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कृषि: किसानों को मिला और अधिकार

राज्य की राजधानी पुड्डुचेरी से करीब 15 किमी दूर कट्टेरिकुप्पम गांव में अपने डेढ़ हेक्टेयर के प्लॉट पर अब्दुल हई धान, मिर्च, करेला, तोरई, बैंगन और केले सरीखी फसलें उगाते हैं. इस साल उनके खेतों में पैदावार दोगुना हुई है.

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आर. रामसुब्रमण्यम/जे. बिंदुराजनई दिल्‍ली, 06 November 2012
कृषि: किसानों को मिला और अधिकार

राज्य की राजधानी पुड्डुचेरी से करीब 15 किमी दूर कट्टेरिकुप्पम गांव में अपने डेढ़ हेक्टेयर के प्लॉट पर अब्दुल हई धान, मिर्च, करेला, तोरई, बैंगन और केले सरीखी फसलें उगाते हैं. इस साल उनके खेतों में पैदावार दोगुना हुई है. थाने नाम के चक्रवात के असर के बावजूद इस बार मिर्च की पैदावार प्रति एकड़ 30 टन से भी ज्यादा रही. थोक बाजार में उन्हें इसकी कीमत मिली 13 रु. प्रति किलो यानी पिछले साल की दरों से यही कोई 5 रु. प्रति किलो ज्यादा.

संधाईपुधुकुप्पम गांव में रहने वाले पूर्व विधायक और बीकॉम पास 37 वर्षीय अरुल मुरुगन के चेहरे पर भी मुस्कान है. उन्होंने अपनी खेत में बदला हुआ फसलचक्र अपनाया यानी पिछले साल जो बोया था, उससे भिन्न फसल बोई. इस साल उनकी आय दोगुनी हो गई है. उन्होंने इस बार धान रोपने के लिए एक जापानी मशीन यानमार का इस्तेमाल किया, जो उन्हें पी. कामराज कृषि विज्ञान केंद्र से मिली थी. यह भारत का पहला गांव केंद्रित कृषि विज्ञान केंद्र है. मुरुगन अपनी 150 एकड़ जमीन में से 12 एकड़ पर अब धान रोप लेते हैं. आज से सिर्फ  तीन साल पहले 2009 में यह हाल था कि मजदूरों की कमी के चलते उन्हें कम जमीन पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी. वे गर्व से कहते हैं, ‘‘नए तरीकों से हम कम मेहनत में ज्यादा पैदावार ले पा रहे हैं.’’SOS Agriculture

पुदुचेरी में अब कटाई के बाद होने वाला नुकसान कम हो रहा है. अब कुल उपज का सिर्फ 9 फीसदी बरबाद होता है और इसकी मुख्य वजह पर्याप्त थ्रेशिंग फ्लोर और ग्रामीण गोदामों का उपलब्ध न हो पाना है.

राज्य कृषि विभाग के अतिरिक्त निदेशक ए. राममूर्ति कहते हैं, ‘‘मुख्यमंत्री रंगास्वामी की कैबिनेट में अधिकतर मंत्री खुद किसान हैं, इसलिए वे हमारी समस्याओं को बेहतर समझ पाते हैं.’’

तमिलनाडु
सर्वाधिक सुधार वाला बड़ा राज्य
किसान को और अधिकार
चेन्नै से 160 किमी दूर स्थित वेल्लूर जिले के अडुक्कंपरै गांव के निवासी 48 वर्षीय सेबस्टियन आज आराम की जिंदगी बसर कर रहे हैं. अपने एक एकड़ के प्लॉट पर वे दो साल पहले के मुकाबले 40 फीसदी ज्यादा चावल पैदा कर रहे हैं और वह भी कहीं कम मेहनत और प्रयास से. इसका सारा श्रेय राज्य सरकार की 2007-08 में चलाई गई धान की खेती को और सघन बनाने की योजना यानी सिस्टम ऑफ  राइस इनटेंसिफिकेशन (एसआरआइ) को जाता है. एसआरआइ को अपनाने के बाद सेबस्टियन की सिंचाई और बीज की लागत काफी कम हुई है. इससे पहले वे 1,025-1,500 किलो चावल पैदा करने के लिए 15,000 रु. से 20,000 रु. तक खर्च करते थे. आज उनकी पैदावार है 1,400-2,000 किलो और इस पर लागत आती है 8,000 रु. से 10,000  रु. मात्र.

तमिलनाडु में कुल उपलब्ध 1,30,00,000 हेक्टेयर जमीन में से कुल 48,92,000 हेक्टेयर पर खेती होती है. यहां का शुद्ध सिंचित क्षेत्र है 28,64,000 हेक्टेयर. बाकी का इलाका कमोवेश बरसात पर निर्भर है. वर्षा जल संग्रहण के लिए यहां भंडारण तंत्र विकसित किया गया है. यहां 2007 में 98 करोड़ रु. की लागत से इरिगेटेड एग्रीकल्चर मॉडर्नाइजेशन ऐंड वाटर बॉडीज रेस्टोरेशन ऐंड मैनेजमेंट नाम का छह वर्षीय कार्यक्रम शुरू किया गया था, जिसके चलते यहां वर्षा जल संग्रहण का काम संभव हुआ है. यह कार्यक्रम 2013 के आसपास पूरा हो जाएगा.

राज्य के पास 2011-12 में कृषि के लिए 1,430 करोड़ का बजट था. उस अवधि में राज्य ने 105.42 लाख टन अनाज पैदा किया, जिसमें 77.5 टन चावल भी था. अनाज के मामले में राज्य आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है. भारत में 2011-12 के दौरान 25.744 करोड़ टन अनाज पैदा हुआ जिसमें तमिलनाडु की हिस्सेदारी 1.054 करोड़ टन की रही यानी कुल चार फीसदी. लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह हिस्सेदारी पूरे 39 फीसदी ज्यादा थी.

राज्य सरकार ने तमिलनाडु एग्रीकल्चरल इन्फॉर्मेशन सर्विस नेटवर्क (टीएन-एग्रिसनेट) की सफलतापूर्वक शुरुआत की है. यह एक इंटरनेट आधारित एक सेवा है, जो किसानों को खेती संबंधी जरूरी सूचनाएं देता है, मसलन मिट्टी पर डाटाबेस, कृषि उत्पादों या फिर खाद वगैरह की उपलब्धता आदि. केंद्र ने इस सेवा को लागू कराने के लिए 83.14 करोड़ रु. दिए हैं.

कुछ दूसरी योजनाओं में सस्टेनेबल शुगरकेन इनिशिएटिव (एसएसआइ) यानी गन्ने की खेती को टिकाऊ बनाने की पहल और सिस्टम ऑफ पल्सेस इनटेंसिफिकेशन (एसपीआइ) यानी दलहनी खेती को और सघन बनाने की öणाली भी हैं. एसएसआइ में ड्रिप सिंचाई के माध्यम से गन्ने की उपज बढ़ाने का लक्ष्य है. वेल्लूर के केशवपुरम गांव के किसान 53 वर्षीय बी. रामलिंगम बताते हैं, ‘‘मैंने एक एकड़ जमीन पर एसएसआइ को लागू किया. पहले मेरी 35 टन की गन्ने की पैदावार थी, इस बार वह प्रति एकड़ 45-50 टन की उम्मीद कर रहा हूं.’’

राज्य का कृषि महकमा एसएसआइ के प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले किसानों को 3,000 रु. के कृषि उपकरण, बीज और सूक्ष्म पोषक तत्वों वाले मिश्रण मुहैया कराता है. इससे पहले कभी भी किसानों को  सरकार से इतना कुछ नहीं मिला.

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