धनखड़ ने इंस्टीट्यूट में छात्रों और अध्यापन दोनों की ही क्वालिटी में सुधार के लिए सिलसिलेवार पहल शुरू कर दी है.

धनखड़ कहते हैं, ‘‘सारे बेहतरीन बिजनेस स्कूल किसी न किसी यूनिवर्सिटी का हिस्सा हैं. स्वतंत्र संस्थानों में छात्र सिर्फ एक विषय पढ़ते हैं जबकि यूनिवर्सिटी परिसर में होने के साथ छात्रों को कई विषयों से जुडऩे का मौका मिलता है.’’ वे कहते हैं, ‘‘मेरा उद्देश्य उद्योगों के मानकों के हिसाब से इंस्टीट्यूट में बुनियादी बदलाव लाना है.’’ धनखड़ की योजनाओं के नतीजे मिलने लगे हैं.

पिछले साल पहली बार ऐसा हुआ कि इंस्टीट्यूट ने अपनी प्रवेश परीक्षा की बजाए कैट के स्कोर के मुताबिक छात्रों को प्रवेश दिया. माइक्रोसॉफ्ट आइटी इंडिया के एचआर डायरेक्टर राजीव बर्मन कहते हैं, ‘‘कैट आपकी मेधा का सटीक पैमाना होता है. इसके बाद तो बिजनेस स्कूलों की जिम्मेदारी होती है कि वे इस मेधा को और निखारें.’’

धनखड़ ने कुछ बदलाव किए हैं. शाम को चलने वाले पार्टटाइम एमबीए प्रोग्राम के लिए जरूरी है कि छात्र ने पांच साल का वर्क एक्सपीरियंस लिया हो. पहले यह तीन साल था. कोर्स करिक्यूलम भी बदला गया है और अब दूसरे साल में फाइनेंस, मार्केर्टिंग, एचआर हेल्थकेयर या अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्पेशलाइजेशन दी जाती है. इन बदलावों से इस साल आए आवेदनों में 30 फीसदी का इजाफा हुआ है. फुलटाइम एमबीए में एक कंसल्टंसी कोर्स, वीक एंड लैक्चर और वर्कशॉप का नया समय लागू किया गया है.

दूसरे वर्ष के छात्र 28 वर्षीय सुजॉय दत्ता कहते हैं, ‘‘अब हम फाइनेंस लैब तक जा सकते हैं जहां हम ट्रेडिंग चैनल और शेयर बाजार का सीधा अनुभव ले पाते हैं. हम रियल टाइम इन्वेस्टमेंट कर सकते हैं, पोर्टफोलियो का अध्ययन कर सकते हैं और वित्तीय दुनिया के व्यावहारिक पहलुओं से रू-ब-रू हो सकते हैं.’’

एफएमएस में प्रबंधन के डॉक्टरल छात्रों की संख्या भारत के बी-स्कूलों के बीच सबसे ज्यादा है. हर साल यहां 15 से ज्यादा पीएचडी उपाधि दी जाती है. पिछले साल यहां जमा शोध प्रबंधों के विषय विविध थे-इथोपिया में एचआर प्रबंधन से लेकर ट्रॉमा केयर सिस्टम के विकास तक. धनखड़ कहते हैं, ‘‘हम अगले साल से अपने 130 शोध छात्रों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं देने की योजना बना रहे हैं. पहली तो अपनी-अपनी डेस्क, कंप्यूटर और बुक कैबिनेट के साथ उन्हें एक अनुकूल वॄकग एन्वायर्नमेंट मुहैया कराना है. हम एक ऐसा मंच भी बनाएंगे जहां दूसरे बिजनेस स्कूलों के छात्र यहां आकर अपने शोध कार्य साझा कर सकेंगे.’’

अगले साल जुलाई में इंस्टीट्यूट इंटरनेशनल बिजनेस में अपना फुलटाइम एक्जिक्यूटिव एमबीए प्रोग्राम लॉन्च करेगा जिसके लिए आठ साल के प्रोफेशनल एक्सीपीरियंस की जरूरत होगी. धनखड़ कहते हैं, ‘‘प्रोग्राम के तहत एक सेमेस्टर विदेश में और एक सेमेस्टर अपनी कंपनी में काम करते हुए बिताना होगा.’’ इन तमाम योजनाओं में हालांकि सबसे ऊपर एफएमएस के नए कैंपस का निर्माण है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस में नए भवन के लिए 20 करोड़ रु. की राशि मंजूर कर ली है. अगले साल तक नया कैंपस तैयार हो जाने के बावजूद फिलहाल इंस्टीट्यूट की फुलटाइम एमबीए कोर्स में सीटें बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. फिलहाल इसमें 226 सीटें हैं. एफएमएस की फाइनेंस सोसायटी के प्रेसिडेंट सुधांशु सिन्हा कहते हैं, ‘‘मैंने एफएमएस को छोटे बैच के कारण ही चुना.’’

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