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कुंदन शाहः हंसाते-हंसाते रुला गया

कुंदन बेहद विनम्र, निरा सीधा-सादा और बेहद होनहार था.

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Sahitya Aajtak 2018
विधु विनोद चोपड़ामुबंई, 23 October 2017
कुंदन शाहः हंसाते-हंसाते रुला गया कुंदन शाह 1947-2017

भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे में कुंदन से मेरी मुलाकात हुई. हम एक ही क्लास में थे, इसमें सईद मिर्जा और रवि ओझा भी थे. कुंदन बेहद विनम्र, निरा सीधा-सादा और बेहद होनहार था. वह ज्यादा बात नहीं करता था, पर जब भी करता, ज्यादातर मजेदार बातें करता था. आज अगर वह मंच पर होता, तो सबसे अव्वल स्टैंड-अप कामेडियन होता.

मैं जाने भी दो यारो (जेबीडीवाई) का लाइन प्रोड्यूसर था. मेरा जिम्मा पैसे का हिसाब संभालने का था. राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम ने हमें यह फिल्म बनाने के लिए 12 लाख रुपए दिए थे. मैंने पैसे बचाने के लिए जेबीडीवाई में एञ्चिटंग की. उस किरदार के लिए मैं जिस अभिनेता को लाया, वह शूटिंग के दिन बहुत ज्यादा रकम की मांग करने लगा. मैंने उसे चार दिनों के लिए 500 रुपए देने की पेशकश की, पर वह रोज के 500 रुपए चाहता था. अभी मैं उससे मोलभाव कर ही रहा था कि लड़का कॉस्ट्यूम लेकर आ गया. तो मैंने उसे पहन लिया और दुशासन बन गया. कुंदन को पता नहीं था. उसे तभी पता चला जब मैं जोर से दहाड़ा ''दुर्योधन..."

कुंदन इतना बावला और स्नेह करने वाला था कि उसने एक किरदार का नाम मेरे ही नाम पर रख दिया. (नसीरुद्दीन शाह ने ''विनोद चोपड़ा" का किरदार अदा किया था.) यहां तक कि ओमपुरी के बॉडीगार्ड का किरदार, जो लगातार कहता रहता था कि ''गोली चला दूं, सर?", कमोबेश मुझ पर ही आधारित था—मैं अपना आपा खो देने के लिए जो जाना जाता था. ये सब आइडिया कुंदन के जबरदस्त मजाकिया स्वभाव से ही आए थे.

वह बेहद मेहनती भी था. अलीबाग में शूटिंग के दौरान एक बार उसने मुझे भरोसा दिलाया कि शाम 6 बजे तक पैक कर देगा. (लाने-ले जाने के लिए मैंने बस कंपनी को एडवांस दे दिया.) अंदाज लगा सकते हैं कि उसने कब काम खत्म किया? अगले दिन दोपहर को! मुझे याद है जब कुंदन बोला ''कैमरा...", तब बिनोद प्रधान (सिनेमेटोग्राफर) व्यूफाइंडर पर सोता हुआ पाया गया! हम सब निरे पागल, जवान और सिनेमा बनाने के लिए बावरे थे.

सिनेमा से छुट्टी लेकर जब उसने टेलीविजन का रुख किया, तब हमारे बीच संपर्क नहीं रहा. टेलीविजन में भी उसने नुक्कड़ तथा वागले की दुनिया सरीखे यादगार शो डायरेक्ट किए. हमें कभी पता नहीं चलेगा कि कुंदन अपनी जिंदगी से कितना असंतुष्ट या संतुष्ट महसूस करता था. मगर हमें एक ऐसे शानदार आलादिमाग शख्स पर कोई फैसला नहीं देना चाहिए जो जेबीडवाई सरीखी फिल्म की कल्पना कर सका था. केवल जीनियस, बेहद अनोखा दिमाग ही रोलर स्कैट्स पर ताबूत में शव की ढुलाई की बात सोच सकता था. यही वह कुंदन है जिसकी कमी मुझे हमेशा खलेगी.

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