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एक योद्धा का विश्वास

युद्ध के मैदान पर सैनिक को उत्साहित करने के लिए देशभक्ति को बड़ा कारक नहीं माना जा सकता. अध्ययनों से पता चला है कि यूनिटों का आपसी सामंजस्य और नेतृत्व की गुणवत्ता वे चीजें हैं जिनके बल पर कोई सैनिक गोलियों की बौछार के बीच कूदने को तत्पर रहता है

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 12 August 2019
एक योद्धा का विश्वास एक योद्धा

कोई ऐसा सोच सकता है कि देशभक्ति की अवधारणा और उसके अर्थ को परिभाषित करना एक सैनिक के लिए तो बहुत आसान रहता होगा. आखिरकार, हम उस समूह के सबसे अधिक दिखाई देने वाले प्रतीक हैं जो देश के सम्मान के लिए जीवन का बलिदान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हुए देश के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं. हालांकि, आज की दुनिया में, जहां 'देशभक्ति' और 'राष्ट्रवाद' जैसे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर एक-दूसरे के लिए किया जाता है—और इसने एक भावनात्मक चरित्र हासिल कर लिया है—देशभक्ति को परिभाषित करना सरल नहीं है. इसमें व्यक्तिगत पूर्वाग्रह भी दिख सकता है, और देशभक्ति की मेरी धारणा किसी अन्य सैनिक से पूरी तरह से अलग भी प्रतीत हो सकती है.

ऐसी स्थिति में इसे देखने का एक संभावित तरीका यह हो सकता है कि देशभक्ति को व्यक्तिवादी परिप्रेक्ष्य के बजाए संगठनात्मक संदर्भ में देखा जाए. सेना कुछ लोगों का अस्थाई समूह नहीं है, बल्कि यह एक अद्वितीय और अलग विशेषताओं वाला पेशा है. मॉरिस जोनोविट्ज़, अपनी एक अद्वितीय पुस्तक द प्रोफेशनल सोल्जर, में कहते हैं, '[कोई] पेशा किसी समूह के विशेष कौशल से अधिक है, जिसे गहन प्रशिक्षण के माध्यम से हासिल किया जाता है.

एक पेशेवर समूह, समूह के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान और आंतरिक प्रशासन की एक प्रणाली विकसित करता है. स्व शासन... का तात्पर्य नैतिकता और प्रदर्शन के मानकों के निकाय के विकास से है.' सेना में, व्यक्तिगत झुकाव समूह की पहचान और संगठन की पेशेवर नैतिकता के अधीन होते हैं. मैं भारतीय सेना की पेशेवर नैतिकता और देशभक्ति से इसके जुड़ाव के वर्णन का प्रयास करूंगा.

सेना में हम देश और झंडे के प्रति प्रेम को बहुत सहजता से महसूस करते हैं और उसी सहजता से अपना प्रेम प्रदर्शित भी करते हैं. भारतीय तिरंगा हर यूनिट में और सीमा पर प्रत्येक पोस्ट पर फहराता है और हमारे शहीदों के ताबूतों को ढंकता है. राष्ट्रगान सभी औपचारिक और अनौपचारिक घटनाओं के दौरान बजता है और हम गर्व के साथ उसके सम्मान में तनकर खड़े होते हैं. हम भीतरी और बाहरी दोनों खतरों से भारत की भौगोलिक अखंडता की रक्षा करने के लिए अपना जीवन समर्पित करने को तैयार रहते हैं.

लेकिन हम देशभक्ति को प्रतीकात्मक या भौगोलिक दृष्टि से नहीं देखते; भारत के राष्ट्रीय मूल्यों को आगे बढ़ाने और उनके संरक्षण में भी देखते हैं.

वाल्टर बर्न अपनी पुस्तक मेकिंग पैट्रियट्स में देशभक्ति को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि देशभक्ति न केवल देश के लिए, बल्कि देश के सिद्धांतों के प्रति और उन सिद्धांतों के पालन के प्रति कटिबद्धता के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. इसमें मैं, हमारे संविधान में निहित सिद्धांतों के अभ्यास को जोड़ सकता हूं; और यह वह जगह है जहां सेना सबसे आगे खड़ी होती है. समानता, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व-सैन्य संस्कृति के आवश्यक अंग हैं, केवल इसलिए नहीं कि ये किसी व्यक्ति में नैतिक रूप से वांछनीय हैं बल्कि इसलिए कि वे हमारे जीवन जीने की कला के अपरिहार्य अंग हैं.

वर्दी में हर फौजी बराबर है. सभी जातियों, पंथों और नस्लों के सैनिक हैं; जाट, ब्राह्मण, महार, सिख, मुस्लिम, राजपूत, मराठा और नगा साथ खेलते हैं, साथ लड़ते हैं. वे जिन भी जातिगत समीकरणों के बीच बड़े हुए हों, वह सब उन्हें घर छोड़कर आना होता है. वर्दी पहनते ही एक सैनिक इन सबसे मुक्त हो जाता है.  सैनिकों के बीच अधिक या कम महत्वपूर्ण काम जैसी कोई बात नहीं है. युद्ध में, हमेशा थल सेना के जवान हमले की अगुआई करते हैं और दुश्मन को पीछे खदेडऩे की कोशिश करते हैं.

पैदल सेना के पीछे क्लीनर, नाइयों, ड्राइवरों और रसोइयों का एक समूह है जिनसे 'तत्काल पुन:आपूर्ति टीम' का गठन करते हैं. लक्ष्य पर कब्जा हो जाने के बाद, यह टीम पैदल सैनिकों के लिए गोला-बारूद, पानी और भोजन की आवश्यक जरूरतें पूरी करती है और घायलों को इलाज के लिए वापस लेकर आती है. विजय एक साथ काम करने वाली इकाई के प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर करती है.

सेना के भीतर, सभी धर्मों की आसान और समान स्वीकृति है. धार्मिक प्रथाओं को प्रोत्साहित किया जाता है और एक यूनिट में, आमतौर पर रविवार की सुबह अनिवार्य रूप से मंदिर, चर्च या गुरुद्वारा समारोह होता है. अधिकारियों के रूप में हम उन सैनिकों के धर्म को अपनाते हैं जिन्हंं हम कमान देते हैं और इससे कभी भी हमारी निजी धार्मिक आस्था से संघर्ष जैसी स्थिति नहीं आती. मिश्रित धार्मिक रचना वाली इकाइयों में सर्व धर्म स्थल नामक एक सामान्य प्रार्थना कक्ष है जिसमें भगवान राम और ईसा की प्रतिमाएं, गुरु ग्रंथ साहिबजी और एक ही छत के नीचे पवित्र काबा की तस्वीरें हैं. सर्व धर्म स्थल की इस अवधारणा को अब पूरी सेना में सार्वभौमिक स्वीकृति मिल गई है.

संविधान प्रत्येक नागरिक 'बिरादरी' को व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता का आश्वासन देता है. बिरादरी सभी समुदायों के बीच भाईचारे की भावना है, और सैनिक इस अवधारणा से हमेशा से परिचित रहे हैं. सेना को बैंड ऑफ ब्रदर्स (बंधुओं का जत्था) के रूप में जाना जाता है, जो कि शेक्सपियर के हेनरी पंचम में इस्तेमाल किया गया है, जिसमें 1415 में एगिनकोर्ट की लड़ाई से पहले सम्राट अपने सैनिकों को इन शब्दों में कहता है:

''इस दिन से लेकर दुनिया के अवसान तक,

लेकिन हम इसमें याद किए जाएंगे—

हम चंद लोग, हम खुशमिजाज चंद लोग,

हम बैंड ऑफ ब्रदर्स;

जो आज मेरे साथ अपना खून बहाएगा

वह हमेशा मेरा भाई रहेगा''

 वर्दी में हम सब भाई हैं; हमारी हैसियत, समुदाय, धन और पृष्ठभूमि का यहां कोई अर्थ नहीं है. जब मैं हायर कमान कोर्स कर रहा था तो मेरे अच्छे दोस्तों की सूची में जेरेक्स एड्रियनवाला, आजाद समीर, सत्या और चाको इप जैसे नाम शामिल थे. हम एक बड़े परिवार की तरह थे, एक-दूसरे की सफलताओं का जश्न मनाते थे और दु:ख के क्षणों को साझा करते थे.

आप पूछ सकते हैं कि मैं भारत के संविधान के बारे में इतनी बातें क्यों कर रहा हूं. ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक अधिकारी और सैनिक जब सैन्य सेवा में प्रवेश करता है तो शपथ लेता है कि वह ''कानून के जरिये स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्चा विश्वास और निष्ठा रखता है.'' हम सेना को भारत के एक छोटे स्वरूप के रूप में भी देखते हैं, और हमें लगता है कि यह हमारा देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य है कि हम अपने संगठन में, उन मूल्यों और सिद्धांतों को बढ़ावा दें जिनके आधार पर देश की स्थापना हुई थी.

वाल्टर बर्न ने एक देशभक्त को परिभाषित करते हुए उसे ''एक नागरिक या एक राष्ट्र के निवासी से अधिक माना है; उसे अपने राष्ट्र के लिए समर्पित होना होगा और उसकी रक्षा के लिए तैयार रहना होगा.'' सैनिकों के रूप में, हम भारत की रक्षा में अपना जीवन लगाने को तैयार हैं और इस प्रकार स्वत:स्फूर्त रूप से देशभक्त हैं. लेकिन हम इसका दिखावा नहीं करते; वास्तव में देशभक्ति के अत्यधिक प्रदर्शन या चर्चा को हतोत्साहित किया जाता है. इसका एक कारण यह है कि देशभक्ति पर एक बहस कई बार राजनैतिक रंग ले सकती है, और राजनीति आमतौर पर चर्चा के विषय के रूप में वर्जित रही है.

दूसरा कारण अधिक व्यावहारिक है. देशभक्ति, आपके दिमाग में हमेशा मौजूद तो रहती है, लेकिन इसे ऐसा प्रमुख कारक नहीं माना जाता जिसके साथ आप लड़ाई में जा रहे जवानों को प्रेरित कर सकते हैं. एस.एल.ए. मार्शल अपनी पुस्तक मैन अगेंस्ट फायर: द प्रॉब्लम ऑफ बैटल कमान इन फ्यूचर वॉर में लिखते हैं, ''यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि वर्दी का गर्व या किसी राष्ट्रीय हित के प्रति समर्पण एक सैनिक को खतरा उठाने के लिए प्रोत्साहित करने को पर्याप्त है... ऐसा पेशा जिसमें हथियार जुड़ा है, वह उस कार्य के लिए अयोग्य है, जो मनुष्य की क्षमता को अतिरंजित करने और अकेले आदर्शों की ओर से त्याग करने की धारणाओं पर आधारित है.''

इस बात पर कई अध्ययन किए गए हैं कि ऐसी क्या चीज है जिससे कोई व्यक्ति गोलियों की बौछार के बीच कूद पडऩे को तैयार रहता है जबकि उसे अच्छी तरह से पता होता है कि उनमें से कई अगला दिन देखने के लिए जीवित नहीं होंगे. इन अध्ययनों में से अधिकांश ने यूनिट के बीच आपसी सामंजस्य और नेतृत्व की गुणवत्ता को लड़ाई में सफलता के प्रमुख निर्धारक के रूप में माना है. आसन्न मौत का सामना करते समय सैनिक किस प्रकार का व्यवहार करेगा, उसमें साहस और सम्मान जैसे सैन्य मूल्यों का भी बड़ा मजबूत प्रभाव रहता है. मार्टिन वान क्रेवालड अपनी पुस्तक ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ वॉर में लिखते हैं, ''जब पुरस्कार निरर्थक हो जाते हैं और सजाएं भय पैदा करने में नाकाम हो जाती हैं, तब अकेले सम्मान में ही इतना सामथ्र्य है कि वह जवानों को अपनी ओर तनी हुई तोपों के सामने सीना तानकर खड़े रहने को प्रेरित कर दे.''

इसलिए, सेना अच्छा नेतृत्व देने, अफसरों व जवानों के बीच साहस, वफादारी, सम्मान, अखंडता और यूनिट के गौरव के मूल्य विकसित करने पर जोर देती है. युद्ध में सक्षम रूप से प्रदर्शन कर सकने वाली कोई यूनिट उस कर्तव्य को पूरा करने के लिए सबसे अच्छी होगी जिसकी राष्ट्र को जरूरत है. करगिल युद्ध में यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ था, जहां कनिष्ठ नेतृत्व और यूनिट के सामंजस्य के कारण दुर्गम बाधाओं के बीच जीत हासिल हुई थी.

राष्ट्रवाद बनाम देशभक्ति और प्रतीकात्मक देशभक्ति बनाम अंध देशभक्ति पर इन दिनों बहुत बहस चल रही है. दोनों पक्षों के तर्क अच्छी तरह से ज्ञात हैं, और आप जिस विचारधारा के साथ हैं, उसका आसानी से बचाव कर सकते हैं. हालांकि, जो महत्वपूर्ण है वह यह है कि किसी को भी किसी दूसरे की देशभक्ति के ब्रान्ड का पालन करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. जैसा कि जॉर्ज ऑरवेल अपने निबंध, 'नोट्स ऑन नेशनलिज्म', 'बाइ पैट्रियटिज्म' में लिखते हैं, ''मेरा आशय किसी विशेष स्थान और जीवन के विशेष तरीके के प्रति समर्पण, जिसे कोई व्यक्ति दुनिया में सबसे अच्छा मानता है, को अपनाए लेकिन उसे किसी अन्य पर थोपने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए.''

हममें से जो भी सैनिक हैं या थे, उनके लिए सच्ची देशभक्ति राष्ट्र की अखंडता की रक्षा करने और उन सिद्धांतों और मूल्यों की रक्षा करने में निहित है जिन पर हमारे महान देश की स्थापना हुई थी. यह न केवल युद्ध में भारतीय सेना के प्रदर्शन में, बल्कि हमारे संगठन के चरित्र और पेशेवर नैतिकता में भी झलकता है.

ले. जनरल डी.एस. हुड्डा भारतीय सेना की उत्तरी कमान के मुख्य कमान अधिकारी रह चुके हैं

समानता, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व, सैन्य संस्कृति के आवश्यक अंग हैं, केवल इसलिए नहीं कि ये किसी व्यक्ति में नैतिक रूप से वांछनीय हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमारे जीवन जीने की कला के अपरिहार्य अंग हैं.

ले.जनरल.डी.एस. हुड्डा  भारतीय सेना की उत्तरी कमान के मुख्य कमान अधिकारी रह चुके हैं.

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