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करोड़पति किसान: जिन्होंने बदल दिया खेती का मतलब

इन किसानों ने नए प्रयोगों और मेहनत के बल पर खेती के पेशे को एक फायदेमंद कारोबार में बदलकर सफलता की इबारत लिख डाली.

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aajtak.in
जय नागड़ानई दिल्‍ली, 10 December 2012
करोड़पति किसान: जिन्होंने बदल दिया खेती का मतलब

राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेताओं क्रमशः अरुण जेटली और सुषमा स्वराज को कहां तो संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार पर हमले की धार तेज करने में जुटा होना चाहिए था. लेकिन इसकी बजाए वे 89 वर्षीय राम जेठमलानी की ओर से 24 नवंबर को लगाई गई आग से ही जूझते रहे. इस बुजुर्ग वकील और बीजेपी के राज्यसभा सांसद ने सार्वजनिक रूप से उन बातों को जुबान दे दी जो बीजेपी के भीतर के गुट ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ ही कह सकते थे.

बताया जाता है कि इस तूफान को थामने की कोशिश में जेटली ने 27 नवंबर को यह अनुरोध करते हुए नरेंद्र मोदी को फोन किया कि वे जेठमलानी से बात कर लें, हालांकि यह पता नहीं चल पाया कि मोदी ने ऐसा किया या नहीं. जेठमलानी बीजेपी में मोदी के बेहद करीबी माने जाते हैं. मोदी ने ही 2010 में तमाम विरोधों के बावजूद राजस्थान से जेठमलानी को राज्यसभा का टिकट दिलाने में निर्णायक भूमिका अदा की थी. अब इस दिग्गज वकील ने बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के लिए अपना समर्थन जताया है.

जेठमलानी ने खुलेआम युद्ध का बिगुल बजाकर जेटली और स्वराज दोनों को निशाने पर ले लिया. उनके हमले से पार्टी के भीतर की दरारें जाहिर हो गईं. जहां वरिष्ठ पार्टी नेताओं यशवंत सिन्हा और शांता कुमार ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के इस्तीफे की उनकी मांग का समर्थन किया, वहीं गडकरी को लिखी 27 नवंबर की अपनी कड़ी चिट्ठी में शत्रुघ्न सिन्हा ने नए सीबीआइ प्रमुख रंजीत सिन्हा की नियुक्ति के अनुमोदन में जेठमलानी का पक्ष लिया. गडकरी को लिखी चिट्ठी में जेठमलानी ने उनका मजाक उड़ायाः ‘‘मुझे पक्का यकीन हो गया है कि आप दृढ़तापूर्वक आत्महत्या के रास्ते पर चल चुके हैं और अपने साथ पूरी पार्टी को घसीट ले जाने का दृढ़ संकल्प भी कर चुके हैं. विनाशकाले विपरीत बुद्धि एक पुरानी कहावत है.’’

जेठमलानी सीबीआइ प्रमुख रंजीत सिन्हा की नियुक्ति का विरोध करने के लिए जेटली से भी दो-दो हाथ करने से नहीं हिचके और उन्होंने जेटली पर सिन्हा को बदनाम करने की साजिश का अंग होने का इल्जाम लगाया. उन्होंने कहा कि तीन नामों वाले सीबीआइ निदेशक पद के अंतिम पैनल में से अपने नाम को निकाले जाने के सरकार के फैसले को केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) में चुनौती देने वाले दिल्ली पुलिस आयुक्त नीरज कुमार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील वस्तुतः जेटली के ही जूनियर थे. जेठमलानी ने गडकरी को लिखा, ‘‘यह बिल्कुल असंभव है कि कैट में चल रही मुकदमेबाजी की जानकारी उनको न रही हो, और मेरा अंदाजा है कि आपने भी जेटली की सलाह पर ही काम किया है.” हालांकि जेटली ने 27 नवंबर को मीडिया से कहा कि यह आरोप किसी प्रतिक्रिया के लायक नहीं हैं.

जेटली और स्वराज दोनों ने ही सिन्हा की नियुक्ति का विरोध किया था. उन्होंने सरकार से कहा था कि वह संसद में लोकपाल बिल पारित होने तक नियुक्ति को रोके रखे. जेठमलानी ने इस चुनाव और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सराहना की. लोकपाल बिल में सीबीआइ प्रमुख का चयन एक कोलेजियम से करने का प्रस्ताव है. जेठमलानी दरअसल लोकपाल बिल पर सलाह नहीं लिए जाने से भी नाराज हैं. उन्होंने कहा,  ‘‘मैं राज्यसभा का एक वरिष्ठ सदस्य और बीजेपी के संस्थापकों में से हूं पर लोकसभा या राज्यसभा के आपके किसी वर्तमान नेता ने लोकपाल बिल के बारे में मुझसे कभी कोई चर्चा तक नहीं की.”

जेठमलानी के करीबी सूत्रों का कहना है कि स्वराज तो असल में गेहूं के साथ घुन की तरह पिस गईं, वरना हमले का असली निशाना जेटली ही थे. दोनों की दुश्मनी की जड़ें 2000 में उस वक्त पनपीं जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जेटली ने विधि मंत्री के रूप में जेठमलानी की जगह ली थी. उस समय जेठमलानी कानून मंत्री के रूप में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एस. आनंद और अटार्नी जनरल सोली सोराबजी के साथ एक लड़ाई में उलझे थे. जेटली और जेठमलानी के बीच पत्रों के आदान-प्रदान के साथ मामला कुछ ज्यादा ही उलझ गया था. ऐसी हालत में वाजपेयी ने जेठमलानी से इस्तीफा देने को कहा. उस समय के वाणिज्य राज्य मंत्री जेटली को विधि मंत्रालय अतिरिक्त प्रभार के रूप में दिया गया और जल्द ही उनकी तरक्की कर उन्हें कैबिनेट मंत्री का ओहदा दे दिया गया.

एक वरिष्ठ बीजेपी नेता बताते हैं, ‘‘जेठमलानी को हमेशा लगता था कि वाजपेयी को उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने के लिए उकसाने वाले जेटली ही थे. वैसे भी वाजपेयी जेठमलानी के साथ कुछ असहज महसूस किया करते थे. उन्हें तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के कहने पर मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. जेठमलानी रामजन्मभूमि मामले में आडवाणी के वकील थे. मगर जेठमलानी ने आडवाणी के आतंकवाद विरोधी टाडा बिल का विरोध कर उन्हें भी नाराज कर दिया.” जेठमलानी 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के खिलाफ लखनऊ से चुनाव लड़े और पराजित हुए.

पार्टी के अंदर कानूनी मामलात के लिहाज से जेटली के सबसे अहम पद हासिल कर लेने पर जेटली और जेठमलानी के बीच का यह मनमुटाव जारी ही रहा. फिर जब जेठमलानी ने राज्यसभा की एक सीट के साथ बीजेपी में वापसी की कोशिशें कीं तो जेटली ने इसका विरोध किया. मोदी ने अपने कानूनी मामलों में जेठमलानी की मदद की उम्मीद में उनका जमकर समर्थन किया. मोदी के करीबी अमित शाह उस समय जेल में ही थे. मोदी से अपनी निकटता के लिए मशहूर बीजेपी के एक नेता आगे बताते हैं, ‘‘अच्छे रिश्तों के चलते जेटली ने जेठमलानी की उम्मीदवारी का विरोध करने के लिए मोदी को फोन किया. मोदी नाराज हो गए और उन्होंने जेटली से पूछा कि क्या वे उन्हें जेल में देखना चाहते हैं?” माना जाता है कि अमित शाह का मुकदमा लडऩे और मोदी को कानूनी मदद देने की एवज में ही जेठमलानी ने  गुजरात से राज्यसभा सीट हासिल की.

आरएसएस विचारक एस गुरुमूर्ति और अरुण शौरी के साथ पार्टी के कोर ग्रुप का हिस्सा होने के बावजूद जेठमलानी कभी पार्टी में अपने लिए एक मजबूत आधार बनाने में कामयाब नहीं हो पाए. आरएसएस के साथ उनके रिश्ते इमरजेंसी के दिनों से हैं. जनाधार के अभाव में उन्हें हमेशा बलिदान करने लायक समझा जाता है. एक बीजेपी सदस्य का कहना है, ‘‘गडकरी खुद भी जेठमलानी जितने ही स्वतंत्र मिजाज वाले नेता हैं. वे अपने बूते तो इस वरिष्ठ अधिवक्ता के खिलाफ  किसी तरह की कार्रवाई कर पाने से रहे. पार्टी का संसदीय बोर्ड ही उन्हें निष्कासित करने का कोई निर्णय ले सकता है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बारे में जिस तरह के राज वे जानते हैं, वे अकेले दम पर पार्टी को डुबो सकते हैं. न केवल उनकी याददाश्त जबरदस्त है, बल्कि बीजेपी नेताओं के बारे में वे एक विस्फोटक फाइल भी रखे हुए हैं.”

इस कानूनी घाघ के आत्मविश्वास को 25 नवंबर को कही उनकी इस बात से समझा जा सकता है, ‘‘मेरे खिलाफ कार्रवाई करने की किसी में हिम्मत नहीं है.” इसे स्वीकार करते हुए बीजेपी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया लेकिन उन्हें निष्कासित नहीं कर पाई. जेठमलानी को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. उन्होंने अपने चिर-परिचित  ‘भाड़ में जाओ’ वाले अंदाज में जवाब देते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस में कोई मेरिट नहीं है और वह ‘कूड़ेदान में फेंकने लायक है.’

जेठमलानी बेपरवाह इसलिए हैं क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है. यही वह वजह भी है जिसके चलते बीजेपी में लोग उनसे खौफ खाते हैं. शातिर कानूनी दिमाग, हाजिरजवाबी और कुशल भाषण कला से लैस वे न सिर्फ  एक प्रतिभाशाली वकील ही हैं, वरन् एक जिद्दी प्रतिद्वंद्वी भी है.

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